राजेश श्रीवास्तव

करीब 36 दिन पहले जब अमेरिका-इजरायल ने मिलकर ईरान जैसे देश पर एक साथ हमला बोला था और उनके सुप्रीम लीडर खामनेई को परिवार समेत मौत के घाट उतार दिया था तब लग रहा था कि अमेरिका और इजरायल का सामना करने का माद्दा ईरान में नहीं हैं लेकिन अमेरिका तक पहुंच न हो पाने के चलते जिस तरह ईरान ने होर्मुज को अपना हथियार बनाते हुए अपनी मिसाइल शक्तियों के सहारे अमेरिका और इजरायल जैसे दोनों शक्तिशाली देशों को इस युद्ध में कई बार घुटनों पर लाकर दिखा दिया, उससे साफ है कि यह युद्ध भले ही अमेरिका ने शुरू किया हो पर यह युद्ध खत्म करने की क्षमता ईरान में ही दिख रही है। एक तरफ दृढ़ इरादों वाला ईरान है तो दूसरी तरफ बार-बार यूटर्न लेने वाला अमेरिका का ट्रंप है जिसकी न तो बात का वजन है और न काम का।
1० दिन का युद्ध विराम का ऐलान करने वाला ट्रंप एक दिन भी हमले करने से नहीं चूका। न केवल अमेरिका बल्कि उसका साथी इजरायल भी इस हरकत में शामिल रहा। अब कह रहा है कि 48 घंटे बचे हैं उसके बाद बड़े हमले करूंगा तो आखिर ट्रंप ने कब बड़े हमले नहीं किये लेकिन वह बार-बार भूल जाता है कि ईरान वेनेजुएला नहीं है कि वह झुक जाये। ईरान के पास शक्तिशाली आईआरजीसी है जो अंतिम सांस तक अमेरिका को जवाब देगा। अमेरिका को लगता था कि उसके पास दुनिया की सबसे उन्नत लड़ाकू विमानों की श्रृंखला है। रविवार को ईरान ने उसके सबसे उन्नत छह लड़ाकू विमानों में से एक एफ-15 जिसकी कीमत करीब 115 मिलियन डॉलर है, को मार गिराया । दूसरी तरफ दो एफ-35 को भी ढेर कर दिया। यह अमेरिका के लिए सबसे बड़ा झटका है। अमेरिका अपने इस विमान की तारीफ करता रहा है लेकिन ईरान युद्ध ने इस जेट की प्रतिष्ठा खराब कर दी है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या दुनिया का सबसे एडवांस यह जेट ईरान में फ़ेल हो गया है।

अमेरिका का एफ-35 लाइटनिग पांचवीं पीढ़ी का स्टेल्थ जेट है। इसे इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह दुश्मन के रडार की नजर में नहीं आए। यह सुपरसोनिक गति से उड़ते हुए दूसरे विमानों और जमीनी सेनाओं के साथ लाइव डाटा साझा कर सकता है। ऐसे में कागज पर यह विमान अजेय लगता है लेकिन ईरान में 28 फरवरी से चल रही लड़ाई की कहानी अलग रही है। जेट के वर्जन के आधार पर एक एफ-35 विमान की कीमत 85 मिलियन डॉलर से लेकर 115 मिलियन डॉलर होती है। यह अब तक बनाए गए सबसे महंगे युद्धक विमानों में से एक है। ऐसे विमान का युद्ध में गिरना या क्षतिग्रस्त हो जाना इसकी सैन्य प्रतिष्ठा के साथ-साथ आर्थिक तौर पर भी एक बड़ा झटका साबित होता है। विमानों की स्टेल्थ यानी छिपकर उड़ने की क्षमता सवालों में आ गई है। साफ है स्टेल्थ विमानों को उनके हीट सिग्नेचर के जरिए पकड़ा जा सकता है।
ईरान ने इन विमानों के खिलाफ 358 लोइटरिग म्यूनिशन या कम दूरी की ‘सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल’ का इस्तेमाल किया हो सकता है। अमेरिका और इजरायल ने 28 फरवरी के बाद से ईरान पर भीषण हवाई हमले किए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हालिया दिनों में बार-बार ये दावा किया है कि उनकी फौज ने ईरान की सैन्य क्षमताओं को पूरी तरह खत्म कर दिया है। इन दावों के बीच ईरान में अमरिकी लड़ाकू विमानों का गिरना और बड़ा झटका है। ईरान में एफ-35 विमानों का मार गिराया जाना यह सवाल खड़ा करता है कि क्या दुनिया का सबसे बेहतरीन जेट भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। ईरान युद्ध के मैदान में जो दिखा है, उसने ना सिर्फ इस विमान की ताकत बल्कि डोनाल्ड ट्रंप और अमेरिकी विशेषज्ञों की ओर से किए जाने वाले दावों को भी संदेह के घेरे में ला दिया है।
रक्षा विशेषज्ञ संदीप उन्नीथन का कहना है कि विमानों की स्टेल्थ (छिपकर उड़ने की क्षमता) को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया है। ईरान युद्ध से साफ होता है कि विमानों को उनके ‘हीट सिग्नेचर’ (गर्मी के निशान) के जरिए पकड़ा जा सकता है। हालांकि यह साफ नहीं है कि किस मिसाइल और तरीके से ईरान ने ये सफल हमले किए हैं। सिर्फ इतना ही नहीं, ईरान ने अमेरिका के एक पायलट जो अभी लापता है, उसकी मां को एक संदेश भेजा है कि उनका बेटा ट्रंप राज में सुरक्षित नहीं है। अपने पायलट को बचाने के लिए ईरान से 48 घंटे के लिए युद्ध रोकने की अपील की है लेकिन ईरान रुकने को तैयार नहीं है।
सूत्रों का कहना है कि अगर यह पायलट ईरान के हाथ लग जाता है तो फिर अमेरिका के लिए यह एक करारी शिकस्त होगी। अगर अमेरिकी पायलट ईरान के हाथ लगता है तो अमेरिकी जनता जो पहले से ही ट्रंप के विरोध में मैदान में उतरी है, उसका जीना मुहाल कर देगी। इसीलिए ट्रंप का यह प्रयास है कि किसी तरह अपने पायलट को खोज कर लायें। अब हालांकि यह समय बतायेगा कि यह पायलट किसके हाथ लगेगा लेकिन इतना तय है कि इस युद्ध के थमने के अभी कोई आसार नजर नही आ रहे हैं। यह युद्ध निश्चित रूप से लंबा चलेगा और इसके अंत में जियो पालिटिक्स में बड़ा बदलाव भी दिखेगा लेकिन यह भी तय है कि इस युद्ध में ईरान के लिए जल्दी टूटने का कोई कारण नहीं दिख रहा है. हो सकता है देर-सबेर अमेरिका को ही झुकना पड़े।








