राजेश श्रीवास्तव

इजरायल और ईरान के बीच आज की दुश्मनी की जड़ें इतिहास की गहराइयों में कहीं दफन हैं। साल 1948 में इजरायल की स्थापना के समय, तुर्की के बाद ईरान दूसरा मुस्लिम बहुल देश था जिसने इजरायल को देश के रूप में मान्यता दी थी। उस दौर में दोनों देशों के रिश्ते अच्छे थे लेकिन समय के साथ सब कुछ उलटा होता चला गया। अमेरिका और इजरायल साथ मिलकर ईरान पर लगातार हमले कर रहे हैं। इस हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत भी हो चुकी है। जवाबी कार्रवाई के दौरान ईरान ने इजरायल, सऊदी अरब, कतर, संयुक्त अरब अमीरात, ओमान, कुबैत समेत कई देशों पर मिसाइलें दाग दी। जिसके चलते तनाव और अधिक बढ़ गया है। इस युद्ध से दुनियाभर के लोग दहशत में आ गए हैं। अब सवाल यह है कि आखिर मध्य-पूर्व के दो देशों के बीच की दोस्ती दुश्मनी में कैसे बदल गई? आइए समझते हैं पीछे की कहानी।
दरअसल 1979 तक इजरायल और ईरान के संबंध दोस्ताना थे। ईरान तब पहलवी वंश के शाहों के अधीन एक राजतंत्र था और अमेरिका का प्रमुख सहयोगी भी था। इजरायल के संस्थापक डेविड बेन-गुरियन ने अरब पड़ोसियों की नाराजगी के बावजूद ईरान से दोस्ती की नींव रखी थी। हालांकि, ईरान ने 1948 में फिलिस्तीन विभाजन योजना का विरोध किया था। फिर भी, उसने इजरायल को मान्यता दी लेकिन 1979 में अयातुल्लाह खुमैनी की इस्लामिक क्रांति ने सब कुछ बदल कर रख दिया। क्रांतिकारियों ने शाह की सत्ता उखाड़ फेंकी और इस्लामी गणराज्य स्थापित किया। खुमैनी ने खुद को ‘पीड़ितों का रक्षक’ बताया, साथ ही अमेरिका और इजरायल के ‘साम्राज्यवाद’ को खारिज कर दिया। नई सरकार ने इजरायल से सभी संबंध तोड़ दिए, इजरायली पासपोर्ट अमान्य कर दिए और तेहरान के दूतावास को फिलिस्तीन लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन (पीएलओ) को सौंप दिया जो फिलिस्तीन राष्ट्र की मांग के लिए संघर्ष कर रहा था।
इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप सेंटर में ईरान प्रोग्राम के निदेशक अली वेज के मुताबिक इजरायल विरोध नई ईरानी सरकार की मूल नीतियों का हिस्सा था। उस समय ईरान के कई नेता फिलिस्तीनियों के साथ लेबनान में गुरिल्ला युद्ध में शामिल रहे थे जिससे उनकी सहानुभूति गहरी थी। नया ईरान खुद को इस्लामी ताकत के रूप में पेश करना चाहता था। इसी वजह से उसने फिलिस्तीनी मुद्दे को उठाया जिसे अधिकतर अरब मुस्लिम देशों ने उस वक्त पीछे छोड़ दिया था। खुमैनी ने फिलिस्तीनी मुद्दे पर दावा जताया और तेहरान में बड़े प्रदर्शन आम हो गए।
इजरायल में ईरान विरोध 199० के दशक तक मजबूत नहीं हुआ क्योंकि तब सद्दाम हुसैन का इराक बड़ा खतरा था। इजरायल ने ‘ईरान-कॉन्ट्रा’ डील में भी भूमिका निभाई, जहां अमेरिका ने ईरान को इराक युद्ध में हथियार दिए थे लेकिन बाद में इजरायल ने ईरान को अस्तित्व के खतरे के रूप में देखा। ईरान ने सऊदी अरब जैसे विरोधियों से बचने के लिए ‘एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस’ नेटवर्क बनाया, जिसमें हिजबुल्लाह जैसे संगठन शामिल हैं, जो लेबनान से यमन तक फैले हैं। इजरायल ने इन पर हमले किए, जिन्हें ‘शैडो वॉर’ कहा जाता है जहां दोनों आधिकारिक पुष्टि किए बिना कार्रवाई करते हैं। इजरायल का मुख्य फोकस ईरान का परमाणु कार्यक्रम रोकना है। वह ईरान की नागरिक उद्देश्य वाली दलील को खारिज करता है। ‘स्टक्सनेट’ वायरस से ईरान की सुविधाओं को नुकसान पहुंचाया गया। ईरान ने वैज्ञानिकों की हत्याओं के लिए इजरायल को जिम्मेदार ठहराया जैसे 2०2० में मोहसिन फखरीजादेह की हत्या।








