भारत में बेहतर शासन प्रणाली के लिए चीनी मॉडल को अपनाइये 

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कमलेश पांडेय …. वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

भारत का पड़ोसी देश चीन, रणनीतिपूर्वक पश्चिमी देशों के लोकतांत्रिक षड्यंत्रों को मात देता आया है। इससे भी भारत बहुत कुछ सीख सकता है। कहा भी जाता है कि अमेरिका को वकील और चीन को इंजीनियर चलाते हैं। यह पश्चिमी लोकतंत्र पर बहुत बड़ा व्यंग्य भी समझा जाता है। चूंकि देर-सबेर भारत का मुकाबला चीन से ही होना है तो फिर क्यों नहीं भारत चीनी शासन प्रणाली को अपनाकर खुद को उस जैसा ही मजबूत बना ले।

ऐसा इसलिए कि अब्राहम परिवार का सूत्रधार अमेरिका, ईसाई-यहूदी-इस्लामिक मुल्कों में भारत को कभी आगे नहीं बढ़ने देगा। वह ब्रिटेन के ही तर्ज पर यहां जातीयता और धर्मनिरपेक्षता को हवा देगा। पक्ष-विपक्ष को शह देकर भटकाएगा। लोकतंत्र और भागीदारी की आड़ में एक दूसरे के विरुद्ध कुचक्र चलवायेगा। इसलिए भारत-चीन की दोस्ती उतनी क्षति नहीं पहुंचाएगी जितनी कि पश्चिमी देशों की दोगलागिरी पहुंचा चुकी है। 

वहीं, पश्चिमी कुचक्रों यानी अमेरिकी-यूरोपीय षड्यंत्रों से एशिया को महफूज रखने के लिए, सावधान रहकर रूस-भारत-चीन को समझदारीपूर्वक आगे बढ़ना होगा। संयुक्त राष्ट्र संघ की विफलता और अमेरिकी दादागिरी को यदि समय रहते काबू नहीं किया गया तो ईसाई, यहूदी व इस्लामिक देश आपस में ही लड़-कट मरेंगे या फिर भारत के अकूत प्राकृतिक संसाधनों पर हमलावर होंगे। इनका अतीत भी यही चुगली करता है।

अब समझिए, चीन जैसा प्रशासनिक मॉडल भारत में लाने के लिए सिर्फ़ “कदम” नहीं, पूरे संवैधानिक‑राजनीतिक ढांचे की दिशा बदलनी पड़ेगी जिसका मतलब लोकतांत्रिक, बहुदलीय, संघीय और मौलिक अधिकार आधारित व्यवस्था को मूल रूप से बदलना है। इसे चरणबद्ध, यथार्थवादी (और जोखिम‑सहित) रूप में नीचे दर्शा रहा हूँ। उससे पहले भारतीय लक्ष्य स्पष्ट करना होगा कि चीन से क्या कॉपी करना है और क्या नहीं! दरअसल, चीन की शासन प्रणाली की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

पहला, एकदलीय कम्युनिस्ट शासन, जहां वास्तविक सत्ता चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) के हाथ में होती है जबकि “पीपुल्स कांग्रेस” प्रणाली, जहाँ नेशनल पीपुल्स कांग्रेस औपचारिक रूप से सर्वोच्च अंग है, के ऊपर व्यवहार में पार्टी सर्वोपरि रहती है। वहीं, सत्ता के अंगों में व्यावहारिक रूप से कोई सख़्त विभाजन नहीं बल्कि सब पर पार्टी का नेतृत्व मजबूत होता है। वहां बहुत सीमित राजनीतिक विपक्ष है. मीडिया‑नागरिक समाज पर कड़ा नियंत्रण है, इसलिए ज्यादा सियासी उधेड़बुन में लोग नहीं फंसते हैं।

अब भारत की मौजूदा बुनियाद समझते हैं। यहां संसदीय लोकतंत्र है, बहुदलीय प्रतियोगिता दिखती है, संघीय ढांचा (केंद्र–राज्य) है, मौलिक अधिकार मिले हैं, न्यायपालिका की स्वतंत्रता है और न्यायिक समीक्षा को महत्व दिया गया है। यहां सत्ता का आंशिक विभाजन है और “चेक्स ऐंड बैलेंस” भी है लेकिन नेताओं का कलह, अधिकारियों की मनमर्जी और जनता के स्वार्थी सिरफुटौव्वल का ठोस विकल्प देश को चाहिए। 

इसलिए कोई भी “चीन आधारित” मॉडल दो रास्तों में से होगा: पहला, “कठोर” रास्ता: चीन जैसा लगभग‑एकदलीय, केंद्रीकृत, अधिकार‑सीमित मॉडल, और दूसरा, “मृदु” रास्ता: चीन से प्रशासनिक‑नीतिगत दक्षता के सबक लेकर लोकतंत्र को बरकरार रखना। इस हेतु संवैधानिक स्तर पर बड़े परिवर्तनों के कदम उठाने होंगे। यदि कोई चीन‑नुमा राजनीतिक मॉडल चाहता है तो सैद्धांतिक कदम भी उठाने होंगे। संविधान की मूल संरचना बदलने की कोशिश करनी होगी। अनुच्छेद 14, 19, 21, 25 आदि मौलिक अधिकारों को सीमित/पुनर्परिभाषित करना करना होगा। अभिव्यक्ति, संगठन, धर्म‑स्वतंत्रता पर व्यापक नियंत्रण संभव करने हेतु।वहीं, परोक्ष कारोबार बन चुकी न्यायिक समीक्षा और “बेसिक स्ट्रक्चर” सिद्धांत को कमज़ोर करने या हटाने के लिए व्यापक संशोधन करना होगा।

खासकर, बहुदलीय व्यवस्था से “प्रभुत्वशाली दल” या व्यवहारिक‑एकदलीय ढांचा तैयार करना होगा ताकि एक मुख्य राष्ट्रीय पार्टी को संवैधानिक या कानूनी रूप से “राष्ट्र‑निर्माण की धुरी” जैसा दर्जा मिले जबकि अन्य दलों को औपचारिक‑सहयोगी पर गैर‑प्रतिस्पर्धी बनाना होगा। चीन में भी 8 छोटे दल सीसीपी (CCP) के अधीन हैं। ऐसा होने से जातीय व धार्मिक पार्टी और पारिवारिक वंशवाद का सफाया होगा। वहीं, चुनावी क़ानूनों में बदलाव से पार्टी के विरुद्ध राजनीतिक प्रतिस्पर्धा कम होगी और “अनुमोदित विपक्ष” की दिशा तय होगी।

भारत में क्षेत्रवादी सियासत से जिस तरह से राष्ट्रीय हितों को क्षति पहुंचाई जा रही है, उससे बेहतर है कि केंद्र में सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण हो। इस हेतु भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची में संशोधन कर ज़्यादातर महत्त्वपूर्ण विषय जैसे- शिक्षा, पुलिस, कृषि, भूमि, स्वास्थ्य को केंद्र सूची या संयुक्त सूची में लाना जरूरी है। वहीं राष्ट्रपति/केंद्र सरकार को राज्यों की नीतियों पर व्यापक वीटो देने होंगे और गवर्नर की भूमिका और मज़बूत करना होगा; साथ ही, आपातकालीन प्रावधानों का दायरा बढ़ाना होगा।

खासकर, संसद के ऊपर “पार्टी संरचना” की वास्तविक सर्वोच्चता लानी होगी। चीन की तरह पार्टी‑संगठन (पॉलित ब्यूरो, स्टैंडिंग कमेटी टाइप) को वास्तविक नीति‑निर्माता बनाना होगा और संसद को मुख्यतः अनुमोदन मंच में बदलना होगा। साथ ही सभी प्रमुख संवैधानिक संस्थाओं में पार्टी‑सेल/कोर‑कमेटी अनिवार्य करके निर्णयों को पार्टी लाइन से बाँधना होगा। क़ानूनी‑राजनीतिक यथार्थ के दृष्टिगत यह सब भारत की “बेसिक स्ट्रक्चर” न्यायिक व्याख्या से टकराएगा; इसलिए व्यवहार में ऐसा मॉडल लागू करना प्रायः असंवैधानिक क्रांतिकारी बदलाव या बहुत दीर्घकालिक “क्रमिक परिवर्तन” के बिना संभव नहीं है।

जहां तक प्रशासनिक और नीतिगत स्तर के “चीनी सबक” की बात है तो अगर लक्ष्य यह है कि चीन की “गवर्नेंस दक्षता” ली जाए और लोकतंत्र भी बरक़रार रहे तो अपेक्षाकृत व्यावहारिक कदम उठाने होंगे। इस हेतु दीर्घकालिक राष्ट्रीय विकास योजनाएँ 20–30 वर्ष का औद्योगिक, तकनीकी और सैन्य‑आर्थिक रोडमैप, जिसे दल बदलने पर भी मुख्यतः जारी रखा जाए। यही चीन की लांग‑टर्म प्लानिंग की तरह होगा।

वहीं, कैडर‑आधारित नौकरशाही प्रबंधन के तहत वरिष्ठ प्रशासनिक पदों पर पदोन्नति के लिए सख़्त प्रदर्शन‑मानक बनाना होगा न कि केवल वरिष्ठता के आधार पर। वहीं स्थानीय स्तर पर “एकीकृत कमांड” मॉडल के तहत जिला/ज़िले से नीचे स्तर पर बहु‑विभागीय टीम को एक नेता के तहत रखना होगा। साथ ही स्थानीय स्तर पर नियंत्रित‑भागीदारी रखनी होगी। चीन की तरह गाँव‑ज़िला स्तर पर परामर्शी निकाय, जन सुनवाई, डिजिटल फीडबैक; निर्णय अंततः मज़बूत कार्यपालिका के हाथ में, पर इनपुट व्यापक लेना होगा।

एक बात और, टेक्नोक्रेटिक शासन और डेटा‑ड्रिवन नीतियाँ बनाने से नीति‑निर्माण में टेक्नोक्रेट्स, विशेषज्ञ समितियों और डेटा एनालिटिक्स की गहरी भूमिका निर्धारित करनी होगी, जैसे चीन शहरी नियोजन, औद्योगिक नीति, एआई‑सम्बंधित विनियमन में करता है। इस प्रकार इन महत्वपूर्ण कदमों से चीन जैसा “एकदलीय अधिकारवादी” नहीं, बल्कि अपेक्षाकृत अधिक अनुशासित और परिणाम‑उन्मुख शासन मॉडल बन सकता है, जो भारतीय संविधान के भीतर भी संभव है, कतिपय सीमाओं के साथ)।

वहीं,. सुरक्षा, सूचना‑नियंत्रण और समाज हेतु चीन के आधार पर कठोर नियंत्रण का एजेंडा हो तो संभावित कदम भी उठाए जा सकते हैं। सूचना और इंटरनेट नियंत्रण के तर्ज पर बड़े सोशल मीडिया और विदेशी प्लेटफॉर्म पर कठोर निगरानी, डेटा‑लोकलाइजेशन, लाइसेंस आधारित डिजिटल प्रकाशन, “ग्रेट फ़ायरवॉल” जैसे फ़िल्टरिंग‑मैकेनिज़्म की भारतीय रूप में स्थापना करनी होगी। वहीं सिविल सोसाइटी और एनजीओ (NGO) नियमन के तहत विदेशी फंडिंग पर और अधिक नियंत्रण, “राष्ट्रीय हित” मानकों के आधार पर पंजीकरण/कैंसिलेशन, चीन में विदेशी व स्थानीय एनजीओज (NGOs) पर कड़े नियम की तरह लागू करने होंगे।

वहीं, सामाजिक स्थिरता पर सुरक्षा‑प्रमुख नीति के तहत आंतरिक सुरक्षा एजेंसियों की भूमिका बढ़ाना, “सामाजिक स्थिरता” के नाम पर विरोध‑प्रदर्शन और असहमति पर सख़्त नियंत्रण स्थापित करना होगा। यह सब नागरिक स्वतंत्रताओं और लोकतांत्रिक संस्कृति को गहरा झटका देगा; जिससे राजनीतिक प्रतिरोध, अंतरराष्ट्रीय दबाव और संघीय तनाव लगभग निश्चित हैं लेकिन भारत के दूरगामी हित में ऐसा करना ही होगा, अन्यथा यह देश पश्चिमी देशों की कठपुतली बनकर रह जायेगा।

वहीं, व्यावहारिक रणनीति के तहत एक “हिंदी/भारतीय संदर्भ वाला उच्च‑दक्ष, अनुशासित शासन मॉडल” बनाना होगा न कि पूर्ण चीनी‑स्टाइल एकदलीय तानाशाही। इस दृष्टि से यथार्थवादी एजेंडा कुछ इस प्रकार हो सकता है: पहला, संविधान की मूल लोकतांत्रिक संरचना को बनाए रखते हुए:दीर्घकालिक राष्ट्रीय विज़न और नीति‑निरंतरता पर ज़ोर देते हुए पार्टी‑कैडर और नौकरशाही के लिए सख़्त अनुशासन, प्रदर्शन‑आधारित ढांचाकेंद्र–राज्य समन्वय के लिए औपचारिक “नेशनल डेवलपमेंट काउंसिल” टाइप मैकेनिज़्म को पुनर्जीवित/मज़बूत करनाहोगा। 

साथ ही डिजिटल शासन, डेटा‑आधारित प्रशासन, स्थानीय भागीदारी और तेज़ निर्णय क्षमता के लिए “चीनी मॉडल” के कठोर तत्व यानी एकदलीय व्यवस्था, व्यापक सेंसरशिप, न्यायिक स्वतंत्रता का समाप्त होना, को न अपनाना या बहुत सीमित रखना क्योंकि भारतीय सामाजिक‑राजनीतिक विविधता और संवैधानिक ढांचा इसे स्वीकार नहीं करेगा। 

चीन की शासन प्रणाली, मुख्यतः सीपीपी (CCP) के एकदलीय नेतृत्व वाली, के प्रमुख फायदे आर्थिक विकास, स्थिरता और निर्णय दक्षता पर केंद्रित हैं। ये फायदे मुख्य रूप से चीन के विशाल आकार, विकास चरण और सांस्कृतिक संदर्भ के कारण उभरते हैं। नीति निरंतरता के हिसाब से चीन की प्रणाली लंबी अवधि (20-30 वर्ष) की राष्ट्रीय योजनाएँ बनाने की अनुमति देती है जो चुनावी चक्रों से अप्रभावित रहती हैं। इससे आर्थिक सुधार, बुनियादी ढांचा और गरीबी उन्मूलन जैसे लक्ष्य सुसंगत रूप से हासिल होते हैं।

वहीं, निर्णय लेने की तेज़ी यानी एकदलीय ढांचा त्वरित नीतिगत निर्णयों को सक्षम बनाता है, बिना विपक्षी बहस या गठबंधन की जटिलताओं के। खासकर महामारी या आर्थिक संकटों में यह फायदा स्पष्ट दिखा, जहाँ बड़े पैमाने पर संसाधन तुरंत जुटाए गए। वहीं, मेरिटोक्रेसी और प्रतिभा चयन यानी प्रशासकों का चयन प्रदर्शन, प्रशिक्षण और क्षमता पर आधारित होता है, न कि केवल चुनावी लोकप्रियता पर या जातीय आरक्षण के हिसाब से। इससे योग्य कैडर नौकरशाही मजबूत होती है, जो जटिल चुनौतियों, जैसे तकनीकी उन्नति का कुशलता से सामना करती है।

 सामाजिक स्थिरता के  लिहाज से केंद्रीकृत नियंत्रण सामाजिक विभाजनों को कम रखता है और हित समूहों के बीच संतुलन बनाए रखता है। परामर्शी लोकतंत्र यानी सीपीपीसीसी (CPPCC) जैसे मंच के ज़रिए विविध राय एकत्रित होती है, बिना राजनीतिक अस्थिरता के। साथ ही आर्थिक विकास और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के तहत यह मॉडल तेज़ औद्योगीकरण, निर्यात‑उन्मुख विकास और राज्य‑नियंत्रित निवेश को बढ़ावा देता है। चीन को विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने में यह प्रमुख कारक रहा है।

 जनहित प्रतिनिधित्व के दृष्टिगत सीसीपी (CCP) खुद को पूरे समाज का प्रतिनिधि मानता है, न कि विशिष्ट वर्गों का; इसलिए सुधारों से व्यापक हितों का ध्यान रखा जाता है। यह गरीबी उन्मूलन (8 करोड़ से अधिक लोगों को बाहर निकाला) में सफल रहा है। ये फायदे विकासशील देशों के लिए प्रासंगिक हो सकते हैं, लेकिन लोकतांत्रिक संदर्भों में इन्हें अपनाने से स्वतंत्रता और जवाबदेही जैसे जोखिम जुड़ते हैं। 

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Author: Bharat Sarathi

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