कहा—कटौती का फायदा आमजन की बजाय तेल कंपनियों को, 12 साल में 44 लाख करोड़ वसूली पर उठाए सवाल
चंडीगढ़/रेवाडी, 28 मार्च 2026 – स्वयंसेवी संस्था ‘ग्रामीण भारत’ के अध्यक्ष वेदप्रकाश विद्रोही ने पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में कटौती को लेकर केंद्र सरकार और भाजपा नेताओं पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस कटौती का वास्तविक लाभ आम उपभोक्ताओं तक नहीं पहुंचेगा, जबकि भाजपा नेता इसका अनावश्यक महिमामंडन कर रहे हैं।
विद्रोही ने कहा कि जब पेट्रोल पर 13 रुपये और डीजल पर 10 रुपये प्रति लीटर एक्साइज ड्यूटी घटाने का फायदा उपभोक्ताओं को मिलना ही नहीं है, तो ऐसी कटौती का कोई औचित्य नहीं रह जाता। उनके अनुसार, इस निर्णय से आमजन को राहत मिलने के बजाय तेल कंपनियों को सीधा फायदा होगा।
उन्होंने सवाल उठाया कि जब कीमतों में कोई वास्तविक कमी नहीं हो रही, तो भाजपा नेता किस आधार पर प्रधानमंत्री की प्रशंसा कर रहे हैं। विद्रोही ने आरोप लगाया कि पिछले 12 वर्षों में केंद्र सरकार ने एक्साइज ड्यूटी में भारी बढ़ोतरी की है। उनके मुताबिक, कांग्रेस शासनकाल में डीजल पर 3.46 रुपये प्रति लीटर एक्साइज ड्यूटी थी, जिसे बढ़ाकर 31.83 रुपये तक पहुंचा दिया गया। इसी तरह पेट्रोल पर 9.2 रुपये से बढ़ाकर 32.98 रुपये प्रति लीटर कर दी गई।
विद्रोही ने दावा किया कि इस दौरान सरकार ने आम जनता से करीब 44 लाख करोड़ रुपये की वसूली की है और पूछा कि यह राशि आखिर कहां खर्च हुई। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जब-जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ीं, तब सरकार ने पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ा दिए, लेकिन कीमतें घटने पर उसका लाभ उपभोक्ताओं को नहीं दिया गया।
उन्होंने कहा कि हालिया एक्साइज कटौती का भी वही हाल होगा और इसका लाभ या तो सरकारी खजाने में जाएगा या तेल कंपनियों को मिलेगा। आम जनता को वास्तविक राहत तभी मिलेगी, जब पेट्रोल-डीजल के दामों में कम से कम 10 रुपये प्रति लीटर की कमी दिखाई दे।
विद्रोही ने आरोप लगाया कि मौजूदा स्थिति में बिना कीमत घटाए एक्साइज ड्यूटी में कटौती का प्रचार करना जनता को गुमराह करने जैसा है। उन्होंने भाजपा पर आरोप लगाया कि सत्ता के बल पर इस फैसले का प्रायोजित महिमामंडन कर जनता को ठगने और उसके साथ धोखाधड़ी की जा रही है।
यह बयान उस व्यापक बहस को फिर से सामने लाता है, जिसमें सवाल उठता है कि टैक्स में कटौती का वास्तविक लाभ आम उपभोक्ता तक क्यों और कैसे पहुंचे। सरकार और विपक्ष के बीच इस मुद्दे पर आरोप-प्रत्यारोप के बीच सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या पेट्रोल-डीजल की कीमतों में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जा रही है, या फिर आर्थिक फैसले राजनीतिक प्रचार का माध्यम बनते जा रहे हैं।








