अमेरिका-ईरान तनाव : समझौते और युद्ध के बीच झूलती दुनिया

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ट्रंप की बदलती रणनीति और वैश्विक भू-राजनीति का नया संकट

अमेरिका की “अधिकतम दबाव” नीति बनाम ईरान की रणनीतिक प्रतिरोधक क्षमता, युद्ध की आशंका से चिंतित विश्व

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं

गोंदिया/महाराष्ट्र। पश्चिम एशिया में बढ़ता अमेरिका-ईरान तनाव अब केवल दो देशों के बीच का कूटनीतिक विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार, परमाणु संतुलन, महाशक्ति प्रतिस्पर्धा और विश्व अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बन चुका है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की बदलती रणनीति, ईरान की कठोर प्रतिक्रिया और होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर बढ़ती सैन्य गतिविधियों ने पूरी दुनिया को “न युद्ध, न शांति” की अनिश्चित स्थिति में ला खड़ा किया है।

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी ने अपने व्यापक विश्लेषण में कहा कि वर्ष 2026 में अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव वैश्विक राजनीति की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक बन गया है। एक ओर दोनों देश वार्ता की मेज पर दिखाई देते हैं, तो दूसरी ओर आर्थिक प्रतिबंध, नौसैनिक गतिविधियां, सैन्य दबाव और युद्ध की चेतावनियां लगातार बढ़ रही हैं।

विश्लेषण के अनुसार, सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम तब सामने आया जब राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने वार्ताकारों द्वारा तैयार मसौदा समझौते में और कठोर शर्तें जोड़ने के निर्देश दिए। व्हाइट हाउस की उच्च स्तरीय बैठकों के बाद परमाणु कार्यक्रम, संवर्धित यूरेनियम भंडार और होर्मुज़ जलडमरूमध्य से जुड़ी शर्तों को और सख्त करने की मांग ने लगभग अंतिम माने जा रहे समझौते को फिर अनिश्चितता में डाल दिया।

अमेरिका की मुख्य मांगों में ईरान से स्थायी रूप से परमाणु हथियार कार्यक्रम त्यागने की कानूनी गारंटी, संवर्धित यूरेनियम भंडार को नष्ट या अंतरराष्ट्रीय निगरानी में सौंपना, होर्मुज़ जलडमरूमध्य में निर्बाध जहाजरानी तथा मिसाइल और क्षेत्रीय सैन्य गतिविधियों पर नियंत्रण शामिल हैं।

दूसरी ओर ईरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है और वह अपनी संप्रभुता से समझौता नहीं करेगा। तेहरान अमेरिकी प्रतिबंधों को हटाने, फ्रीज की गई अरबों डॉलर की संपत्तियों की वापसी और क्षेत्रीय सुरक्षा मामलों में अपनी भूमिका की मान्यता चाहता है। यही कारण है कि वार्ताएं बार-बार आगे बढ़ने के बाद भी गतिरोध में फंस जाती हैं।

विश्लेषण में बताया गया कि ओमान सहित कई मध्यस्थ देशों के प्रयासों के बावजूद कई बैठकों में तीखी बहस हुई और कुछ मौकों पर ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने असंतोष जताते हुए बातचीत बीच में छोड़ दी। हालांकि अभी तक किसी भी पक्ष ने आधिकारिक रूप से वार्ता समाप्त होने की घोषणा नहीं की है।

होर्मुज़ जलडमरूमध्य बना सबसे बड़ा तनाव बिंदु

Strait of Hormuz इस पूरे संकट का सबसे संवेदनशील केंद्र बना हुआ है। विश्व के समुद्री तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी जलडमरूमध्य से गुजरता है। अमेरिका चाहता है कि यह मार्ग पूरी तरह खुला रहे, जबकि ईरान इस क्षेत्र में अपनी सुरक्षा और प्रशासनिक भूमिका को स्वीकार करवाना चाहता है।

हाल ही में अमेरिकी सेना द्वारा ईरान की ओर जा रहे एक मालवाहक जहाज को रोकने के लिए की गई मिसाइल कार्रवाई ने हालात को और तनावपूर्ण बना दिया। अमेरिका ने इसे नाकाबंदी तोड़ने की कोशिश बताया, जबकि ईरान ने इसे उकसावे की कार्रवाई कहा।

युद्ध की आशंका पर दुनिया चिंतित

अधिकांश रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों देश पूर्ण युद्ध से बचना चाहते हैं, क्योंकि इसका प्रभाव केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा। फिर भी किसी ड्रोन हमले, समुद्री झड़प या परमाणु विवाद के कारण स्थिति अचानक नियंत्रण से बाहर जा सकती है।

इस पूरे संकट में इजराइल की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इजराइल लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा मानता रहा है। रिपोर्टों के अनुसार अमेरिका ने प्रस्तावित समझौते का मसौदा अपने प्रमुख सहयोगियों के साथ साझा किया है ताकि क्षेत्रीय सहमति बनाई जा सके।

चीन-रूस कारक ने बढ़ाई जटिलता

चीन और रूस विभिन्न स्तरों पर ईरान के साथ जुड़े हुए हैं। यदि संघर्ष बढ़ता है तो यह केवल पश्चिम एशिया का संकट नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन और महाशक्ति प्रतिस्पर्धा का नया अध्याय बन सकता है। रूस और चीन प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप से बच सकते हैं, लेकिन कूटनीतिक और आर्थिक समर्थन के माध्यम से समीकरण को जटिल बना सकते हैं।

भारत पर संभावित प्रभाव

भारत के लिए यह संकट अत्यंत संवेदनशील है क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से प्राप्त करता है। यदि होर्मुज़ में यातायात प्रभावित होता है तो कच्चे तेल की कीमतें 120 से 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं।

इसका सीधा असर पेट्रोल-डीजल की कीमतों, परिवहन लागत और महंगाई पर पड़ेगा। खाद्य पदार्थों से लेकर औद्योगिक उत्पादों तक लगभग हर क्षेत्र प्रभावित हो सकता है। भारतीय रिजर्व बैंक पर मुद्रास्फीति नियंत्रण का दबाव बढ़ेगा।

भारतीय शेयर बाजारों में भी भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। विमानन, परिवहन और पेट्रोकेमिकल कंपनियों पर दबाव बढ़ेगा, जबकि ऊर्जा और रक्षा क्षेत्र की कुछ कंपनियों को लाभ मिलने की संभावना रहेगी।

खाड़ी देशों में कार्यरत लाखों भारतीयों की सुरक्षा भी बड़ी चिंता बन सकती है। यदि संघर्ष व्यापक हुआ तो भारत को बड़े पैमाने पर निकासी अभियान चलाने पड़ सकते हैं।

वैश्विक अर्थव्यवस्था और व्यापार पर असर

यदि होर्मुज़ में व्यवधान आता है तो केवल तेल ही नहीं बल्कि प्राकृतिक गैस की आपूर्ति भी प्रभावित होगी। इससे यूरोप सहित कई अर्थव्यवस्थाओं पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा।

विश्व शेयर बाजारों में अस्थिरता, निवेशकों का सोने जैसी सुरक्षित परिसंपत्तियों की ओर रुझान और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर असर देखने को मिल सकता है। समुद्री बीमा प्रीमियम और माल ढुलाई लागत बढ़ने से अंतरराष्ट्रीय व्यापार महंगा हो जाएगा।

निष्कर्ष

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी के अनुसार वर्तमान परिस्थितियां यह स्पष्ट करती हैं कि अमेरिका “अधिकतम दबाव और अधिकतम सौदेबाजी” की रणनीति पर काम कर रहा है, जबकि ईरान भी पूरी तरह झुकने को तैयार नहीं है। ट्रंप का लगातार बदलता रुख रणनीतिक दबाव बनाने का प्रयास माना जा रहा है।

फिलहाल पूर्ण युद्ध की घोषणा नहीं हुई है और वार्ता के रास्ते खुले हैं, लेकिन हालात बेहद नाजुक बने हुए हैं। किसी भी गलत सैन्य कार्रवाई, होर्मुज़ में नई घटना या परमाणु मुद्दे पर बढ़ते गतिरोध से स्थिति अचानक विस्फोटक हो सकती है। ऐसे में पूरी दुनिया की निगाहें आने वाले दिनों में होने वाली अमेरिका-ईरान वार्ताओं और दोनों देशों की अगली रणनीति पर टिकी हुई हैं।

-संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र

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Author: Bharat Sarathi

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