विवेक रंजन श्रीवास्तव

आजकल राजनीति के गलियारे किसी गंभीर चिंतन और राष्ट्र निर्माण के केंद्र नहीं रह गए बल्कि वे मनोरंजन के ऐसे भव्य ऑडिटोरियम बन गए हैं जहाँ हर वक्त कोई न कोई तमाशा जारी रहता है। दुनिया भर में सत्ता की कुर्सी अब जनसेवा का पवित्र साधन कम और किसी पॉपुलर ‘रिएलिटी शो’ का चमकता हुआ इनाम ज्यादा लगने लगी है। अगर हम गौर से देखें तो साफ पता चलता है कि जनता अब पुरानी नीतियों की नीरसता और उबाऊ भाषणों से पूरी तरह थक चुकी है। उसे शासन के गंभीर चेहरे में भी अब शायद भरपूर ड्रामे की दरकार रहने लगी है। इसी का नतीजा है कि दुनिया के तमाम मुल्कों में अब ऐसे चेहरों का बोलबाला है जो किसी न किसी रूप में पर्दे या मंच के जादूगर रहे हैं।
पड़ोसी देश नेपाल की मिसाल लीजिए जहाँ एक चॉकलेटी पॉप गायक प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने के लिए चुन लिया गया है। उस वक्त ऐसा लगा जैसे देश की सदियों पुरानी और पेचीदा समस्याओं का समाधान अब गंभीर फाइलों या भारी-भरकम चर्चाओं से नहीं बल्कि गिटार की सुरीली धुनों और पॉप संगीत की ताल पर होगा। वहां की जनता सुर-ताल पर इतनी मुग्ध हो गई कि उसे देश के बजट के बिगड़ते तालमेल से ज्यादा इस बात की फिक्र सताने लगी कि उनके प्रधानमंत्री की पिच कहीं खराब न हो जाए। यह तो महज एक झांकी भर थी ।
असली धमाका तो हुआ था यूक्रेन में जहां एक मंजा हुआ कॉमेडियन सीधे राष्ट्रपति भवन के आलीशान कमरों तक जा पहुंचा है। वहां की जनता को शायद यह गुमान रहा होगा कि अगर हंसी-मजाक और लतीफों के बीच देश की गाड़ी चल जाए तो गम के दिन आसानी से कट जाएंगे मगर कुदरत की विडंबना देखिए कि जब इस सियासी कॉमेडी की स्क्रिप्ट में युद्ध का खूनी मंजर और बारूद की गंध दाखिल हुई तो बरसों पुराने हंसी के फव्वारे पल भर में खौफ के गहरे साये में बदल गए।
भारत के स्टैंडअप कॉमेडियन खुद को सत्ता के गलियारों के पास देखने के ख्वाब ही नहीं बुन रहे , पंजाब के मुख्यमंत्री के रूप में अपने सपने सच होते देख देख हंस रहे हैं।
सरहद पार पाकिस्तान का हाल तो इससे भी कहीं ज्यादा निराला और दिलचस्प रहा है। वहां मिलिट्री हमेशा सत्ता में रही है पर क्रिकेट की पिच और पार्लियामेंट की गैलरी का बुनियादी अंतर ही वहां पूरी तरह मिटा दिया गया। जब मैदान के मशहूर कप्तान साहब ने प्रधानमंत्री पद का हलफ उठाया तो पूरे मुल्क की रगों में यह उत्साह दौड़ गया कि अब हर मुसीबत की गेंद पर सीधा छक्का लगेगा और महंगाई की खतरनाक गुगली पर देश कभी क्लीन बोल्ड नहीं होगा। लोगों को लगा कि अब सियासत भी क्रिकेट की तरह फटाफट अंदाज़ में चलेगी और नतीजे तुरंत आएंगे मगर अफसोस कि राजनीति का यह खेल किसी रोमांचक टी-20 के बजाय एक थकाऊ टेस्ट मैच की तरह लंबा खिंचता चला गया। अंत में हालत यह हुई कि कप्तान को बिना किसी ‘मैन ऑफ द मैच’ के खिताब के ही सिर झुकाकर पवेलियन का रास्ता पकड़ना पड़ा और मिलिट्री ने उन्हें जेल भेज दिया है।
वहीं दूसरी ओर बांग्लादेश की दास्तां भी किसी थ्रिलर फिल्मी पटकथा से कमतर नहीं रही। वहां निर्वाचित होने और निर्वासन की जिंदगी गुजारने के बीच चूहे-बिल्ली का ऐसा खेल चला कि लोकतंत्र तमाशा बनकर रह गया। वहां तो हद तब हो गई जब देश की कमान एक नोबेल पुरस्कार विजेता दार्शनिक को थमा दी गई। यह कुछ वैसा ही मंजर था जैसे किसी बेहद पेचीदा और जानलेवा मेडिकल ऑपरेशन के लिए किसी माहिर सर्जन के बजाय किसी महान कवि या दार्शनिक को ओटी में बुला लिया गया हो। वैचारिक धरातल पर जो बातें सुनने में बहुत अच्छी लगती हैं वे प्रशासनिक मशीनरी के पुर्जों को चलाने में अक्सर नाकाम साबित होती हैं।
अब जरा नजर डालिए दुनिया के सबसे ताकतवर और पुराने लोकतंत्र कहलाने वाले मुल्क अमेरिका पर। वहां जब एक ऐसी अतरंगी और विवादित शख्सियत राष्ट्रपति की गद्दी संभालती है जिसकी अदाएं और बयानबाजी किसी सर्कस के जोकर की याद दिलाती हैं तो पूरी दुनिया एक अजीब से खौफ से थर्रा उठती है। अमेरिका में अब लोकतंत्र ‘ग्रेट इंडियन लाफ्टर चैलेंज’ जैसे किसी मुकाबले में तब्दील हो चुका है जहाँ जो उम्मीदवार जितना ज्यादा शोर मचा सकता है और जितनी बेतुकी बातें कर सकता है वही सबसे बड़ा बाजीगर और जनता का चहेता माना जाता है। सुबह कुछ शाम कुछ , सारी दुनिया उनके बवाल से त्रस्त है।
ग्वाटेमाला जैसे देशों में भी एक टीवी कलाकार ने पर्दे की बनावटी मुस्कान को संसद की भारी-भरकम गंभीरता में बदलने की नाकाम कोशिश की पर जैसे ही राजनीति का यह चटक मेकअप उतरा तो असलियत का बदरंग और झुर्रियों भरा चेहरा सबके सामने आ गया। फिलीपींस की गलियों में तो किसी मारधाड़ वाले फिल्मी हीरो ने ही देश की बागडोर संभाल ली। वहां की जनता को शायद लगा कि पर्दे पर गुंडों के दांत खट्टे करना और मुल्क का जटिल बजट पास करना एक ही बात है।
आइसलैंड की कहानी तो इन सबसे अलग और कहीं ज्यादा हैरतअंगेज है। वहां एक रॉक स्टार ने महज एक मजाक के तौर पर अपनी राजनीतिक पार्टी बनाई और देखते ही देखते जनता ने उसे सचमुच मेयर की गौरवशाली कुर्सी पर बैठा दिया। लोग शायद भूल गए कि रॉक कॉन्सर्ट की भीड़ और नगर निगम की फाइलों के बीच जमीन-आसमान का फर्क होता है। आज की कड़वी हकीकत तो यह है कि अब सफल नेता बनने के लिए बड़े-बड़े शास्त्रों को पढ़ने या समाजशास्त्र की समझ रखने की रत्ती भर भी जरूरत नहीं रही। अब तो बस अभिनय का एक छोटा सा क्रैश कोर्स करने और कैमरे के सामने पोज देने की कला में माहिर होने की दरकार है।
जनता अब वोट देकर अपनी किस्मत का फैसला नहीं करती बल्कि वह अपने चहेते फिल्मी या सियासी कलाकार को किसी सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर की तरह ‘सब्सक्राइब’ करती है। राजनीति का यह नया और डिजिटल संस्करण अब ‘लोकतंत्र’ नहीं रह गया बल्कि पूरी तरह से ‘रीयल-तंत्र’ या ‘रील-तंत्र’ बन चुका है। जो जितना बड़ा मदारी है और जिसके पास जितना बड़ा मजमा है उसकी डमरू पर उतनी ही बड़ी भीड़ खिंची चली आती है। पुराने जमाने के वे गंभीर और नीरस नेता जो आंकड़ों और सिद्धांतों की बात करते थे अब किसी पुराने म्यूजियम की मोम प्रतिमा बनाकर शोभा लायक रह गए हैं। आज की पब्लिक को ठोस पॉलिसी से ज्यादा चटपटी पंचलाइन की भूख है। उसे विकास के नक्शे नहीं बल्कि भाषणों में लगने वाले जोरदार ठहाके चाहिए। जब तक मंच पर यह नौटंकी और नाच-गाना जारी है तब तक नेताजी की कुर्सी पूरी तरह सुरक्षित है वरना जिस दिन जनता का मनोरंजन कम हुआ उसी दिन इस कलाकार का बोरिया-बिस्तर बंधना और उसका परदे से गायब होना पूरी तरह तय है। माफिया वाले नेता , सिद्धांत प्रिय राजनेता , जनता के सुख दुख में जुड़े जन नायक भी अब सियासत के इस सर्कस में दर्शक बनकर रह जाते हैं। नेता और कलाकार के बीच की लकीर बहुत धुंधली हो चुकी है। अब यह देखना वाकई दिलचस्प होगा कि जब तालियों की गूँज कम होगी और हकीकत के सवाल सामने आएंगे तब ये पर्दे के सितारे देश की डूबती नैया को किनारे कैसे लगाएंगे। शायद तब तक कोई नया मदारी नया डमरू लेकर मंच पर हाजिर हो चुका होगा और हम फिर से एक नए तमाशे में खो जाएंगे।






