‘ग्लोबल माइंड हेल्थ रिपोर्ट 2025’ : भारतीय युवाओं का 60वां स्थान, बढ़ती मानसिक चुनौती का संकेत

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डिजिटल युग, एआई और मानसिक संतुलन—सुविधा के साथ संयम की अनिवार्यता

-एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

गोंदिया (महाराष्ट्र)। डिजिटल क्रांति और कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने मानव जीवन को अभूतपूर्व गति दी है। OpenAI, Google और Microsoft जैसी अग्रणी संस्थाओं के एआई उपकरण शिक्षा, स्वास्थ्य, वित्त और प्रशासन में व्यापक उपयोग पा रहे हैं। भारत जैसे युवा देश में स्मार्टफोन और इंटरनेट की सर्वसुलभता ने इस प्रभाव को और तीव्र किया है।

लेकिन इसी परिवर्तन के बीच एक गंभीर प्रश्न उभर रहा है—क्या अत्यधिक डिजिटल निर्भरता और शॉर्ट वीडियो संस्कृति युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही है?

84 देशों की स्टडी में भारत 60वें स्थान पर

26 फरवरी 2026 को जर्मनी से जारी ‘ग्लोबल माइंड हेल्थ रिपोर्ट 2025’ को Sapien Labs के ‘ग्लोबल माइंड प्रोजेक्ट’ के अंतर्गत तैयार किया गया। 84 देशों के 10 लाख से अधिक प्रतिभागियों पर आधारित इस अध्ययन में 78,093 भारतीय शामिल थे।

रिपोर्ट के अनुसार:

  • 18–34 आयु वर्ग के भारतीय युवाओं का माइंड हेल्थ क्वोशेंट (MHQ) स्कोर 33 रहा और वे 84 देशों में 60वें स्थान पर रहे।
  • 55 वर्ष से अधिक आयु वर्ग का स्कोर 96 दर्ज हुआ और वे 49वें स्थान पर रहे।

यह पीढ़ीगत अंतर केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि सामाजिक-डिजिटल संक्रमण का संकेत है।

एमएचक्यू (MHQ) क्या दर्शाता है?

MHQ भावनात्मक स्थिरता, ध्यान क्षमता, आत्मनियंत्रण, तनाव से उबरने की क्षमता और सामाजिक अनुकूलन जैसे संकेतकों को मापता है। युवाओं का स्कोर बुजुर्गों की तुलना में लगभग एक-तिहाई होना बताता है कि समस्या केवल अवसाद या चिंता तक सीमित नहीं, बल्कि आधारभूत मनोवैज्ञानिक क्षमताओं में गिरावट का संकेत है।

डिजिटल एक्सपोज़र और ‘डोपामिन संस्कृति’

भारत में पहली बार स्मार्टफोन उपयोग की औसत आयु 16.5 वर्ष बताई गई है। किशोरावस्था मस्तिष्क विकास का संवेदनशील चरण है। निरंतर शॉर्ट वीडियो, रील्स और त्वरित संतुष्टि आधारित कंटेंट मस्तिष्क को तत्काल डोपामिन का आदी बना सकता है।

परिणामस्वरूप:

  • ध्यान क्षमता में कमी
  • आत्मनियंत्रण में गिरावट
  • भावनात्मक अस्थिरता
  • दीर्घकालिक अध्ययन में कठिनाई

विशेषज्ञ इसे “डोपामिन-ड्रिवन डिजिटल व्यवहार” की चुनौती मानते हैं।

वैश्विक परिप्रेक्ष्य

यह समस्या केवल भारत तक सीमित नहीं है। 18–34 आयु वर्ग के 41% वैश्विक इंटरनेट उपयोगकर्ता गंभीर मानसिक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। अध्ययन में घाना शीर्ष स्थान पर रहा, जबकि विश्व हैप्पीनेस इंडेक्स में अग्रणी रहने वाला Finland युवा मानसिक स्वास्थ्य रैंकिंग में 40वें स्थान पर रहा। यह दर्शाता है कि आर्थिक समृद्धि मानसिक संतुलन की गारंटी नहीं।

खानपान और मानसिक स्वास्थ्य

रिपोर्ट के अनुसार:

  • 18–34 आयु वर्ग के 44% भारतीय युवा नियमित रूप से अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड लेते हैं।
  • 55+ आयु वर्ग में यह केवल 11% है।

उच्च शर्करा, सोडियम और कृत्रिम तत्वों से भरपूर भोजन ‘आंत–मस्तिष्क अक्ष’ को प्रभावित कर सकता है, जिससे मानसिक असंतुलन की संभावना बढ़ती है।

पारिवारिक जुड़ाव—सुरक्षा कवच

18–34 आयु वर्ग के 64% युवाओं ने स्वयं को परिवार के निकट बताया, जबकि 55+ आयु वर्ग में यह 78% रहा। नगरीकरण और डिजिटल जीवनशैली के कारण पारिवारिक संवाद में कमी मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव डाल रही है।

कानूनी व नीतिगत पहल

भारत सरकार ने 2017 में Mental Healthcare Act, 2017 लागू किया, जो मानसिक रोगियों को उपचार, गरिमा और गोपनीयता का अधिकार देता है।

किन्तु:

  • प्रति लाख जनसंख्या पर मनोचिकित्सकों की संख्या अभी भी कम है।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में सेवाओं की भारी कमी है।
  • जागरूकता अभियान अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुँचे हैं।

कानून पर्याप्त है, पर अवसंरचना और क्रियान्वयन मजबूत होना आवश्यक है।

समाधान: तकनीक नहीं, असंतुलन समस्या है

यह प्रश्न तकनीक बनाम मानव का नहीं, बल्कि संतुलन का है। एआई शिक्षा और स्वास्थ्य में क्रांतिकारी भूमिका निभा सकता है, परंतु यदि मानव निर्णय क्षमता तकनीक पर पूरी तरह निर्भर हो जाए, तो सृजनात्मकता प्रभावित हो सकती है।

आवश्यक कदम:
  1. स्कूलों में मानसिक स्वास्थ्य शिक्षा अनिवार्य करना
  2. डिजिटल उपयोग की समय-सीमा तय करना
  3. खेल, योग और कला गतिविधियों को बढ़ावा
  4. संतुलित आहार पर जागरूकता
  5. परिवार में ‘डिजिटल डिटॉक्स’ और संवाद की संस्कृति
निष्कर्ष

‘अति सर्वत्र वर्जयेत्’ का शाश्वत संदेश आज पहले से अधिक प्रासंगिक है। डिजिटल युग में रहकर डिजिटल अनुशासन विकसित करना ही समाधान है। समाज, परिवार, शैक्षणिक संस्थान और सरकार—सभी को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता मानव बुद्धिमत्ता की पूरक बने, प्रतिस्थापक नहीं।

संतुलन, संयम और विवेक के साथ तकनीक का उपयोग ही स्वस्थ, सशक्त और जागरूक युवा पीढ़ी के निर्माण का आधार बनेगा।

— संकलनकर्ता/लेखक: एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी, गोंदिया (महाराष्ट्र)

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Author: Bharat Sarathi

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