दो सीटों का चुनाव, लेकिन दांव पर दलों की विश्वसनीयता और अनुशासन
ऋषि प्रकाश कौशिक
हरियाणा में होने वाला राज्यसभा चुनाव दिखने में भले ही दो सीटों का सामान्य संसदीय चुनाव लगे, लेकिन इसके भीतर सियासत की कई परतें छिपी हुई हैं। विधानसभा का गणित स्पष्ट है, पर राजनीति में अक्सर आंकड़े अंतिम सच नहीं होते। कई बार सियासत की बिसात पर ऐसी चालें चली जाती हैं, जो सीधे-सीधे गणित को भी मात दे देती हैं।
90 सदस्यीय हरियाणा विधानसभा में राज्यसभा चुनाव के लिए जीत का न्यूनतम आंकड़ा 31 वोट है। सत्ता पक्ष के पास बहुमत का स्पष्ट आधार है, जबकि विपक्ष भी अपने विधायकों के सहारे एक सीट पर दावा करता है। कागजों पर तस्वीर लगभग साफ दिखती है, लेकिन जैसे ही तीसरे उम्मीदवार की एंट्री होती है, यह चुनाव अचानक राजनीतिक रोमांच में बदल जाता है।
दरअसल हरियाणा की राजनीति में राज्यसभा चुनाव कई बार सत्ता और विपक्ष दोनों के लिए परीक्षा बन चुका है। क्रॉस वोटिंग, रणनीतिक मतदान और पर्दे के पीछे चलने वाली राजनीतिक गतिविधियां इस चुनाव को हमेशा चर्चा का विषय बनाती रही हैं। इसलिए इस बार भी राजनीतिक दल अपने विधायकों को ‘सुरक्षित’ रखने और किसी भी संभावित राजनीतिक उलटफेर को रोकने में जुटे हुए हैं।
यह स्थिति भारतीय लोकतंत्र की एक विडंबना को भी सामने लाती है। जनता जिन प्रतिनिधियों को चुनकर विधानसभा भेजती है, वही प्रतिनिधि कई बार दलगत अनुशासन और व्यक्तिगत राजनीतिक समीकरणों के बीच झूलते नजर आते हैं। राज्यसभा चुनावों में बार-बार सामने आने वाली क्रॉस वोटिंग की घटनाएं इस प्रश्न को भी जन्म देती हैं कि क्या राजनीतिक दल अपने विधायकों पर वैचारिक और संगठनात्मक पकड़ बनाए रखने में सफल हैं?
हरियाणा की राजनीति का स्वभाव भी हमेशा से गतिशील रहा है। यहां राजनीतिक निष्ठाएं कई बार परिस्थितियों के अनुसार बदलती रही हैं और सत्ता की राजनीति में समीकरणों का बनना-बिगड़ना आम बात रही है। ऐसे में राज्यसभा चुनाव केवल संसद के उच्च सदन में प्रतिनिधि भेजने की प्रक्रिया नहीं रह जाता, बल्कि यह दलों की आंतरिक एकजुटता और नेतृत्व की ताकत का भी पैमाना बन जाता है।
इस चुनाव के परिणाम चाहे जो हों, एक बात तय है कि इससे राजनीतिक संदेश जरूर निकलेगा। यदि मतदान पूरी तरह दलगत लाइन पर होता है तो यह राजनीतिक स्थिरता का संकेत होगा। लेकिन यदि परिणाम में कोई अप्रत्याशित मोड़ आता है तो यह सत्ता और विपक्ष दोनों के लिए आत्ममंथन का विषय बन सकता है।
दरअसल लोकतंत्र में चुनाव केवल सत्ता का गणित नहीं होते, वे राजनीति के चरित्र को भी उजागर करते हैं। हरियाणा का यह राज्यसभा चुनाव भी उसी कसौटी पर परखा जाएगा—कि यह केवल आंकड़ों की जीत है या सियासत की कोई नई चाल।








