ICC के होते हुए भी युद्ध अपराध बेअसर क्यों? वीटो की राजनीति ने न्याय को कैसे बना दिया ‘कमजोर’

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कमलेश पांडेय

अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में न्याय की सबसे बड़ी उम्मीद माने जाने वाले अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) के रहते हुए भी दुनिया में युद्ध अपराध लगातार हो रहे हैं—और कई बार खुलेआम। सवाल उठता है कि जब कानून मौजूद है, संस्थाएं मौजूद हैं, तो फिर शक्तिशाली देश इन नियमों को ठेंगा कैसे दिखा देते हैं?

युद्ध अपराध: कानून क्या कहता है?

अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के तहत युद्ध अपराध वे कृत्य हैं जो युद्ध के दौरान बुनियादी मानवीय नियमों का उल्लंघन करते हैं—जैसे नागरिकों पर हमला, अस्पतालों और स्कूलों को निशाना बनाना, यातना देना या प्रतिबंधित हथियारों का उपयोग।

इनका कानूनी आधार मुख्यतः दो स्तंभों पर टिका है:

  • जिनेवा कन्वेंशन 1949
  • रोम संविधि (जिससे ICC की स्थापना हुई)

कागज़ पर यह ढांचा बेहद मजबूत दिखता है—लेकिन ज़मीन पर इसकी ताकत सीमित हो जाती है।

असल समस्या: ICC की सीमित पहुंच

ICC तभी कार्रवाई कर सकता है जब:

  1. संबंधित देश रोम संविधि का सदस्य हो, या
  2. मामला संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) द्वारा भेजा जाए

यहीं से असली राजनीति शुरू होती है।

वीटो पावर: न्याय पर राजनीति की पकड़

UNSC के पाँच स्थायी सदस्य—

  • संयुक्त राज्य अमेरिका
  • रूस
  • चीन
  • फ्रांस
  • यूनाइटेड किंगडम

—के पास वीटो शक्ति है। इसका मतलब है कि ये देश अपने या अपने सहयोगियों के खिलाफ किसी भी अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई को रोक सकते हैं।

👉 परिणाम:

  • जांच रुक जाती है
  • प्रतिबंध लागू नहीं हो पाते
  • आरोपी गिरफ्तारी से बच जाते हैं
शक्तिशाली देश क्यों नहीं मानते ICC?

कई बड़े देश जैसे भारत, अमेरिका, रूस, चीन ICC के सदस्य ही नहीं हैं। इसके पीछे मुख्य कारण हैं:

1. राष्ट्रीय हित सर्वोपरि

ये देश अपनी सैन्य और रणनीतिक स्वतंत्रता को किसी अंतरराष्ट्रीय अदालत के अधीन नहीं करना चाहते।

2. दोहरा मापदंड (Double Standards)

अपने या मित्र देशों के अपराधों को “सुरक्षा कार्रवाई” बताया जाता है, जबकि विरोधियों के मामलों को “युद्ध अपराध”।

3. राजनीतिक संरक्षण

मित्र देशों को बचाने के लिए वीटो का इस्तेमाल आम है।

जमीन पर हकीकत: छोटे देशों तक सीमित न्याय

ICC ने अब तक जिन मामलों में सजा दी है, वे मुख्यतः अफ्रीकी देशों से जुड़े हैं, जैसे:

  • कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य
  • युगांडा
  • माली
  • लीबिया

जबकि बड़े देशों के मामलों में स्थिति अलग है:

  • रूस (यूक्रेन युद्ध) – वारंट जारी, लेकिन गिरफ्तारी नहीं
  • इज़राइल–फिलिस्तीन मामला – कार्रवाई अटकी
  • अमेरिका (इराक/अफगानिस्तान) – जांच, पर सजा नहीं

👉 यानी न्याय का दायरा “कमजोर देशों” तक सिमट जाता है।

क्या ICC वाकई कमजोर है?

तकनीकी रूप से नहीं।
राजनीतिक रूप से—हाँ।

ICC के पास:
✔ कानूनी अधिकार है
❌ लागू कराने की शक्ति नहीं

उसे गिरफ्तारी के लिए देशों पर निर्भर रहना पड़ता है—और यही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है।

समाधान क्या हो सकता है?
  1. वीटो पावर पर सीमाएं लगें
  2. ICC को स्वतंत्र प्रवर्तन शक्ति मिले
  3. वैश्विक राजनीतिक इच्छाशक्ति विकसित हो
  4. “वसुधैव कुटुम्बकम” जैसे मानवीय सिद्धांतों को व्यवहार में उतारा जाए
निष्कर्ष

अंतरराष्ट्रीय न्याय व्यवस्था आज एक विरोधाभास में फंसी है—
कानून मजबूत है, लेकिन लागू करने की ताकत कमजोर।

जब तक वैश्विक राजनीति, न्याय से ऊपर रहेगी, तब तक युद्ध अपराधों पर लगाम लगाना मुश्किल रहेगा। ICC की असली परीक्षा कानून की किताबों में नहीं, बल्कि महाशक्तियों के सामने खड़े होने की क्षमता में है।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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