पंडित मोहन लाल बड़ौली, प्रदेश अध्यक्ष, भाजपा हरियाणा

6 अप्रैल 1980 – यह वो दिन है जब भारतीय जनता पार्टी का जन्म हुआ। यह केवल एक राजनीतिक दल की स्थापना नहीं थी, बल्कि भारतीय लोकतंत्र में एक वैचारिक विकल्प के रूप में उभरती उस शक्ति का आरंभ था, जिसने आने वाले दशकों में राजनीति की दिशा और परिभाषा दोनों को बदल दिया। भाजपा की जड़ें भारतीय जनसंघ से जुड़ी हैं, जिसकी स्थापना 1951 में डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने की थी। उस समय उन्होंने स्पष्ट कहा था कि भारत की राजनीति को “राष्ट्र प्रथम” के सिद्धांत पर चलना चाहिए और राष्ट्रीय एकता सर्वोपरि होनी चाहिए। आगे चलकर पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने “एकात्म मानववाद” का दर्शन दिया, जिसने पार्टी की वैचारिक दिशा तय की। एक ऐसी राजनीति जो अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक विकास पहुंचाने की बात करती है। भाजपा का गठन ऐसे समय में हुआ जब देश आपातकाल के काले अध्याय और शर्मसार कर देने वाले कड़वे अनुभव से बाहर निकल रहा था।
लोकतंत्र को मजबूत करने और वैकल्पिक राजनीति देने का संकल्प ही इस पार्टी की नींव बना। पार्टी के शुरुआती नेताओं में अटल बिहारी वाजपयी और लाल कृष्ण आडवाणी जैसे व्यक्तित्व थे, जिन्होंने स्थापना के समय यह स्पष्ट किया था कि भाजपा “सत्ता नहीं, सिद्धांतों की राजनीति” करेगी और लोकतंत्र को मजबूत करने में अग्रणी भूमिका निभाएगी, लेकिन यह यात्रा आसान नहीं थी।
1980 में पार्टी की नींव रखने के बाद 1984 में लोकसभा चुनाव भाजपा के लिए सबसे कठिन परीक्षा लेकर आया। इस चुनाव में पार्टी को कई झटके भी मिले तो कुछ राहत भी। पार्टी ने लगभग 229 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन सीटों के लिहाज से परिणाम बेहद निराशाजनक रहे। पार्टी 229 में से केवल 2 सीटों पर ही जीत सकी और पार्टी के सबसे बड़े नेता अटल बिहारी वाजपेयी भी इस चुनाव में हार गए। उस समय पार्टी के दो ही सांसद चुने गए – एक गुजरात की मेहसाना लोकसभा सीट से डॉ ए.के पटेल और दूसरे आंध्र प्रदेश की हनमकोंडा लोकसभा से सी. जंगा रेड्डी। इसके बावजूद एक बहुत बड़ी राहत पार्टी को यह मिली कि इस चुनाव में भले ही पार्टी ने दो सीटें ही जीती, लेकिन वोट शेयर के मामले में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। इस चुनाव में बीजेपी को करीब 7.74 प्रतिशत मत मिले और लगभग 1.8 करोड़ मतदाताओं ने वोट देकर विश्वास जताया।
उस दौर में कई राजनीतिक विश्लेषकों ने भाजपा के भविष्य पर सवाल उठाए, लेकिन पार्टी ने इसे अंत नहीं, बल्कि नई शुरुआत माना। यही वो क्षण था जिसने पार्टी को आत्म मंथन और पुनर्निर्माण के लिए प्रेरित किया। संगठन ने अपनी जड़ों को और मजबूत किया, कार्यकर्ताओं ने बूथ स्तर तक पहुंचकर जनसंपर्क बढ़ाया और विचारधारा को जन-जन तक पहुंचाने का अभियान शुरू किया।
1990 का दशक भाजपा के लिए उभार का काल बना। राम आन्दोलन, संगठनात्मक विस्तार और जन आन्दोलन की राजनीति ने पार्टी को नई पहचान दी। इसके बाद अटल बिहारी वाजपयी के नेतृत्व में बनी सरकार ने यह दिखाया कि भाजपा केवल विपक्ष की पार्टी नहीं, बल्कि स्थिर और संवेदनशील शासन देने में सक्षम है। इसके बाद 2014 में श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में भाजपा ने पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता प्राप्त की-282 सीटें, लगभग 31 प्रतिशत वोट शेयर और 17 करोड़ से अधिक मत।
2019 में यह समर्थन और बढ़ा-303 सीटें, 37.4 प्रतिशत वोट शेयर और 22 करोड़ से अधिक वोट। यह वृद्धि केवल चुनावी सफलता नहीं, बल्कि जनविश्वास के विस्तार का प्रमाण है। यहां भाजपा की सबसे बड़ी विशेषता उभरकर सामने आती है कि यह पार्टी लोकतांत्रिक मूल्यों में आस्था रखने वाली है। यह वो पार्टी है जहां एक साधारण पृष्ठ भूमि से आने वाला व्यक्ति देश का प्रधानमंत्री बन सकता है। श्री नरेन्द्र मोदी का “चाय बेचने वाले” से प्रधानमंत्री तक का सफर इसी लोकतांत्रिक शक्ति का प्रतीक है।
इसी प्रकार संगठन में भी शीर्ष पदों तक पहुंचने का रास्ता कार्यकर्ताओं के लिए खुला है। नितिन नबीन, जे.पी.नड्डा और इससे पहले अमित शाह जैसे नेता जमीनी स्तर से उठकर राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। यह दर्शाता है कि भाजपा में पद नहीं, बल्कि परिश्रम और प्रतिबद्धता का मूल्य है। यह वो पार्टी है जहाँ प्रत्येक कार्यकर्ता यह विश्वास रख सकता है कि वो शीर्ष तक पहुंच सकता है, भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने हमेशा इस भावना को रेखांकित किया है।
प्रधानमंत्री मोदी ने कई अवसरों पर कहा है कि “भाजपा में कोई भी कार्यकर्ता शीर्ष तक पहुंच सकता है, क्योंकि यह अवसर और समानता का संगठन है।” वहीं अमित शाह ने भी कई मौकों पर इसे “कार्यकर्ताओं के पसीने और तपस्या से बना संगठन” बताया है। आज 2 सांसदों से शुरू हुई भाजपा 2014 से लगातार केंद्र की सत्ता संभाले हुए है और 2047 तक विकसित भारत के सपने के साथ आगे बढ़ रही है। भाजपा करोड़ों सदस्यों के साथ विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के रूप में स्थापित हो चुकी है। यह यात्रा केवल आंकड़ों की कहानी नहीं, बल्कि उस विश्वास की कहानी है जो जनता ने इस विचारधारा में जताया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस परिवर्तन के प्रतीक हैं। वे आज़ादी के बाद जन्मे पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में नया अध्याय जोड़ते हुए सबसे लंबे समय तक निर्वाचित नेता बनकर जनसेवा करने का गौरव प्राप्त किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने लगातार तीसरी बार गैर-कांग्रेस सरकार बनाकर भारतीय राजनीति में स्थिरता को नए आयाम दिए। भाजपा की यह यात्रा हमें यह सिखाती है कि लोकतंत्र में केवल वंशवाद नहीं, बल्कि अवसरवादिता के बजाय अवसर की समानता भी संभव है। अगर विचार मज़बूत हो, संगठन सशक्त हो और नेतृत्व प्रतिबद्ध हो तो कोई भी लक्ष्य असम्भव नहीं होता है।
आज जब हम 6 अप्रैल को स्थापना दिवस मना रहे हैं, यह सिर्फ एक राजनितिक दल का उत्सव नहीं, बल्कि उस विश्वास का पर्व है जो भारत के भविष्य को उज्जवल बनाने के लिए समर्पित है। यह एक आन्दोलन है जो राष्ट्र निर्माण के लिए निरंतर आगे बढ़ रहा है और उसकी सबसे बड़ी ताकत है – सबका साथ, सबका विश्वास और सबका विकास।







