व्यंग्य : हाय रे रसिया मोबाईल !

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कस्तूरी दिनेश

 यह जो मुलाकात  है न ,यह है बड़ा रसिया यानी “प्ले-बॉय”का बाप ! एपस्टीन फाइल में इसका नाम कैसे नहीं आया, बड़ा ताज्जुब है ! साला रात-दिन जवान छोकरियों के गालों से चिपका रहता है ! मुंह से मुंह, होंठ  से होंठ  मिला कर बाते करते और सुनते रहता है ! ऐसे लफंगे को तो जेल में होना चाहिए जबकि आज भी सरेआम यह अपनी कारगुजारी बदस्तूर जारी रखे हुए है ! ऐसे नंगे बंदे के लिये कोई सेंसर बोर्ड क्यों नहीं है ? सांसद-विधायक, संसद और विधान-सभाओं में इस पर प्रश्न क्यों नहीं उठाते ?

   हमारा समाज आज इतना दिशाहीन भटका हुआ क्यों हो गया है ? कहीं कोई विरोध नहीं,कोई इसके खिलाफ चूं भी नही करता ! क्या इस पर “नग्नता-एक्ट” नहीं लगना चाहिए ? एफ.आई.आर दर्ज क्यों नहीं किया जाता, उल्टे पुलिसवाले इसका साथ देते हुए चौबीस घंटे इसको अपने पॉकेट में घुसाए घुमते रहते हैं ! थोड़ी–बहुत कहीं नैतिकता बची है कि नहीं ? आम पब्लिक को तो छोड़िये, यहाँ तक कि हमारे अबोध बच्चे तक इस मस्तीजादे के शिकार हो चुके हैं और इसके फंदे में फंसकर अस्पताल तक पहुँच रहे हैं !

 इस चरित्रहीन आवारा का हाल इतना बिगड़ चुका है कि रात ये बन्दे -बंदियों के मखमली बिस्तरे में सीने से चिपका पड़ा रहता है ! यानी हर रात सुहागरात ! सुबह होते ही फिर नये चार्ज के साथ इसका साज-सिंगार,प्रेमालाप शुरू ! इसकी प्रेमिका के अलावा और इसको कोई छू दे तो महा-गृह-युद्ध की शुरुआत ! थोड़ी देर के लिए न मिले,गुम हो जाए तो प्रेमिका की हार्ट अटैक की पंचानबे  प्रतिशत संभावना ! ऐसा आत्मिक प्रेम ! शीरी-फरहाद,लैला-मजनू सारे आशिक मात                                                                                                            

ओ मेरे देश के कर्णधारों,जागो ! अब नहीं तो कब ध्यान दोगे ? जब चिड़िया खेत चुक जायेगी तब ?अब तक कोई एक्शन क्यों नहीं ?समझ क्यों नहीं रहे हो ? देश के लिए ये चीन और पाकिस्तान से भी ज्यादा खतरनाक है ! मैं भी कैसी बेवकूफी की बातें कर रहा हूँ ! किनको कर्णधार-कर्णधार कहकर जगा रहा हूँ  ! अरे ये तो खुद इस मोबाइल सुन्दरी के इश्क के बीमार हैं ! जब संसद और विधान-सभाओं में राष्ट्रीय महत्व के विषय पर चर्चा होती रहती है तब ये खुद पीछे की सीट पर बैठकर चुपके–चुपके इससे इश्क लड़ाते रहते हैं !

उस दिन मैं अपने एक मित्र के यहाँ मुलाकात के लिए अपने दो-तीन दोस्तों के साथ गया | शिष्टाचार निभाते हुए मित्र, मेहमान कमरे से पांच कदम दूर रसोई में काम करती अपनी श्रीमती जी को फोन लगाते हुए बोले—“सुनिए जी, मित्र आये हुए हैं,जरा चार कप चाय भेज दीजिये…!” कौन जानता था कि इस नासपीटे  मोबाइल के आने से आदमी इतना नकारा और आलसी हो जाएगा ! अब कोई आशिक यदि अपनी माशूक से यह कहता है कि मैं तुम्हारे लिए जान भी दे सकता हूँ तो मुझे हंसी आती है !” ग़ालिब,दिल को बहलाने को ख्याल अच्छा है…! हाँ,यह बात और है कि आज के दौर में कोई भी बंदी या बंदा अपने मोबाइल के लिए जान दे भी सकता है और ले भी सकता है ! झूठ बोल रहा हूँ तो कौवा काट ले मुझे !

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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