कुरुक्षेत्र की विरासत पर वैश्विक मंथन, अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का शुभारंभ

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गीता के सार्वभौमिक संदेश और भारतीय संस्कृति की वैश्विक पहचान पर विद्वानों ने रखे विचार

थानेसर, 8 अप्रैल (प्रमोद कौशिक/संजीव कुमारी): कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के सीनेट हॉल में बुधवार को “कुरुक्षेत्र: थ्रू द एजेस” विषय पर तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का विधिवत शुभारंभ हुआ। यह आयोजन भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद, श्रीमद् भगवद्गीता अध्ययन केंद्र, स्वदेशी शोध संस्थान, जिओ गीता और विजन कुरुक्षेत्र के संयुक्त सहयोग से आयोजित किया जा रहा है।

सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद महाराज ने कहा कि भारत का अध्यात्म और संस्कृति विश्व में अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं। उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह ग्रंथ केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण, कर्तव्य, नैतिकता और लोककल्याण के मूल्यों का भी मार्गदर्शन करता है।

उन्होंने कुरुक्षेत्र को वैश्विक स्तर पर अपेक्षित पहचान न मिलने पर चिंता जताते हुए कहा कि यह भूमि चार धाम के समान महत्व रखती है। यही वह पावन धरती है जहां भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था।

आस्था, इतिहास और संघर्ष की भूमि है कुरुक्षेत्र

प्रो. रघुवेन्द्र तंवर (अध्यक्ष, ICHR) ने कहा कि कुरुक्षेत्र केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास और संघर्ष की जीवंत धरोहर है। उन्होंने बताया कि कुरुक्षेत्र की भौगोलिक स्थिति—शिवालिक, हिमालय और राजस्थान के बीच—इसे प्राचीन काल से ही कृषि, व्यापार और संस्कृति का केंद्र बनाती रही है।

उन्होंने सम्राट हर्षवर्धन के काल का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय यह क्षेत्र सूर्यग्रहण के अवसर पर विशाल धार्मिक केंद्र था। साथ ही चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा-वृत्तांतों में भी इसकी समृद्ध झलक मिलती है।

गीता हर द्वंद्व का समाधान देती है

कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने कहा कि गीता मानव जीवन के प्रत्येक द्वंद्व का समाधान प्रस्तुत करती है। उन्होंने शिक्षा में विज्ञान और मानविकी के संतुलन पर जोर देते हुए कहा कि तकनीकी ज्ञान के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक समझ भी आवश्यक है।

इतिहास को समग्र दृष्टि से समझने की जरूरत

डॉ. कुलदीप चंद अग्निहोत्री ने कहा कि इतिहास केवल लिखित ग्रंथों तक सीमित नहीं, बल्कि लोक परंपराओं, अभिलेखों और पौराणिक स्रोतों से भी समझा जाना चाहिए। उन्होंने सिंधु-सरस्वती सभ्यता के अध्ययन को भारतीय इतिहास की व्यापक समझ के लिए महत्वपूर्ण बताया।

विश्व के दार्शनिकों पर गीता का प्रभाव

प्रो. हीरामन तिवारी ने कहा कि गीता केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि वैश्विक दार्शनिक धरोहर है, जिससे विश्व के अनेक चिंतकों ने प्रेरणा ली है।

गौरवशाली है भारतीय इतिहास

प्रो. ईश्वर शरण विश्वकर्मा ने भारतीय इतिहास की प्राचीनता और गौरव पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वेदों को विश्व स्तर पर प्राचीनतम ग्रंथों के रूप में स्वीकार किया जा रहा है।

संग्रहालय की जरूरत पर जोर

सम्मेलन में कुरुक्षेत्र की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के लिए “कुरुक्षेत्र संग्रहालय” की स्थापना की आवश्यकता पर भी बल दिया गया, ताकि आने वाली पीढ़ियों को इस धरोहर से जोड़ा जा सके।

समापन:
तीन दिवसीय इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में देश-विदेश के विद्वान कुरुक्षेत्र की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत पर गहन मंथन करेंगे। कार्यक्रम में शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों की उल्लेखनीय भागीदारी रही।

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Author: Bharat Sarathi

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