— सौरभ वार्ष्णेय

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की स्थापना वर्ष 1961 में इस उद्देश्य से की गई थी कि देश में स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता को बेहतर बनाया जाए और केंद्र व राज्य सरकारों को नीतिगत सलाह दी जा सके। मॉडल पाठ्यपुस्तकों का निर्माण, शैक्षिक शोध, शिक्षक-प्रशिक्षण, पूरक सामग्री और डिजिटल कंटेंट का विकास—ये सभी इसके प्रमुख दायित्व हैं। परंतु समय-समय पर इसकी पाठ्यपुस्तकों को लेकर उठने वाले विवाद यह प्रश्न खड़ा करते हैं कि क्या शिक्षा वास्तव में राजनीति से मुक्त रह पा रही है?
हाल ही में एनसीईआरटी की पुस्तकों में “न्यायपालिका में भ्रष्टाचार” से जुड़े अंश को लेकर नया विवाद सामने आया। बहस यह है कि क्या विद्यार्थियों को न्यायपालिका की चुनौतियों और कमियों से अवगत कराना चाहिए, या ऐसी सामग्री संस्थाओं की गरिमा को ठेस पहुँचाती है? यह विवाद केवल एक अध्याय तक सीमित नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक पारदर्शिता, शिक्षा की स्वतंत्रता और संस्थागत जवाबदेही जैसे बड़े प्रश्नों से जुड़ा है।
भारत का लोकतंत्र तीन स्तंभों—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका—पर आधारित है। न्यायपालिका को संविधान का संरक्षक माना जाता है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय और देश के उच्च न्यायालय नागरिक अधिकारों की अंतिम रक्षा-रेखा हैं। ऐसे में यदि पाठ्यपुस्तकों में न्यायपालिका के भीतर भ्रष्टाचार की आशंका या उदाहरणों का उल्लेख होता है, तो कुछ लोगों को यह संस्थान की छवि पर आघात जैसा प्रतीत होता है।
लेकिन लोकतंत्र का मूल सिद्धांत यह है कि कोई भी संस्था आलोचना और समीक्षा से परे नहीं है। शिक्षा का उद्देश्य केवल संस्थाओं का महिमामंडन करना नहीं, बल्कि छात्रों में आलोचनात्मक सोच विकसित करना भी है। यदि पुस्तकों में केवल आदर्श चित्र प्रस्तुत किया जाए और वास्तविक चुनौतियों पर पर्दा डाल दिया जाए, तो विद्यार्थी अधूरी समझ के साथ आगे बढ़ेंगे।
न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के आरोप समय-समय पर सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा रहे हैं। पारदर्शिता और आत्ममंथन से ही संस्थाएं मजबूत होती हैं। इसलिए यदि पाठ्यक्रम में इस विषय का उल्लेख हो, तो उसके साथ सुधारात्मक उपायों, न्यायिक जवाबदेही की व्यवस्थाओं और संस्थागत सुधारों का भी सम्यक वर्णन होना चाहिए।
यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि भाषा संतुलित, तथ्यात्मक और प्रमाण-आधारित हो। सनसनीखेज प्रस्तुति या एकतरफा दृष्टिकोण छात्रों में अविश्वास पैदा कर सकता है। लोकतंत्र में संस्थाओं की गरिमा और उनकी आलोचनात्मक समीक्षा—दोनों साथ-साथ चल सकती हैं।
मूल प्रश्न यही है कि क्या हम अपनी लोकतांत्रिक संस्थाओं को इतना परिपक्व मानते हैं कि वे आलोचना सह सकें? यदि हां, तो पाठ्यपुस्तकों में चुनौतियों का उल्लेख लोकतंत्र की मजबूती का संकेत होना चाहिए, न कि कमजोरी का।
अंततः समाधान संतुलन में है—न तो अंधभक्ति और न ही अनावश्यक अविश्वास। शिक्षा का दायित्व है कि वह सच को जिम्मेदार और संतुलित ढंग से प्रस्तुत करे। विद्यार्थियों को यह समझाना अधिक उपयोगी होगा कि—
- न्यायपालिका स्वतंत्र है,
- उसमें सुधार और जवाबदेही की व्यवस्था मौजूद है,
- और भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच व दंड की प्रक्रिया भी सुनिश्चित है।
जब शिक्षा तथ्य और संतुलन के आधार पर आगे बढ़ेगी, तभी वह राजनीति से ऊपर उठकर लोकतंत्र को मजबूत करने का अपना वास्तविक दायित्व निभा सकेगी।









