क्या यह जीत का जश्न है या जनता के मूड को समझने का समय?
ऋषिप्रकाश कौशिक
गुरुग्राम। हरियाणा के हालिया स्थानीय निकाय चुनावों ने प्रदेश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। पंचकुला, अंबाला, सोनीपत, रेवाड़ी, सांपला, धारूहेड़ा और उकलाना के कुल 144 वार्डों में हुए चुनावों में भाजपा समर्थित केवल 68 उम्मीदवार जीत दर्ज कर पाए, जबकि 76 प्रत्याशियों को हार का सामना करना पड़ा। आंकड़े साफ संकेत दे रहे हैं कि यह चुनाव केवल सीटों की गणित नहीं, बल्कि जनता के मन की स्थिति का आईना भी हैं।
इन चुनावों की सबसे अहम बात यह रही कि प्रचार पूरी तरह मुख्यमंत्री, मंत्रियों और सरकार के चेहरों के इर्द-गिर्द केंद्रित दिखाई दिया। स्थानीय समस्याओं की अपेक्षा केंद्र और प्रदेश सरकार की उपलब्धियों को अधिक उछाला गया। लेकिन नतीजों ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या जनता अब बड़े नारों से आगे बढ़कर अपने मोहल्ले, सड़क, सफाई, पानी और भ्रष्टाचार जैसे वास्तविक मुद्दों पर जवाब चाहती है?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि सत्ता पक्ष पूरी ताकत झोंकने के बावजूद आधे से कम वार्डों में ही निर्णायक बढ़त बना पाए, तो इसे सामान्य चुनावी उतार-चढ़ाव कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। खासकर तब, जब मुख्यमंत्री से लेकर मंत्रियों तक ने चुनाव प्रचार में पूरी ताकत लगा दी हो। यह परिणाम संकेत देते हैं कि जनता के भीतर कहीं न कहीं असंतोष मौजूद है।
भाजपा राष्ट्रीय स्तर पर अपनी राजनीतिक मजबूती का दावा करती रही है। पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्यों में पार्टी ने मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई, लेकिन हरियाणा के निकाय चुनावों में अपेक्षित सफलता नहीं मिली। पश्चिम बंगाल में भारी मतदान प्रतिशत को जनता के बदलाव के मूड से जोड़ा गया था, जबकि हरियाणा में मतदान लगभग 54 प्रतिशत तक सीमित रहा। कम मतदान अक्सर राजनीतिक उदासीनता और घटते भरोसे का संकेत माना जाता है।
भाजपा के भीतर भी अब दबे स्वर में सवाल उठने लगे हैं। पुराने कार्यकर्ताओं का कहना है कि संगठन में पहले जैसा उत्साह नहीं दिखाई देता। कई जिलों में गुटबाजी और खींचतान की चर्चा आम हो चुकी है। कार्यकर्ताओं के बीच यह भावना भी उभर रही है कि संगठन में मेहनती कार्यकर्ताओं की अपेक्षा “मलाई बांट” की राजनीति हावी हो गई है। जब जमीनी कार्यकर्ता स्वयं को उपेक्षित महसूस करने लगते हैं, तो उसका असर चुनावी नतीजों में दिखना स्वाभाविक है।
दूसरी ओर कांग्रेस भी इन परिणामों को पूरी तरह अपनी जीत नहीं मान सकती। भाजपा विरोधी माहौल के बावजूद कांग्रेस कोई निर्णायक जनलहर खड़ी करती नजर नहीं आई। बड़ी संख्या में निर्दलीय और स्थानीय समीकरणों वाले उम्मीदवारों का प्रभाव इस बात का संकेत है कि आम आदमी अब पारंपरिक राजनीतिक दलों से पूरी तरह संतुष्ट नहीं है।
फरीदाबाद नगर निगम की बैठक में मंत्रियों और विधायकों द्वारा निगमों में भ्रष्टाचार को लेकर दिए गए बयानों ने भी जनता के बीच नई बहस छेड़ दी है। यदि सत्ता पक्ष के नेता स्वयं भ्रष्टाचार की बात कर रहे हैं, तो जनता पूछ रही है कि आखिर जिम्मेदारी किसकी है — सरकार की, अधिकारियों की या दोनों की साझा कार्यप्रणाली की?
स्थानीय निकाय चुनाव हमेशा जनता के तत्काल मूड का आईना माने जाते हैं। ये चुनाव राष्ट्रीय नारों से ज्यादा स्थानीय कामकाज पर तय होते हैं। हरियाणा के परिणाम साफ संकेत दे रहे हैं कि जनता अब केवल प्रचार नहीं, प्रदर्शन चाहती है। वह भाषणों से ज्यादा जवाबदेही और परिणाम देखना चाहती है।
इन चुनाव परिणामों को भाजपा यदि केवल “जीत” मानकर संतोष कर लेती है, तो यह राजनीतिक भूल साबित हो सकती है। वहीं कांग्रेस के लिए भी यह आत्मसंतोष का अवसर नहीं है। हरियाणा की जनता दोनों दलों को स्पष्ट संदेश दे रही है — राजनीति अब प्रचार से नहीं, भरोसे और काम से चलेगी।








