प्रमोद दीक्षित मलय

चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा अर्थात वर्ष प्रतिपदा, हिन्दू कालगणना के अनुसार नववर्ष के प्रारम्भ का शुभ दिन है। इस वर्ष 19 मार्च को ‘रौद्र’ नामक विक्रम संवत् 2083 का प्रथम दिवस है। प्रत्येक संवत् वर्ष का एक नाम होना विक्रम संवत् की विशेषता है। ‘सिद्धार्थ’ नामक संवत् की विदाई के साथ ही जन-जन ‘रौद्र’ संवत् का स्वागत-अभिनंदन करेगा।
रौद्र संवत् के अधिपति बृहस्पति होंगे, जो ज्ञान, विवेक और धर्म के प्रतीक हैं, तथा मंगल मंत्री के रूप में रहेंगे, जो प्रजा में साहस, ओज और ऊर्जा का संचार करेंगे। यद्यपि भारत में आज भी सामान्य कार्य-व्यवहार अंग्रेज़ी ग्रेगेरियन कैलेंडर के अनुसार संपन्न होते हैं, किन्तु आध्यात्मिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक परंपराओं का आधार विक्रम संवत् ही है।
विश्व में प्रचलित विभिन्न कालगणना प्रणालियों—जैसे हिन्दू, चीनी, मिस्री, पारसी, तुर्की, यहूदी, रोमन और हिजरी—में हिन्दू कालगणना प्रणाली सर्वाधिक प्राचीन, वैज्ञानिक और प्रामाणिक मानी जाती है। वर्ष प्रतिपदा अनेक ऐतिहासिक घटनाओं से जुड़ी हुई है। मान्यता है कि इसी दिन सृष्टि की रचना का प्रारम्भ हुआ। लंका विजय के बाद अयोध्या में श्रीराम का राज्याभिषेक हुआ तथा युधिष्ठिर ने भी राज्यारोहण कर अपने नाम का संवत् चलाया।
इसी तिथि को सिखों के द्वितीय गुरु, गुरु अंगद देव जी तथा सिंधी समाज के आराध्य संत झूलेलाल का प्राकट्य हुआ। स्वामी दयानंद सरस्वती ने इसी दिन आर्य समाज की स्थापना की तथा डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना भी इसी दिन की। इसी दिन से शक्ति और भक्ति का पर्व चैत्र नवरात्र भी प्रारम्भ होता है। ग्रेगेरियन कैलेंडर में 57 वर्ष जोड़ने पर विक्रम संवत् प्राप्त होता है।
हिन्दू कालगणना प्रणाली की विशेषता यह है कि इसमें निमेष से लेकर परमाणु, अणु, त्रसरेणु, त्रुटि, काष्ठा और लव जैसी सूक्ष्म इकाइयों से लेकर युग, मन्वंतर और कल्प तक की गणना की जाती है। किसी भी धार्मिक अनुष्ठान से पूर्व संकल्प मंत्र में युग, मन्वंतर, संवत्, तिथि, वार, मास आदि का उल्लेख कर ब्रह्मांडीय समय से स्वयं को जोड़ा जाता है।
यह प्रणाली सूर्य, चंद्र और पृथ्वी की गतियों पर आधारित है। एक वर्ष को दो अयन, बारह मास, चौबीस पक्ष, बावन सप्ताह और सत्ताईस नक्षत्रों में विभाजित किया गया है। सैकड़ों वर्षों बाद होने वाली खगोलीय घटनाओं—जैसे सूर्यग्रहण, चंद्रग्रहण, पूर्णिमा, अमावस्या और पर्व-त्योहार—की सटीक जानकारी पंचांग के माध्यम से मिलती है।
ज्योतिषाचार्य लगध ने ‘ज्योतिष वेदांग’ में कालमापन की प्रणाली प्रस्तुत की। सम्राट विक्रमादित्य की सभा के नवरत्नों में से वराहमिहिर ने ‘पंचसिद्धांतिका’ और ‘वृहत्संहिता’ जैसे ग्रंथों की रचना कर विज्ञान को समृद्ध किया। उज्जैन प्राचीन काल में कालगणना का प्रमुख केंद्र रहा, जैसे इंग्लैंड में ग्रीनविच है। जयपुर और दिल्ली के जंतर-मंतर वेधशालाएँ आज भी इस ज्ञान परंपरा का प्रमाण हैं।
नववर्ष के स्वागत के दो भिन्न स्वरूप विश्व में दिखाई देते हैं। एक ओर 1 जनवरी को शोर-शराबे, पटाखों और उत्सवों के साथ नववर्ष मनाया जाता है, वहीं दूसरी ओर हिन्दू नववर्ष प्रकृति के उल्लास और नवजीवन के साथ आता है।
वसंत ऋतु में धरती नव सौंदर्य से सुसज्जित हो उठती है। खेतों में लहलहाती फसलें, सरसों का पीला रंग, पलाश के केसरिया फूल, आम की बौर और पक्षियों का मधुर कलरव वातावरण को आनंदमय बना देते हैं। हर ओर नवचेतना और नवजीवन का संचार होता है।
इस दिन घर-घर में कलश स्थापना, भगवा ध्वज, यज्ञ-हवन, पूजन और बड़ों का आशीर्वाद लेने की परंपरा है। समाज में सह-अस्तित्व, करुणा, दया, समता और बंधुत्व की भावना प्रबल होती है।
यह नव संवत् सभी के लिए सुख, समृद्धि, शांति और उन्नति का वाहक बने, इसी मंगलकामना के साथ आप सभी को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं।





