व्यंग्य : जरूरी है उद्घाटन

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डा. विनोद बब्बर 

उसने उद्घाटन के लिए बुलाया है या उद्घाटन में बुलाया है, एक अबूझ पहेली ही रहा क्योंकि पहले तो उसे समझना लगभग असंभव उस पर उद्घाटन का अर्थ ही हमें कभी नहीं समझ में आया। हमारे शहर में बने पुल पर महीनों से वाहन दौड़ रहे हैं। इधर क्या देखता हूं कि पुल तो पुल, वह सड़क भी आम लोगों के लिए बंद है। अक्सर उसी तरफ जाना होता है इसलिए मजबूरी में लंबा चक्कर लगाकर आना जाना पड़ता है।

एक दिन हमने जानना चाहा कि आखिर माजरा क्या है? कहीं ऐसा तो नहीं कि नया बना पुल…..!!!! फिर बुद्धि ने मन को लटाड़ लगाई, ‘हमेशा अशुभ ही क्यों सोचता है? हो सकता है कुछ और बेहतर किया जा रहा हो।’ मन तो मन है मान जाये तो एक क्षण में मान जाये। और न माने तो हजार कोशिश पर भी न माने। हजार तर्क सबूत प्रस्तुत करने पर भी टस से मस न हो।

आखिर हमने संबंधित विभाग के एक मित्र को फोन लगाया, ‘भैय्या, आजकल ठण्डी सड़क गर्म, मेरा मतलब बंद क्यों है।’ 

उधर से जवाब आया, ‘यार तू भी कमाल है, शहर का बच्चा- बच्चा  जिस बात को जानता है, तू उससे भी बेखबर है। आजकल फिर से शुरु कर दी है क्या? अखबार, टीवी से किसी डाक्टर ने परहेज बता दिया है क्या?’

‘अब इतनी पहेलियां ही बुझाता रहेगा या कुछ बतायेगा भी?’ आखिर कोई भी शरीफ (नवाज शरीफ नहीं) ऐसी बाते सुनकर आखिर भड़केगा नहीं तो और कया करेगा।

‘ओह डियर, मान गये न बुरा। बचपन के यार की दो बात सुनने का सब्र नहीं तो फिर सड़क से सियासत के कायदो को कैसे झेलोगे। एक सप्ताह से पूरा सरकारी अमला जोर शोर से पुल के उद्घाटन की तैयारी में लगा है। मुख्यमंत्री जी आ रहे है।’

‘तो भैय्या उद्घाटन के लिए सड़क बंद करने की क्या जरूरत है?’

‘ओह! इतना भी नहीं समझते कि  उद्घाटन के बाद ही सड़क या  पुल चालू होता है।’

‘अब तक बिना उद्घाटन के कैसे चलता रहा। क्या वह गैरकानूनी था? हजारों पहिये नाप गये जिस पुल को और अब आप कहते है पहले रिब्बन कटेगा। वाह साहिब वाह!’

‘जब बिना तैयारी दीवार के बदले पर्दे टॉग कर,  छत्त के बदले छप्पर टांग कर काम चल सकता है। सजे धजे गमले रखकर  उस पार्क का भी उद्घाटन हो सकता है जिसकी चार दीवारी का भी अता पता न हो तो महीनों से तैयार पुल के उद्घाटन से क्या सियाचीन की बर्फ पिघल जायेगी?’

‘लेकिन उद्घाटन का भी तो कोई कायदा होता  है या कायदे की बजाय फायदा ही देखा जाता है?’

‘कायदा फायदे के लिए पढ़ा और पढ़ाया जाता है। रिमोट से एक साथ रिमोट एरिया के हजारो उद्घाटन एक साथ हो जाते हैं। इनमें कितने उद्घाटन उद्घाटन  के लिए होते हैं और कितने उद्धार के लिए यह सब तुम्हारे जैसे लोग नहीं समझ सकते। लोकतंत्र का हित इसी में है तुम चक्कर लगाते रहो और तंत्र उद्घाटन का चक्कर चलाता रहे।’

‘अगर यही सत्य है तो फिर क्या जरूरत है उद्घाटन की? हमें परेशान किये बिना भी तो अखबारों में विज्ञापन दे सकते थे।’ 

‘उद्घाटन उद्घाटन होता है। बारात की तरह उसका अपना महत्व होता है। अब बिना बारात के मिलना जुलना मना थोडे ही हैं? खैर तीन दिन की दिक्कत और है झेल लो, उसके बाद फुर्र से पुल पार करना। अब तुम अपना काम करो, मुझे उद्घाटन की तैयारी करने दो।’

वे उद्घाटन की तैयारी में लग गये और अपुन उद्घाटन का वास्तविक अर्थ समझने में लग गये। आखिर यह उद्घाटन शब्द कहां से आया? इसकी उत्पत्ति कैसे हुई? इसका व्याकरण से क्या संबंध है? किस भाषा शास्त्री ने यह शब्द क्यों ईजाद किया होगा? जैसे अनेक सवालों ने मुझे अभिमन्यू समझ अपने चक्राव्यूह में घेर लिया। 

कभी दूरदर्शन और बी. आर. चोपड़ा की कृपा से हम हर सप्ताह सब काम छोड़ महाभारत देखा करते थे। तब हमने देखा ही था कि घिरा हुआ अभिमन्यू भी आखिर तक कोशिश करता रहा। इसलिए मुझे भी उद्घाटन शब्द के विषय में हर रहस्योद्घाटन करने का जनून सवार है।

अचानक महीनों टायरों द्वारा सहलाये जा चुके पुल के उद्घाटन की औपचारिकता को देख मन में कौंधा कि हर शुभ कार्य से पहले घंटी बजती है- टन, टन, टन! जरूर किसी नेता के मन में  आधा घटित हो जाने के बाद ‘टन’ की सूझी होगी तो उसने अपने किसी बीरबल से पूछा होगा कि, ‘इस अनुष्ठान को क्या नाम दिया जाये ’ तो उस वीर ने अपनी अक्ल का पूरा बल लगाकर कहा होगा ‘उद्घाटन’.

उद्घाटन इतना महत्वपूर्ण अनुष्ठान है कि चलती सड़क को रोक सकता है। हजारों का रास्ता मोड़ सकता है। समय पर पहुंचने के आपके इरादे को तोड़ सकता है। लेकिन नेता को जनता से जोड़ सकता है इसीलिए तो यह अद्भुत अनुष्ठान किया और करवाया जाता है।

अद्भुत! अरे वाह! उद्घाटन  और अद्भुत का भी कोई रिश्ता जरूर है। सड़क बन गई, चलने दो। पुल  तैयार है तो दुनिया को निकलने दो। रेल बिछ गई तो छुकछुक होने दो। नहीं नहीं, ऐसे कौन जानेगा कि मोर नाचा। जंगल में मोर नाचा किसने देखा? किसी ने भी नहीं। लेकिन आप हमारे राज को लाख जंगलराज कहो पर हम जब नाचेगे तो सबको देखना पड़ेगा। नहीं देखेगे तो दिखायेगे। नहीं सुनोगे तो सुनाओंगे। इस अद्भुत अनुष्ठान के लिए हम कुछ भी कर सकते हैं।

उद्घाटन इसलिए भी जरूरी है ताकि सभी जान ले यानी सनद रहे कि फलां तारीख तक पुल टनाटन था। रिब्बन कटने की फोटो अखबारों में छपेगी। टीवी ने दिखेगी। अतः जो भी हर्जा मर्जा हुआ है उस टनाटन के ‘टन’ के बाद ही हुआ है। ऐसे अद्भुत विचार का घटित होना ही तो उद्घाटन है। 

उद्घाटन का महात्म्य जानने के बाद अब मैं स्वयं को उद्घाटन  में जाने से रोक भी नहीं सकता। और फिर असली बात यह भी है कि उन्होंने बुलाया है। बुलाया है तो जाना ही पड़ेगा क्योंकि वे हमारे मुखिया हैं। लोकतंत्र के पक्षधर है। लोक को अपने तंत्र के चुगुल में रखने के हजार नुस्खे जानते हैं।  इससे पहले कि .. जो आधा जीवन बीत चुका है उसके साथ समय से पहले कुछ घटित हो मैं उन्हें उद्घाटन में अपनी उपस्थिति की सूचना दे रहा हूं। आप भी समझ लो जरूरी है उद्घाटन ।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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