भावुकता नहीं, विज्ञान की दृष्टि से समझना होगा सनातन ज्ञान
आचार्य डॉ. महेन्द्र शर्मा ‘महेश’……. पानीपत

पानीपत। धर्म को अक्सर लोग केवल आस्था और भावुकता के रूप में देखते हैं, जबकि भारतीय परंपरा में धर्म और विज्ञान का गहरा संबंध रहा है। समुद्र में ज्वार-भाटा का उदाहरण ही लें। यह किसी अंग्रेज़ी तारीख के अनुसार नहीं बल्कि चंद्रमा और सूर्य की स्थिति के अनुसार आता है। जब सूर्य और चंद्रमा एक दूसरे के विपरीत दिशा में होते हैं, तब उनके गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से समुद्र में ज्वार-भाटा उत्पन्न होता है। यह तथ्य बताता है कि प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा प्रकृति और विज्ञान के नियमों को समझती थी।
समुद्र में लहरों का उठना-बैठना दिन में दो बार होता है। दिन के समय नदियों का जल समुद्र की ओर बहता है, जबकि सूर्यास्त के बाद समुद्र का जल पुनः नदियों की ओर बढ़ता प्रतीत होता है। ज्वार को समुद्र की लहरों का ऊपर उठना और भाटा को लहरों का नीचे उतरना कहा जाता है।
इसी प्रकार प्राकृतिक घटनाओं का संबंध तापमान से भी है। उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में जब समुद्र के जल का तापमान लगभग 26.5 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचता है, तब चक्रवाती तूफानों की स्थिति बनती है। इससे स्पष्ट है कि प्रकृति के नियमों को समझे बिना किसी भी घटना को केवल आस्था के आधार पर नहीं समझा जा सकता।
रामायण में विज्ञान का संकेत
रामायण के सुन्दरकाण्ड में हनुमान और सुरसा की कथा केवल धार्मिक कथा नहीं बल्कि विज्ञान की प्रतीकात्मक व्याख्या भी मानी जा सकती है। गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है कि सुरसा ने अपना मुख सोलह योजन तक फैलाया और हनुमान ने उसे बत्तीस योजन तक बढ़ा दिया, फिर अंत में सूक्ष्म रूप धारण कर लिया।
यह प्रसंग भारतीय दर्शन में वर्णित अष्ट सिद्धियों की ओर संकेत करता है—
- अणिमा – शरीर को परमाणु जितना सूक्ष्म करना
- महिमा – शरीर को अत्यंत विशाल करना
- गरिमा – अत्यंत भारी हो जाना
- लघिमा – भारहीनता प्राप्त करना
- प्राप्ति – कहीं भी पहुंचने की क्षमता
- प्राकाम्य – इच्छा पूर्ति की शक्ति
- ईशित्व – प्रभुत्व की शक्ति
- वशित्व – नियंत्रण की क्षमता
भारतीय ग्रंथों में इन सिद्धियों का वर्णन इस रूप में मिलता है कि ज्ञान और विज्ञान का उपयोग सकारात्मक या नकारात्मक दोनों रूपों में किया जा सकता है।
भारतीय परंपरा में ज्ञान और विज्ञान
प्राचीन कथाओं में कई उदाहरण मिलते हैं—
- अंगद द्वारा रावण की सभा में पैर जमा देना
- अष्टावक्र का जन्म से ही ज्ञान देना
- नचिकेता का यमलोक तक पहुंचना
- विश्वामित्र और वशिष्ठ के बीच ज्ञान-बल का संघर्ष
ये सभी प्रसंग यह संकेत देते हैं कि भारतीय परंपरा में आध्यात्मिक ज्ञान और वैज्ञानिक दृष्टि का समन्वय माना गया है।
आधुनिक भारत और वैज्ञानिक दृष्टि
भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भी वैज्ञानिक सोच को राष्ट्रीय विकास का आधार माना। उन्होंने देश में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, भारतीय प्रबंधन संस्थान और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान जैसे संस्थानों की स्थापना की। बड़े बांधों और औद्योगिक परियोजनाओं को उन्होंने आधुनिक भारत के विकास के लिए आवश्यक बताया।
पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भी नागपुर में दिए अपने एक भाषण में कहा था कि यदि नेहरू के विचारों को समझना है तो उनकी प्रसिद्ध पुस्तक The Discovery of India (भारत की खोज) को पढ़ना चाहिए।
वैश्विक राजनीति और शक्ति संतुलन
आज की अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भी विज्ञान और शक्ति का बड़ा महत्व है। United States विश्व में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश करता दिखाई देता है। ऊर्जा संसाधनों और तेल के भंडारों को लेकर कई देशों के बीच तनाव बना रहता है।
ईरान और इज़राइल के बीच चल रहा संघर्ष भी इसी वैश्विक शक्ति संतुलन की राजनीति का हिस्सा माना जा रहा है। ऐसे समय में भारत जैसे देशों के लिए वैज्ञानिक प्रगति और आत्मनिर्भरता अत्यंत आवश्यक हो जाती है।
निष्कर्ष
भारतीय ऋषि-मुनियों ने धर्म के साथ-साथ विज्ञान के महत्व को भी स्वीकार किया था। धर्म केवल भावुकता नहीं बल्कि ज्ञान, विवेक और वैज्ञानिक दृष्टि का मार्ग भी है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि नई पीढ़ी को धर्म के वास्तविक स्वरूप से परिचित कराया जाए—जहां आस्था के साथ विज्ञान का समन्वय हो। यदि ऐसा नहीं हुआ तो भविष्य में धर्म केवल एक परंपरा या अंधविश्वास के रूप में देखा जाने लगेगा।







