गलत स्रोतों से कमाया धन दुखों का कारण बनता है

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ईमानदारी और आत्मसम्मान मानव जीवन के दो अनमोल रत्न

– एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

गोंदिया। सृष्टि के रचयिता ने मनुष्य को अन्य सभी जीवों से अलग एक विशेष वरदान दिया है—वह है उसकी बौद्धिक क्षमता। इसी क्षमता के कारण मनुष्य अपने जीवन को सही दिशा भी दे सकता है और गलत मार्ग पर भी जा सकता है। बचपन में मनुष्य स्वभाव से निष्कपट और निर्मल होता है, इसलिए बड़े-बुजुर्ग बच्चों को ईश्वर का स्वरूप मानते हैं।

जैसे-जैसे व्यक्ति बड़ा होता है, जीवन में अनेक आकर्षण सामने आते हैं। इनमें सबसे प्रमुख आकर्षण धन का होता है। यदि मनुष्य अपनी बुद्धि का उपयोग ईमानदारी और आत्मसम्मान के साथ करता है तो उसका जीवन सुखमय और सफल बन जाता है। लेकिन यदि लालच, भ्रष्टाचार, छल-कपट और अन्याय के मार्ग पर चलकर धन कमाने लगता है तो वही धन अंततः उसके लिए दुख, कष्ट और संकटों का कारण बन जाता है।

भारतीय परंपरा में भी इस सत्य को स्पष्ट रूप से बताया गया है।

“अन्यायोपार्जितं वित्तं दश वर्षाणि तिष्ठति।
प्राप्ते चैकादशे वर्षे समूलं तद् विनश्यति॥”

अर्थात अन्याय या अनैतिक तरीकों से कमाया गया धन अधिकतम दस वर्षों तक ही टिकता है। ग्यारहवें वर्ष वह मूल सहित नष्ट हो जाता है। आचार्य चाणक्य अपने इस श्लोक में बताते हैं कि गलत तरीके से कमाया गया धन अंततः किसी न किसी रूप में नष्ट हो जाता है—चाहे वह बीमारी हो, दुर्घटना हो, नुकसान हो या कोई अन्य संकट।

चाणक्य नीति के अनुसार पापकर्म या दूसरों को कष्ट देकर कमाया गया धन व्यक्ति के लिए अभिशाप बन जाता है। इसका प्रभाव केवल उस व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसके परिवार और वंश तक पर पड़ता है। इसलिए व्यक्ति को सदैव नैतिक और ईमानदार मार्ग से ही धन अर्जित करना चाहिए।

आज के समय में भी हम देखते हैं कि भ्रष्टाचार के माध्यम से अर्जित संपत्ति अधिक समय तक टिक नहीं पाती। कई बड़े अधिकारियों और नेताओं के यहां प्रवर्तन निदेशालय, आयकर विभाग या अन्य एजेंसियों की छापेमारी में करोड़ों की अवैध संपत्ति बरामद होने की खबरें सामने आती रहती हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि अनैतिक मार्ग से कमाया गया धन अंततः व्यक्ति के लिए संकट का कारण ही बनता है।

धन कमाना जितना कठिन है, उससे कहीं अधिक कठिन उसे सही तरीके से संभालकर रखना है। कुछ लोग सीमित आय के बावजूद संयम और समझदारी से बचत कर लेते हैं, जबकि कुछ लोग अपार धन होने के बावजूद उसे संभाल नहीं पाते। चाणक्य नीति में धन के सदुपयोग और संरक्षण के लिए कई महत्वपूर्ण सिद्धांत बताए गए हैं, जैसे—

  • धन की बचत करना
  • धन का सम्मान करना
  • अनावश्यक खर्च से बचना
  • धन का दिखावा न करना
  • धन का उपयोग सकारात्मक और समाजोपयोगी कार्यों में करना
  • ईमानदार स्रोतों से ही धन अर्जित करना

इन सिद्धांतों को अपनाकर व्यक्ति न केवल आर्थिक रूप से सुरक्षित रह सकता है बल्कि समाज में सम्मान भी प्राप्त कर सकता है।

अंततः यह स्पष्ट है कि ईमानदारी और आत्मसम्मान मानव जीवन के दो अनमोल हीरे-मोती हैं। भ्रष्टाचार, छल-कपट और अन्याय से कमाया गया धन अंततः बीमारी, दुख और क्लेश के रूप में ब्याज सहित निकल जाता है और कई बार परिवार और वंश तक को संकट में डाल देता है। इसलिए व्यक्ति को चाहिए कि वह सदैव नैतिकता और ईमानदारी के मार्ग पर चलकर ही धन अर्जित करे।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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