डॉ घनश्याम बादल

अदालत ने सीबीआई को फटकार लगाते हुए आपके अध्यक्ष एवं दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के साथ मनीष सिसोदिया एवं अन्य सभी अभियुक्तों को शराब घोटाला कांड से ससम्मान बरी कर दिया है. हालांकि इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ सरकार फिर से अदालत में जाएगी लेकिन न्यायालय के इस फैसले ने कई सवाल तो खड़े कर ही दिए हैं। फैसले का यह दिन भारतीय लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था के इतिहास में एक ऐसा दिन बन गया है जिसे सिर्फ एक अदालती फ़ैसले के रूप में नहीं बल्कि पूरी न्यायिक-राजनीतिक प्रणाली के आईने के रूप में देखा जाएगा।
शराब नीति घोटाला कांड में अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया सहित अन्य आरोपियों को अदालत द्वारा आरोपों से मुक्त किया जाना उस व्यवस्था पर सीधा प्रश्नचिह्न है जिसने वर्षों तक इस मामले को “सबसे बड़े भ्रष्टाचार घोटालों में से एक” बनाकर देश के सामने पेश किया। जब अदालत ने साफ़ शब्दों में कहा कि अभियोजन पक्ष के पास ठोस प्रमाण नहीं हैं तो सवाल सिर्फ यह नहीं है कि निर्दोष छूट गए. सवाल यह है कि इतने वर्षों तक देश को किस आधार पर गुमराह किया गया?
यह फैसला उस न्याय प्रणाली की भी असलियत को उजागर करता है जो कागज़ों पर तो स्वतंत्र है लेकिन व्यवहार में अक्सर सत्ता के दबाव, राजनीतिक एजेंडों और संस्थागत प्रभावों से मुक्त नहीं दिखती।
अक्सर जांच एजेंसियाँ कमजोर चार्जशीट, अधूरे सबूत और राजनीतिक कथानकों के सहारे किसी मामले को खड़ा करती हैं तो न्यायपालिका को अंततः वही करना पड़ता है जो आज हुआ। मामला ढह जाता है लेकिन इस ढहने से पहले जो राजनीतिक, सामाजिक और मानसिक नुक़सान होता है, उसकी भरपाई कोई अदालत नहीं कर पाती।
वर्षों तक किसी व्यक्ति को “भ्रष्टाचार का प्रतीक” बनाकर पेश करना, उसके चरित्र, उसकी राजनीति और उसकी सामाजिक छवि को कुचल देना, और अंत में कहना कि “सबूत नहीं थे” यह सिर्फ न्यायिक विफलता नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विफलता का एक हास्यास्पद रूप है।
यह पूरा प्रकरण बताता है कि आज का भारत सिर्फ चुनावी लोकतंत्र नहीं, बल्कि पक्षपाती एवं स्वार्थ पूर्ण राजनीतिक अभियोजन के दौर से गुज़र रहा है, जहाँ कानून सत्ता का औज़ार बनता जा रहा है। विरोध की राजनीति को ख़त्म करने के लिए जांच एजेंसियाँ सबसे प्रभावी हथियार बन चुकी हैं। ऐसे में यदि ई डी या सीबीआई जैसी संस्थाओं को सरकारी तोता कहा जाता है तो फिर इसमें ग़लत क्या है ?
ऊपर से अति सक्रिय मीडिया की वजह से मनगढ़ंत आरोप, छापे, गिरफ्तारियाँ, चार्जशीट, मीडिया ट्रायल सब मिलकर एक ऐसा माहौल बनाते हैं जिसमें अदालत का अंतिम फैसला आने से पहले ही व्यक्ति को “अपराधी” घोषित कर दिया जाता है। जनता के मन में दोष सिद्ध हो चुका होता है, भले ही कानून उसे निर्दोष घोषित कर दे लेकिन उसकी गंवाई गई प्रतिष्ठा, पैसा, सत्ता या इज्जत फिर लौटकर नहीं आती। आज का फैसला इसी मानसिकता पर करारा तमाचा है।
केजरीवाल और सिसोदिया का यह मामला केवल एक पार्टी या दो नेताओं तक सीमित नहीं है। यह उस पूरे राजनीतिक ढांचे को बेनकाब करता है जिसमें सत्ता के केंद्र से अलग सोचने वाली राजनीति को “भ्रष्टाचार”, “देशद्रोह” या “साजिश” के फ्रेम में फिट कर दिया जाता है।
आम आदमी पार्टी का उदय पारंपरिक राजनीति के लिए एक चुनौती था। भाषा में सरलता, राजनीति में नैतिकता का दावा, और सत्ता के केंद्रीकरण के खिलाफ स्वर। यही कारण है कि यह पार्टी शुरुआत से ही सत्ता प्रतिष्ठान की आँखों की किरकिरी रही। शराब नीति मामला उसी टकराव का परिणाम दिखाई देता है, जहाँ नीति से ज्यादा निशाने पर व्यक्ति और दल थे।
राजनीतिक दृष्टि से यह फैसला सत्ता पक्ष के लिए भी असहज करने वाला है। वर्षों तक जिस मामले को भ्रष्टाचार के खिलाफ निर्णायक लड़ाई बताकर प्रस्तुत किया गया, वही मामला अदालत में टिक नहीं पाया। इससे भ्रष्टाचार विरोधी राजनीति की नैतिक जमीन कमज़ोर होती है और यह सवाल उठता है कि क्या वाकई लड़ाई भ्रष्टाचार से थी या सिर्फ राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को खत्म करने का एक राजनीतिक विद्वेष भरा कदम।
जब जांच एजेंसियाँ अदालत में सबूत पेश करने में विफल हो जाती हैं तो उनका पूरा नैरेटिव संदेह के घेरे में आ जाता है। यह केवल एक केस की हार नहीं होती, यह संस्थागत विश्वसनीयता की हार होती है।
न्यायपालिका की भूमिका भी यहां गंभीर बहस के केंद्र में आती है। अदालत ने अपना कर्तव्य निभाया लेकिन सवाल यह है कि क्या न्याय प्रणाली सिर्फ अंतिम फैसले तक सीमित रहकर अपने कर्तव्य से मुक्त हो जाती है? जब वर्षों तक किसी व्यक्ति को मुकदमों में उलझाकर, उसकी स्वतंत्रता, राजनीति और जीवन को नियंत्रित किया जाता है, तो क्या केवल “बरी कर दिया गया” कह देना पर्याप्त है? न्याय सिर्फ निर्णय नहीं होता, न्याय प्रक्रिया भी होता है। अगर प्रक्रिया ही दंड बन जाए तो न्याय का अर्थ ही बदल जाता है। न्याय पर विश्वास, संस्थाओं पर विश्वास, और व्यवस्था पर विश्वास। जब यही विश्वास दरकने लगे तो लोकतंत्र सिर्फ एक औपचारिक ढांचा बनकर रह जाता है और ऐसा होना लोकतंत्र व संविधान दोनों के लिए ही ख़तरनाक है।
आज का फैसला इसलिए भी ऐतिहासिक है क्योंकि यह सिर्फ केजरीवाल और सिसोदिया की कानूनी जीत नहीं है. यह उस राजनीति की हार है जो कानून को हथियार बनाकर विरोधियों को कुचलने की रणनीति अपनाती है। यह उस सिस्टम के लिए चेतावनी है जो जांच एजेंसियों को राजनीतिक औज़ार बनाता है और मीडिया को नैरेटिव मशीन। यह बताता है कि सत्य को देर से ही सही, लेकिन पूरी तरह दबाया नहीं जा सकता।
अंततः यह सवाल बचता है कि क्या हम एक ऐसे लोकतंत्र की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ अदालतें आखिरी पड़ाव बन जाएँगी और उससे पहले का पूरा रास्ता सत्ता द्वारा नियंत्रित होगा? उम्मीद करें कि यह फैसला एक चेतावनी बनेगा कि कानून और राजनीति की सीमाएँ तय करना जरूरी है।
भले ही यह एक अंतिम फैसला न हो मगर आज का फ़ैसला सिर्फ एक केस का फ़ैसला नहीं,एक बहस की शुरुआत है, न्याय व्यवस्था की आत्मा पर, राजनीति की नैतिकता पर और लोकतंत्र की दिशा पर।
यह इस बात पर भी आत्ममंथन करने का अवसर है कि राजनीति की दशा और दिशा को कौन नियंत्रित करे।









