HALSA द्वारा वर्ष 2026 की पहली राष्ट्रीय लोक अदालत का सफल आयोजन

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*5,72,911 मामलों का निपटारा, 1,72,63,19,466 रुपये की राशि वितरित*

*22 जिलों और 38 उप-मंडलों में आयोजित हुई राष्ट्रीय लोक अदालत*

*फैमिली कोर्ट की मध्यस्थता से वैवाहिक विवाद का सौहार्दपूर्ण समाधान*

चंडीगढ़, 14 मार्च — हरियाणा राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (HALSA) द्वारा शनिवार को वर्ष 2026 की पहली राष्ट्रीय लोक अदालत का सफलतापूर्वक आयोजन किया गया। यह आयोजन पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के न्यायाधीश तथा HALSA के कार्यकारी अध्यक्ष न्यायमूर्ति दीपक सिबल के मार्गदर्शन में आयोजित किया गया।

राष्ट्रीय लोक अदालत का आयोजन हरियाणा के सभी जिलों और उप-मंडलों में किया गया। न्यायमूर्ति दीपक सिबल ने पूरे राज्य में आयोजित राष्ट्रीय लोक अदालत की कार्यवाही की व्यक्तिगत रूप से निगरानी की और लोक अदालत की बेंचों  को अधिकतम मामलों के निपटारे के लिए उच्च स्तर की प्रतिबद्धता और दक्षता के साथ कार्य करने के लिए प्रोत्साहित किया, ताकि सभी के लिए सुलभ और त्वरित न्याय के उद्देश्य को आगे बढ़ाया जा सके।

न्यायमूर्ति दीपक सिबल, कार्यकारी अध्यक्ष, HALSA के निर्देशों के तहत राष्ट्रीय लोक अदालत के दिन जिला एवं सत्र न्यायाधीश व सदस्य सचिव, हरियाणा राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, श्री जगदीप सिंह ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पूरे हरियाणा में आयोजित लोक अदालतों की कार्यवाही की करीबी से निगरानी की। उन्होंने जिला न्यायालय, पंचकूला में लोक अदालत की बेंचों  का व्यक्तिगत निरीक्षण किया, वादकारियों से बातचीत की तथा लोक अदालत की बेंचों की कार्यवाही की समीक्षा की।

आज की लोक अदालत, जिसमें प्री-लोक अदालत बैठकों को भी शामिल किया गया, में 5,72,911 मामलों का निपटारा किया गया। वर्ष की पहली राष्ट्रीय लोक अदालत में हुए इस निपटारे से हरियाणा की अदालतों में लंबित मामलों की संख्या में उल्लेखनीय कमी आई है। यह सुलभ और त्वरित न्याय सुनिश्चित करने के लिए HALSA तथा न्यायपालिका की मजबूत प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

*राष्ट्रीय लोक अदालत के दौरान कुल 1,72,63,19,466 रुपये की राशि वितरित की गई*

लोक अदालत के लिए विभिन्न न्यायालयों में कुल 177 बेंचों का गठन किया गया, जिनमें प्री-लिटिगेशन तथा लंबित मामलों दोनों को लिया गया। इन मामलों में सिविल विवाद, वैवाहिक मामले, मोटर दुर्घटना दावा मामले, बैंक रिकवरी वाद, चेक बाउंस मामले, ट्रैफिक चालान, समझौता योग्य आपराधिक मामले तथा स्थायी लोक अदालत (पब्लिक यूटिलिटी सर्विसेज) के समक्ष लंबित मामले शामिल थे।

इस दौरान पारिवारिक विवादों के समाधान में मध्यस्थता की प्रभावी भूमिका का एक सकारात्मक उदाहरण भी सामने आया। पति-पत्नी के बीच चल रहे एक वैवाहिक मामले का सौहार्दपूर्ण निपटारा पंचकूला स्थित फैमिली कोर्ट की प्रधान न्यायाधीश सुश्री रेखा की अदालत में हुआ।

यह दंपति वर्ष 2013 में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह बंधन में बंधा था और उनकी दो बेटियां  है। समय के साथ आपसी गलतफहमियों और संवाद की कमी के कारण वैवाहिक संबंधों में मतभेद उत्पन्न हो गए, जिसके चलते दोनों पक्षों ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की।

मामले की संवेदनशील प्रकृति तथा बच्चों के हितों को ध्यान में रखते हुए न्यायालय ने इस प्रकरण को मध्यस्थता (मेडिएशन) के लिए भेजा। मध्यस्थता प्रक्रिया के दौरान गंभीर प्रयासों और रचनात्मक संवाद के माध्यम से दोनों पक्ष अपने मतभेद दूर करने में सफल रहे और राष्ट्रीय लोक अदालत में आपसी सहमति से विवाद का समाधान कर लिया।

यह मामला दर्शाता है कि फैमिली कोर्ट और मध्यस्थता व्यवस्था आपसी समझ को बढ़ावा देने, गरिमा बनाए रखने तथा परिवार और बच्चों के हितों की रक्षा करते हुए समाधान सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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