कमलेश पांडेय

“जनविश्वास विधेयक” देश का एक बड़ा विधेयक‑सुधार है जिसका मुख्य उद्देश्य “छोटे‑मोटे” अपराधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर जीवन‑यापन और कारोबार को आसान बनाना है। इस विधेयक के तहत कई केंद्रीय कानूनों के सैकड़ों प्रावधानों में संशोधन करके जेल और गंभीर सजाओं की जगह जुर्माना या चेतावनी जैसे हल्के दंडों को प्राथमिकता दी जाती है।
जनविश्वास विधेयक क्या है?
जनविश्वास (प्रावधानों में संशोधन) विधेयक, 2026 लगभग 79 केंद्रीय कानूनों के 780 से ज़्यादा प्रावधानों में संशोधन करता है और हज़ारों छोटे‑मोटे उल्लंघनों को “अपराध” की श्रेणी से बाहर निकाल देता है या उन्हें जुर्माना/चेतावनी तक सीमित कर देता है। इसका ढांचा “विश्वास आधारित शासन” पर आधारित है, यानी मामूली तकनीकी गलतियों या बिना इरादे के हुई चूकों पर जेल‑जैसी कठोर सजा के बजाय नियमों का पालन करवाना और अनुपालन को बढ़ावा देना लक्ष्य है।
सवाल है कि इससे किसको फायदा मिलेगा? तो जवाब होगा कि चार समूहों को, उनके कार्य व्यवहार के आधार पर, जो इस प्रकार हैं-
पहला, आम नागरिक और छोटे उपभोक्ता को क्योंकि पुराने कानूनों में छोटी गलतियों (जैसे लाइसेंस समय से ज़्यादा देरी से नवीनीकरण, तकनीकी दस्तावेज़ की कमी आदि) पर भी आपराधिक मुक़द्दमा और जेल का प्रावधान था; अब ऐसे मामलों में अधिकतर जुर्माना या चेतावनी ही रहेगी। इससे नागरिकों के रोज़मर्रा के जीवन में कम डर और कम आपराधिक शिकंजा रहेगा, खासकर “रोज़‑खर्चे वाले” छोटे उल्लंघनों पर।
दूसरा, व्यापारी, स्टार्ट‑अप और MSME को, क्योंकि अब
700 से अधिक प्रावधान “व्यापार सुगमता (ease of doing business)” के लिए अपराधमुक्त किए जा रहे हैं; यानी लाइसेंस, फॉर्मेटिविटी, रिटर्न जमा करने की छोटी‑मोटी देरी या तकनीकी गड़बड़ी पर जेल जैसी सजा कम होगी। दरअसल, उद्योग संगठनों (CII आदि) का मानना है कि अनुपालन का बोझ कम होगा, विवादों का निपटारा तेज़ होगा और निवेशकों का विश्वास बढ़ेगा।
तीसरा, निवेशक और बड़ी कंपनियाँ, क्योंकि अपराधमुक्त किए जा रहे उपबंधों की संख्या बहुत ज़्यादा होने से नियामक जोखिम (regulatory risk) और अचानक आपराधिक मुक़द्दमों की आशंका कम होगी जो निवेश‑अनुकूल वातावरण बनाने में मदद करती है।
FDI और कॉर्पोरेट भरोसा बढ़ाने के लिए “predictable” और कम‑दंडात्मक नियमन मॉडल बनता है जबकि गंभीर धोखाधड़ी या पर्यावरण/जन‑स्वास्थ्य जैसे गंभीर अपराधों के लिए सख़्त सजाएं अभी भी बरकरार रहती हैं।
चौथा, न्यायपालिका और प्रशासन को, क्योंकि छोटे‑मोटे आपराधिक मुक़द्दमों की संख्या कम होने से अदालतों पर दबाव घटेगा और गंभीर मामलों पर ज़्यादा ज़ोर लगाने को समय व संसाधन मिलेंगे। वहीं, ब्यूरोक्रेसी को भी अधिक नियम‑आधारित, दंड‑आधारित की तुलना में अनुपालन‑आधारित दृष्टिकोण अपनाने की प्रेरणा मिलती है।
संक्षिप्त शब्दों में कहें तो जनविश्वास विधेयक से सबसे ज़्यादा फायदा आम नागरिक, छोटे व्यापारी, MSME, स्टार्ट‑अप और निवेशकों को मिलता है, क्योंकि यह उनके लिए नियामक डर कम करता है और अनुपालन को आसान बनाता है, जबकि न्यायपालिका और अंतरिक्ष‑सुरक्षा जैसे गंभीर क्षेत्रों के लिए अभी भी सख़्त दंड व्यवस्था बरकरार रखी जाती है।
हालांकि जन विश्वास विधेयक की मुख्य आलोचनाएं इसके “ज़्यादा व्यापक और एक‑सूत्री संशोधन”, कार्मिक‑केंद्रित दंड‑निर्धारण, पर्यावरण और श्रम‑अधिकारों पर नरम दृष्टिकोण, और न्यायिक जवाबदेही के कमज़ोर होने से जुड़ी हैं।
पहला, व्यापक और ब्लैंकेट संशोधन की चिंता:
कई आलोचकों का कहना है कि विधेयक 79–80 केंद्रीय कानूनों के 780 से ज़्यादा प्रावधानों में लगभग एक ही दृष्टि से बदलाव कर रहा है, बिना हर कानून के संदर्भ और जटिलता को अलग‑अलग देखे। इसे “कट‑पेस्ट” तरह का उपाय बताया जाता है, जिससे कुछ जगह जरूरी आपराधिक दंड भी बिना विवेचना के हटाए जा सकते हैं जिससे जवाबदेही कमज़ोर हो सकती है।
दूसरा, नौकरशाहों को ज़्यादा व्यापक नियामक व न्यायिक शक्ति:
इस विधेयक में “निर्णायक अधिकारी” की नियुक्ति का प्रावधान है, जो बिना अदालत के जुर्माना लगाने की शक्ति रखेंगे। आलोचना यह है कि अधिकांश दंड‑निर्धारण न्यायपालिका से लेकर नौकरशाही में चला जाएगा, जिससे दुरुपयोग, भ्रष्टाचार या व्यक्तिगत दुर्व्यवहार जैसे जोखिम बढ़ सकते हैं।
तीसरा, पर्यावरण और सार्वजनिक वन के लिए जोखिम:
कई वातावरण‑संरक्षण, वन और प्रदूषण से जुड़े कानूनों से जेल जैसे कारावासी दंड हटाकर केवल जुर्माना लगाया जा रहा है। इसलिए आलोचकों का डर है कि बड़ी कंपनियाँ ऊँचा जुर्माना भी भरकर प्रदूषण या वन‑कटाई जारी रख सकती हैं, यानी “प्रदूषक भुगतान करता है” का सिद्धांत कमज़ोर हो सकता है।
चौथा, निगम‑केंद्रित और श्रमिक‑विरोधी दिशा में झुकाव:
कुछ विपक्षी दल और श्रम‑अधिकार संगठन इस विधेयक को “कॉर्पोरेट‑फ्रेंडली / एंटी‑लेबर” रूख वाला मानते हैं, क्योंकि छोटे‑मोटे उल्लंघनों पर सज़ा घटाने से कंपनियों को जवाबदेही घटाने का रास्ता मिल सकता है। उनका तर्क है कि कामगारों को अक्सर नियम‑उल्लंघन की सज़ा भुगतनी पड़ती है जबकि संस्थान‑प्रमुखों के लिए विधेयक राहत बन सकता है।
पांचवां, राज्यों के साथ असंतुलित समन्वय:
यह विधेयक केवल केंद्रीय कानूनों पर लागू होता है, जबकि ज़मीनी स्तर पर अधिकांश व्यावसायिक अनुपालन राज्य कानूनों के तहत होता है। इसलिए आलोचकों का कहना है कि जब तक राज्य सरकारें अपने स्थानीय कानूनों में इसी तरह की सुधार नहीं करतीं, तब तक जनता और व्यवसायियों को पूर्ण लाभ नहीं मिलेगा और केंद्र-राज्य स्तर पर नियामक व्यवस्था असमान रहेगी।
छठा, छोटे उल्लंघनों पर भी ऊँचा जुर्माना और “सुधार‑आधारित” रूख की कमी: कई मामलों में जेल हटाने की बजाय जुर्माने की राशि बढ़ाई जा रही है; इसे आलोचक आम नागरिक और छोटे व्यवसायियों के लिए आर्थिक बोझ बताते हैं। लिहाजा, कुछ विश्लेषकों की शिकायत है कि विधेयक में “सुधार‑आधारित” या “समझौता‑आधारित” दृष्टिकोण (जैसे जुर्माना से ज़्यादा शिक्षण‑प्रशिक्षण या रिहायशी‑सपोर्ट) कम दिखाई देता है, जिससे यह नियामक‑दंडात्मक रूख बने रहने का डर रहता है।
वास्तव में, जन विश्वास विधेयक के प्रभाव पर विशेषज्ञों यानी नीति‑विश्लेषक, न्याय‑शास्त्रियों, उद्योग संगठनों और सरकारी बयानों का रुख संतुलित है, क्योंकि एक तरफ यह व्यापार सुगमता और विश्वास‑आधारित शासन का बड़ा कदम माना जा रहा है, तो दूसरी तरफ जवाबदेही कमज़ोर होने और नियामक शक्ति के दुरुपयोग की चिंता भी ज़ाहिर की जा रही है।
पहला, सरकार और सत्ताधारी पक्ष की दृष्टि:
सरकार और सत्तारूढ़ गुट के विशेषज्ञ इसे “कानूनी ढांचे को मानवीय और व्यावहारिक” बनाने वाला कदम मानते हैं, जहाँ जेल‑आधारित दंड की जगह चेतावनी, परामर्श और जुर्माने जैसी चरणबद्ध प्रतिक्रिया आती है। उद्योग‑संगठन और अर्थ‑नीति विश्लेषकों का तर्क है कि इससे MSME, स्टार्ट‑अप और निवेशकों पर अनुपालन का बोझ कम होगा, जिससे “व्यापार सुगमता (Ease of Doing Business)” और “जीवन सुगमता (Ease of Living)” दोनों में सुधार आएगा।
दूसरा, न्याय‑शास्त्रियों और संस्थागत विशेषज्ञों का मूल्यांकन:
कई लोग इसे “दंड‑आधारित शासन” से “विश्वास‑आधारित शासन” की ओर सकारात्मक बदलाव मानते हैं, खासकर जहाँ बिना इरादे की छोटी गलतियों के लिए जेल जैसी कठोर सज़ा नहीं रहेगी। साथ ही, कुछ विश्लेषक चेतावनी देते हैं कि निर्णायक अधिकारियों को जुर्माना निर्धारित करने की बड़ी शक्ति देने से जवाबदेही और पारदर्शिता की व्यवस्था मज़बूत होनी चाहिए, नहीं तो यह दुरुपयोग का दरवाज़ा खोल सकता है।
तीसरा, विपक्ष और सामाजिक‑कार्यकर्ताओं की टिप्पणी:
विपक्षी दलों के विशेषज्ञ इस विधेयक को “कॉर्पोरेट‑फ्रेंडली” या श्रम‑विरोधी रूख वाला बताते हैं, खासकर उन संशोधनों पर जहाँ पर्यावरण और श्रम‑संरक्षण से जुड़े कानूनों के अपराधीकरण को कम किया गया है। इसलिए पर्यावरण और श्रम‑अधिकार संगठनों के विशेषज्ञ का डर है कि गंभीर प्रदूषण या श्रमिक अधिकारों के उल्लंघन के लिए जेल की जगह ज़्यादा जुर्माना होने से “प्रदूषक भुगतान करता है” और “कंपनी‑प्रमुख जवाबदार नहीं” जैसी स्थिति बन सकती है।
चौथा, विश्लेषकों का निष्कर्षीय नज़रिया: कई अर्थ‑नीति और सरकारी‑नीति विश्वास इसे “सही दिशा में एक बड़ा कदम” मानते हैं, बशर्ते कार्यान्वयन में पारदर्शिता, नियमन‑समीक्षा और न्यायिक जांच की व्यवस्था बनाए रखी जाए।
वहीं, समग्र रूप से विशेषज्ञ यह कहते हैं कि विधेयक का वास्तविक असर निम्नलिखित बातों पर निर्भर होगा- पहला,
जुर्मानों के स्तर पर कि क्या वे आम आदमी के लिए अतिरिक्त बोझ न बन जाएं। दूसरा, निर्णायक अधिकारियों की नियुक्ति और निगरानी पर, और तीसरा, राज्य स्तर के अनुरूप सुधारों पर,क्योंकि ज़्यादातर अनुपालन राज्य कानूनों के तहत होता है।
वास्तव में किसी अपराध के लिए सजा के पीछे व्यक्ति के सुधार का उद्देश्य अवश्य होना चाहिए। समस्या यह है कि छोटे-मोटे अपराध में एक बार व्यक्ति फंस गया, जेल चला गया तो उसकी जिंदगी बर्बाद हो जाती है। कई बार सुधारने का अवसर भी उसके पास नहीं रह जाता। समाज उसको विश्वास मिले और उसे भरोसा हो कि सुधरने पर हमें समाज का समर्थन मिलेगा तो निश्चित रूप से व्यक्ति सुधरने की कोशिश करता है।
केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने इस संदर्भ में ठीक ही कहा कि इसका उद्देश्य भरोसे की एक संस्कृति बनाना है। विश्वास की संस्कृत भय के आधार पर नहीं बल्कि कर्तव्य के आधार पर बनेगी। यह भारत के अपराध संबंधी कानून में व्यापक सुधार का एजेंडा है। कल्पना करिए, एक साथ 79 कानून में 784 संशोधन, कितने व्यापक अध्ययन और गहन विमर्श के बाद यह विधेयक तैयार हुआ होगा!






