इतिहास के दर्पण में झिलमिलाता अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 

👇समाचार सुनने के लिए यहां क्लिक करें

प्रमोद दीक्षित मलय

महिला हितों, राजनीतिक एवं सामाजिक उत्थान, लैंगिक भेदभाव से मुक्ति तथा काम के घंटे, समान अवसर एवं वेतन की पैरवी करता अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस एक ऐसी समाज रचना की नींव रखता है जहां महिला मानवोचित गरिमामय वातावरण में न केवल काम कर सकें अपितु अपने सपनों की पतंग को अनंत आकाश में उड़ान भी दे सकें। महिला सशक्तिकरण की राह इतनी आसान नहीं है जितनी ऊपर से दिखाई देती है। पूरी दुनिया का संदर्भ लें तो पाएंगे कि सर्वाधिक शारीरिक हिंसा का शिकार महिलाएं हैं। बलात्कार और यौन हिंसा की आग में झुलसती महिलाओं की सूखी आंखों में डर समाया हुआ है। उनके लिए शिक्षा के रास्ते कांटों भरे हैं, यौन दासी बनाकर युद्ध के लिए बच्चे पैदा करने की जमीन बन चुकी औरतें मौत से भी बदतर जीवन जीने को अभिशप्त हैं। उद्योग-धंधों, कारखानों, ईंट-भट्ठों, सड़क-भवन निर्माण में पुरुषों के बराबर घंटों में काम करने के बावजूद मजदूरी में भारी असमानता है। राजनीति की चमकीली फिसलन भरी राह में 30 प्रतिशत महिला आरक्षण का झुनझुना थामे वह मंजिल से  दूर खड़ी अभी जोर-जोर नारे उछाल रही है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर महिला के बुनियादों सवालों पर विमर्श करते हुए राह की चुनौतियों के कंकड़-पत्थर बीनते हुए उपलब्धियों के शिखर पर महिलाओं का गौरव गान हो, यही पावन उद्देश्य है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की शताधिक वर्षों की यात्रा इतिहास के दर्पण में झिलमिला रही है।       

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के इतिहास एवं परम्परा पर दृष्टिपात करें तो 28 फरवरी, 1909 में न्यूयार्क, अमेरिका में सोशलिस्ट पार्टी द्वारा महिला मुद्दों पर पहला आयोजन होता दिखाई देता है। 1900 का पहला दशक दुनिया में बड़े परिवर्तन और उथल-पुथल का दशक था। शिक्षा, सूचना, उद्योग, स्वास्थ्य के क्षेत्र में तेजी से बदलाव हो रहे थे। इस बदलाव की आंधी से महिला हितों पर सोचने-समझने वाली संस्थाएं और महिला समूह जागरूक होकर सामूहिक चेतना का प्रसार करने में लगे थे। 1910 में 17 देशों की एक हजार से अधिक महिलाओं ने सोशलिस्ट इंटरनेशनल द्वारा कोपेनहेगन में आयोजित वैश्विक सम्मेलन में भागीदारी कर महिलाओं को मताधिकार देने की मांग किया। जर्मनी की समाजवादी नारीवादी नेता क्लारा जेटकिन के प्रस्ताव के बाद 1911 में आस्ट्रिया, डेनमार्क, जर्मनी तथा स्विट्जरलैंड में पहला अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मना कर काम करने, प्रशिक्षण प्राप्त करने, भेदभाव समाप्त करने, सार्वजनिक पदों पर नियुक्त होने और मताधिकार प्राप्त करने सम्बंधित मांगे रखीं।

बातें कुछ आगे बढ़तीं किंतु प्रथम विश्वयुद्ध की आग में दुनिया झुलसने लगी। पर बारूद की गंध और बमों के धमाकों के बीच 1917 में सोवियत रूस की 20 लाख सैनिकों की विधवा महिलाओं ने रोटी और शांति के लिए हड़ताल कर दी। चार दिन की देशव्यापी हड़ताल से जार को महिलाओं को मताधिकार देते हुए अपना पद छोड़ना पड़ा था। वह ऐतिहासिक दिन रूसी कैलेण्डर में 23 फरवरी और शेष दुनिया में स्वीकार्य ग्रेगेरियन कैलेण्डर में 8 मार्च था। आगे आयोजनों में समानता की दृष्टि से वर्ष 1921 से 8 मार्च की तिथि महिला दिवस मनाने हेतु निश्चित की गई और इस दिन आयोजन लगातार दशकों तक होते रहे पर इस महिला दिवस की यात्रा में एक महत्वपूर्ण अवसर 1975 में तब आया जब संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा सार्वभौमिक रूप से मैक्सिको की राजधानी मैक्सिको सिटी में महिलाओं के खिलाफ भेद-भाव की समस्या से मुक्ति के लिए गम्भीर आयोजन किया गया और 1977 में इस दिवस को प्रस्ताव के माध्यम से वैश्विक मान्यता प्रदान कर दी।

वर्ष 1996 में पहली बार थीम आधारित आयोजन आरम्भ हुए। उस वर्ष थीम थी- अतीत की खुशियां, भविष्य के लिए योजना। 1997 में शांति की मेज पर महिलाएं तथा 1998 में महिलाएं और मानवाधिकार जैसी महत्वपूर्ण थीम निर्धारित कर आयोजन किये गये, जिससे पूरी दुनिया की महिलाओं में जागरूकता बढ़ी और अपने अधिकारों के लिए लड़ने-जूझने की भावना एवं आत्मविश्वास पैदा हुआ। वर्तमान वर्ष 2026 की थीम है- दान करके लाभ प्राप्त करें, जो उदारता, आत्मीयता एवं परस्पर मधुरता का संवाहक सूत्र है। 2011 में एक उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल हुई, जब महिला दिवस आयोजन का शतक पूरा हुआ और सौवां महिला दिवस मनाया गया। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने मार्च माह को ‘महिला इतिहास माह’ घोषित किया।     

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के दिन विश्व के दो दर्जन से अधिक देशों ने सार्वजनिक अवकाश घोषित किया है, ये देश हैं लाओस, अफगानिस्तान, आर्मेनिया, अज़रबैजान, बेलारूस, क्यूबा, बुर्किना फासो, कम्बोडिया, जार्जिया, गिनी बिसाऊ, इरीट्रिया, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, मोल्दोवा, मंगोलिया, मोंटेनेग्रो, रूस, तजाकिस्तान, युगांडा, तुर्कमेनिस्तान, यूक्रेन, उज़्बेकिस्तान, वियतनाम तथा ज़ाम्बिया। चीन, नेपाल और मेडागास्कर ने केवल महिलाओं के लिए अवकाश घोषित किया है। इस दिन यहां पर महिलाओं के सम्मान के कार्यक्रम होते हैं, उन्हें पुष्प-गुच्छ, स्मृति चिह्न और भेंट-उपहार समर्पित किए जाते हैं।

भारत के संदर्भ में बात करूं तो यहां महिलाओं के सर्वांगीण विकास एवं सशक्तिकरण के लिए सरकारी स्तर पर तमाम योजनाएं संचालित हैं। भारत सरकार द्वारा 2007 में महिला दिवस केंद्रित 5 से 15 रुपए मूल्य के डाक टिकटों के चार सेट जारी किए गये थे। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा महिलाओं की सुरक्षा, संरक्षा एवं सशक्तिकरण के लिए मिशन शक्ति कार्यक्रम संचालित है। 1999 से दो लाख रुपये का नारी शक्ति सम्मान दिया जा रहा है। कह सकते हैं भारत में महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य सहित राजनीतिक एवं सामाजिक क्षेत्र में आगे बढ़ने की निष्कंटक राह बनते हुए हम देख रहे हैं। महिला अधिकार,  गरिमा एवं समानता को समर्पित यह दिवस महिलाओं के स्वप्नों को साकार करने की सुदृढ़ भूमि तैयार कर सके, यही शुभेच्छा है।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

Leave a Comment

और पढ़ें

error: Content is protected !!