युद्ध की विभीषिका में दम तोड़ती बेटियां : महिला दिवस का उत्सव या आत्ममंथन?

👇समाचार सुनने के लिए यहां क्लिक करें

जब स्कूलों पर बम गिरते हैं और मासूम बच्चियां मलबे में दब जाती हैं, तब केवल मंचों पर भाषणों का क्या मूल्य है?

बाबूलाल नागा

   हर साल 8 मार्च को दुनिया भर में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस बड़े उत्साह और उल्लास के साथ मनाया जाता है। मंच सजते हैं, भाषण होते हैं और महिलाओं के सम्मान के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं लेकिन क्या यह उत्सव सच में सार्थक है, जब दुनिया के कई हिस्सों में युद्ध और हिंसा की आग में सबसे अधिक महिलाएं और मासूम बच्चियां ही झुलस रही हैं? क्या हम सिर्फ नारों और समारोहों में ही महिलाओं का सम्मान दिखा रहे हैं जबकि असली दुनिया में उनकी सुरक्षा और जीवन खतरे में हैं?

   संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट बताती है कि 2023 में युद्धग्रस्त देशों में मारे गए नागरिकों में लगभग 40 प्रतिशत महिलाएं थीं जबकि 30 प्रतिशत बच्चे थे।

कुल मिलाकर 33,443 नागरिकों की मौत दर्ज की गई, जो पिछले वर्ष की तुलना में 72 प्रतिशत अधिक है। यह केवल संख्या नहीं है, बल्कि हजारों परिवारों के उजड़ने और अनगिनत सपनों के टूटने की कहानी है।

संयुक्त राष्ट्र की ओर से वर्ष 2013 में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार पूरी दुनिया में लगभग 600 मिलियन महिलाएं और लड़कियां युद्ध जैसी हालातों के बीच में रहती हैं। अगर इस आंकड़े की तुलना वर्ष 2017 से की जाए तो यह 50 प्रतिशत अधिक है। अनुमानों के मुताबिक पिछले वर्ष सैन्य संघर्ष में बढ़ोतरी दर्ज की गई और इसके चलते महिलाओं को लिंग आधारित हिंसा का सामना करना पड़ा है।

   सबसे बड़ी त्रासदी तब होती है जब युद्ध और हिंसा सीधे शिक्षा और भविष्य के साधनों को निशाना बनाते हैं। हाल ही में ईरान के मिनाब शहर में एक स्कूल पर हुए हमले में 150 से 170 छात्राओं की मौत की खबर आई। स्कूल जाने वाली इन मासूम बच्चियों के हाथों में किताबें थीं, हथियार नहीं। फिर भी वे युद्ध की राजनीति का शिकार बन गईं। उनके परिवारों के सपने और भविष्य की उम्मीदें उसी मलबे में दब गईं।

   युद्ध केवल जान नहीं लेता बल्कि महिलाओं की गरिमा और अस्तित्व पर भी गहरा आघात करता है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार युद्धग्रस्त क्षेत्रों में महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा के मामलों में लगभग 50 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हुई है। इसका मतलब यह है कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा केवल युद्ध की छाया में बढ़ रही है, बल्कि उनके जीवन की हर पहलू में असुरक्षा बढ़ रही है।

हाल ही में इजराइल‑हमास संघर्ष में भी हजारों नागरिक मारे गए, जिनमें बड़ी संख्या महिलाओं और बच्चों की थी। लगभग 16 हजार से अधिक महिलाएं और बच्चे अपनी जान गंवा चुके हैं और लाखों लोग विस्थापित हुए हैं। अफ्रीका, सीरिया, यूक्रेन और अफगानिस्तान जैसे देशों में भी यही स्थिति बनी हुई है। महिलाएं शरणार्थी बनकर दर‑दर भटक रही हैं, कई को भोजन और सुरक्षित आश्रय तक नहीं मिल पा रहा है। सीरिया में लगभग 4 लाख गर्भवती महिलाएं आवश्यक मातृत्व सेवाओं तक पहुंचने के लिए संघर्ष कर रही हैं।

   हमारे अपने समाज में भी तस्वीर संतोषजनक नहीं है। महिलाओं के खिलाफ अपराधों की खबरें नियमित रूप से सुर्खियों में रहती हैं। बलात्कार, घरेलू हिंसा, दहेज प्रताड़ना और उत्पीड़न जैसी घटनाएं यह बताती हैं कि महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान का मुद्दा अभी भी गंभीर चुनौती बना हुआ है। ऐसे में महिला दिवस केवल औपचारिक आयोजन नहीं रह जाता, बल्कि यह समाज को आत्ममंथन करने का अवसर बन जाता है।

   महिला दिवस का असली उद्देश्य महिलाओं के अधिकारों, सम्मान और समानता के लिए संघर्ष को मजबूत करना था। यह दिन उन महिलाओं को याद करने का दिन था जिन्होंने अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाई जिन्होंने समाज में बराबरी की राह बनाई लेकिन आज यह भी सच है कि कई बार यह दिवस केवल मंचों, भाषणों और प्रतीकात्मक कार्यक्रमों तक सीमित रह जाता है।

   महिला दिवस मनाने का सही तरीका यही है कि हम उन आवाजों को सुनें जो अभी भी दबा दी जाती हैं। हम उन संघर्षों को पहचानें जो रोजमर्रा की जिंदगी में महिलाएं झेलती हैं। हमें यह स्वीकार करना होगा कि केवल नारों और समारोहों से बदलाव नहीं आएगा; इसके लिए समाज की सोच और व्यवस्था दोनों में परिवर्तन लाना होगा।

   आज जरूरत इस बात की है कि हम महिलाओं की सुरक्षा, शिक्षा और सम्मान को प्राथमिकता दें। बेटियों को भय और असुरक्षा से मुक्त वातावरण मिले, उन्हें अपने सपनों को पूरा करने का अवसर मिले—यही महिला दिवस की सच्ची भावना है। युद्ध और हिंसा की विभीषिका में दम तोड़ती बेटियां हमें यही याद दिलाती हैं कि महिला दिवस का वास्तविक मूल्य केवल उत्सव में नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई में है।

   अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस केवल खुशियां मनाने का दिन नहीं है। यह दिन हमें यह सोचने का अवसर देता है कि हम कैसे ऐसा समाज बना सकते हैं, जहां हर महिला सुरक्षित, सम्मानित और स्वतंत्र जीवन जी सके। जब तक दुनिया की हर बेटी सुरक्षित नहीं होगी जब तक युद्ध और हिंसा में मासूम बच्चियां मरती रहेंगी, तब तक महिला दिवस का जश्न अधूरा ही रहेगा।

शायद उसी दिन अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की सच्ची सार्थकता दिखाई देगी—जब मंचों पर भाषणों और नारों के बजाय हर महिला के जीवन में सुरक्षा, स्वतंत्रता और सम्मान दिखने लगेगा। तब ही हम गर्व के साथ कह पाएंगे कि यह दिन केवल उत्सव का नहीं बल्कि महिलाओं की असली ताकत और अधिकार का प्रतीक भी है। 

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

Leave a Comment

और पढ़ें

error: Content is protected !!