आखिर ईरानी धार्मिक शासन से क्या सीख सकता है हिंदुत्व पुरोधा भारत?

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कमलेश पांडेय……. वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

हिंदुत्व का प्रहरी भारत, इस्लामिक ईरानी धार्मिक शासन से कुछ रणनीतिक सबक ग्रहण कर सकता है लेकिन भारत की ‘धर्मनिरपेक्ष’ संरचना को ध्यान में रखते हुए ऐसी किसी भी सोच को अमली जामा पहनाने में पहला अड़ंगा माननीय सर्वोच्च न्यायालय ही लगाएगा! सच कहूँ तो भारत में जाति आधारित सामाजिक न्याय और धर्म आधारित अल्पसंख्यकवाद का वैधानिक बीजारोपण करके गोरे अंग्रेज तो चले गए लेकिन भाषा आधारित क्षेत्रवाद तो काले अंग्रेजों की देन है। चूंकि इन तीनों से सम्बन्धित ‘मूर्खतापूर्ण कानूनी विचार’ व उससे स्थापित व्यवस्थाएं हिंदुओं के हिस्से वाले भारत में हिंदुत्व को निरंतर दीमक की तरह चाट रही हैं जिसके सियासी दुष्प्रभाव वश राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और इसके आनुषंगिक संगठन भी अब हार्डकोर हिंदुत्व की राह से भटकते महसूस हो रहे हैं और सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता और क्षेत्रीयता की छांव तलाशते फिर रहे हैं। 

लिहाजा, हिंदुत्व के इस नैराश्यपूर्ण मोड़ पर अमेरिका-इजरायल के संयुक्त हमलों से जूझ रहा ईरान और उसकी स्थापित प्रशासनिक व्यवस्थाएं, हिंदुत्व प्रेमियों के बीच एक नई उम्मीद जगाती हैं। देखा जाए तो पिछले 40 वर्षों में  वैश्विक शिया मुस्लिम शासन का केंद्र बिंदु बन चुके ईरान ने खामोशी पूर्वक जो सैन्य तैयारियां की, वह सुन्नी मुस्लिम शासकों को भले ही नागवार गुजरीं, लेकिन अब यह बात साबित हो चुकी है कि ईरान के दिवंगत सुप्रीम लीडर खामेनेई एक दूरदर्शी धार्मिक शासक थे, और अपने सरिया कानून से उन्होंने मुस्लिम जगत की व्यापक सेवा की। इससे लोकतांत्रिक दांवपेंच से ईरान महफूज रहा। यूँ तो ईसाई देश भी एक दूसरे के खिलाफ संघर्षरत हैं लेकिन दूसरे धर्मावलंबियों को वो अपने अंतर्विरोधों का फायदा उठाने नहीं देते।

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि दुनिया में सबसे ज्यादा माना जाने वाला धर्म ईसाई धर्म है जो हरेक तरह से सुसंपन्नता का केन्द्रविन्दु बन चुका है। लेकिन दुनियाभर में फैला दूसरा सबसे बड़ा धर्म इस्लाम भी उससे थोड़ा ही कम है। फिर भी ईसाई मुल्कों के भेदभावपूर्ण लोकतंत्र व उनकी लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को ईरान ने जिस रणनीतिपूर्वक चुनौती दी, वह शिया मुसलमानों के लिए फख्र  का विषय है और सुन्नी बहुल सऊदी अरब (मक्का मदीना वाला देश) के मुसलमान भी इससे बहुत कुछ सीख सकते हैं। वैसे तो 56 इस्लामिक देशों की फूट की वजह से आज ईरान भले ही तबाह हो चुका है, लेकिन अपनी चट्टानी दृढ़ता से वह फिर खुद को आबाद कर लेगा, क्योंकि रूस-चीन की ताकत उसके साथ है। 

ईरान के खामेनेई से चूक सिर्फ यही हुई थी कि वह ताकत के बल पर यहूदियों के इकलौते मुल्क इजरायल को मिटाना चाहते थे और दूसरों के बहकावे में आकर अमेरिका और उसके पिट्ठु सुन्नी मुस्लिम देशों से बैर मोल ले लिए। उन्हें काबू में करने के लिए प्रॉक्सी आतंकवादी पैदा किए। कुल मिलाकर जिस नृशंसता को उन्होंने बढ़ावा दिया, उसी की बलिबेदी पर चढ़ गए लेकिन उनके जाते जाते भी उनके समर्थकों ने जो साहस व जुनून दिखाया और अमेरिका-इजरायल को रणनीतिक रूप से परेशान कर दिया, इससे बहुत कुछ सीखा जा सकता है।

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि ईरान का पड़ोसी देश पाकिस्तान, भारत और भारतीय हिंदुओं के प्रति भी वही सोच रखता है जैसा ईरानियों की इजरायल और इजरायली यहूदियों के प्रति थी। इसलिए हिंदुओं को भी अब अपने धार्मिक शासन के बारे में गहराई से सोचना-समझना होगा और 1979 की इस्लामिक क्रांति की तरह ही निकट भविष्य की हिन्दू क्रांति की बुनियाद खड़ी करनी होगी अन्यथा गोरे अंग्रेजों के नक्शेकदम पर चल रहे काले अंग्रेजों की नीतिगत लापरवाहियों से भारत भी जल्द ही अगला इस्लामिक मुल्क बना दिया जाएगा. फैसला अब यहां के जेन जेड हिन्दू पीढ़ी को करनी है क्योंकि मुस्लिम जेन जेड पीढ़ी का अंतर्राष्ट्रीय ध्येय स्पष्ट है और ईरान के चट्टानी इरादे उसकी तस्दीक करते हैं।

आपको पता होना चाहिए कि ईरान की विलायत-ए-फकीह व्यवस्था धार्मिक वैधता पर शासन को मजबूत करती है जो हिंदुत्व के संदर्भ में अनुकूलित हो सकती है। जहां तक केंद्रीकृत धार्मिक नेतृत्व की बात है तो ईरान में सर्वोच्च धार्मिक नेता (वली-ए-फकीह) सभी प्रमुख निर्णयों पर नियंत्रण रखता है जो राष्ट्रपति को सीमित रखता है। लिहाजा, भारत में हिंदुत्व के लिए एक मजबूत वैचारिक नेतृत्व स्थापित कर प्रहारक क्षमता बढ़ाई जा सकती है, जैसे धार्मिक संस्थाओं को नीति निर्माण में एकीकृत करना। इससे आंतरिक एकजुटता मजबूत होती है।

जहां तक प्रचार और वैधता निर्माण की बात है तो ईरान ने जिस तरह से इस्लामी सिद्धांतों को संविधान में अंतर्निहित कर शासन को धार्मिक वैधता दी। उसी तरह से हिंदुत्व की प्रचारक क्षमता के लिए भारतीय संविधानिक मूल्यों में हिंदू सांस्कृतिक तत्वों को मजबूती से जोड़ना उपयोगी होगा जैसे शिक्षा और मीडिया के माध्यम से निरंतर प्रचार करना।

जहां तक आक्रामक-रक्षात्मक संतुलन की बात है तो ईरान की “फॉरवर्ड डिफेंस” नीति प्रॉक्सी समूहों, साइबर और मिसाइलों से बाहरी खतरों पर हमला करती है। लिहाजा हिंदुत्व के लिए पड़ोसी खतरों पर सॉफ्ट पावर (सांस्कृतिक प्रचार) और हार्ड पावर (रक्षा गठबंधन) का संयोजन रक्षात्मक ढाल मजबूत करेगा।

जहां तक आंतरिक नियंत्रण तंत्र स्थापित करने की बात है तो ईरान असंतोषियों का दमन कर सत्ता समेकित करता है लेकिन इससे विद्रोह भी बढ़े जबकि भारत में हिंदुत्व को लोकतांत्रिक ढांचे में मजबूत करने के लिए नैतिक पुलिस जैसी संस्थाओं के बजाय सांस्कृतिक एकीकरण पर जोर दें जो असंतोष से बचने के लिए जरूरी होगा।

मेरा स्पष्ट विचार है कि भारत में हिंदुत्व को मजबूत करने हेतु ईरान के विलायत-ए-फकीह मॉडल से प्रेरित धार्मिक संस्थाएं गठित की जा सकती हैं जो धार्मिक नेतृत्व को राज्यनीति से जोड़ें। यह केंद्रीकृत संरचना हिंदुत्व की आक्रामक व रक्षात्मक क्षमता बढ़ाएगी। 

पहला, सर्वोच्च धार्मिक परिषद:

ईरान की तरह एक ‘हिंदू वली-ए-फकीह परिषद’ बनाएं जिसमें प्रमुख संत, आचार्य  और शंकराचार्य शामिल हों। यह परिषद नीति-निर्माण, कानून व्याख्या और राष्ट्रीय सुरक्षा पर अंतिम निर्णय ले जैसा सर्वोच्च नेता करता है। इससे हिंदुत्व प्रहारक बनेगा क्योंकि यह सांस्कृतिक/धार्मिक आक्रमणों का तत्काल प्रतिकार कर सकेगा। 

संवैधानिक धार्मिक न्यायालय:

ईरान के शरिया अदालतों की तर्ज पर ‘धर्मशास्त्र न्यायालय’ स्थापित करें, जो मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति आदि पर आधारित हो। यह विवादों का धार्मिक कानून से निपटारा करे और संविधान में हिंदू मूल्यों को सर्वोच्च बनाए। इससे रक्षात्मक ढाल मजबूत होगी, क्योंकि यह धर्मनिरपेक्ष चुनौतियों को हिंदू दृष्टि से परास्त करेगा। 

जन-जुटाव वाली क्रांतिकारी गार्ड:

ईरान के ‘इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स’ जैसी ‘हिंदू रक्षक सेना’ गठित करें, जो संतों के नेतृत्व में कार्य करे। यह मंदिर सुरक्षा, सांस्कृतिक शुद्धिकरण और वैचारिक प्रचार करे। इससे प्रहारक क्षमता बढ़ेगी क्योंकि यह हिंदुत्व को सशस्त्र वैचारिक शक्ति देगा। 

शिक्षा व मीडिया नियंत्रण संस्था:

ईरान की धार्मिक शिक्षा प्रणाली से प्रेरित ‘हिंदुत्व शिक्षा मंडल’ बनाएं, जो स्कूलों, विश्वविद्यालयों और मीडिया में वेद-उपनिषद आधारित पाठ्यक्रम लागू करे। इससे युवा पीढ़ी एकीकृत होगी, रक्षात्मक रूप से पश्चिमी/अल्पसंख्यक प्रभाव रोकेगा। 

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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