जवाबदेही, संवेदनशीलता और लोकतांत्रिक संतुलन का प्रश्न | अगली सुनवाई 11 मार्च 2026
एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं

एनसीईआरटी की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान पुस्तक में “न्यायपालिका में भ्रष्टाचार” शीर्षक से शामिल अध्याय ने देश में व्यापक वैचारिक बहस को जन्म दिया है। यह बहस केवल एक अध्याय तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे जुड़े प्रश्न—संस्थागत गरिमा, पारदर्शिता, किशोर मनोविज्ञान, डिजिटल युग की चुनौतियाँ और जवाबदेही—अब राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बन चुके हैं।
चयनात्मक प्रस्तुति या शैक्षणिक पारदर्शिता?
भारत में राजनीतिक और प्रशासनिक विमर्श में “मलाईदार पद”, “कमीशन”, “चाय-पानी” जैसे शब्द लंबे समय से प्रचलित रहे हैं। चुनावी मंचों से लेकर जनचर्चा तक भ्रष्टाचार को एक संरचनात्मक समस्या के रूप में स्वीकार किया जाता रहा है।
ऐसे परिदृश्य में जब कक्षा 8 की पुस्तक में केवल न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का उल्लेख हुआ, तो प्रश्न उठा—
- क्या यह चयनात्मक प्रस्तुति है?
- यदि भ्रष्टाचार बहु-संस्थागत समस्या है, तो केवल न्यायपालिका ही क्यों?
- क्या यह संस्थागत संतुलन के विरुद्ध है?

वरिष्ठ अधिवक्ता एवं नेता कपिल सिब्बल ने सार्वजनिक रूप से यह प्रश्न उठाया कि यदि न्यायपालिका का उल्लेख हो सकता है, तो फिर विधायिका, कार्यपालिका और जांच एजेंसियों का भी संदर्भ क्यों नहीं? उनका तर्क था कि शैक्षणिक ईमानदारी का अर्थ समग्रता है, न कि एकतरफा प्रस्तुति।
सुप्रीम कोर्ट का स्वतः संज्ञान और सख्त रुख
मामला तब और गंभीर हो गया जब भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए सुनवाई प्रारंभ की। प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने इसे लोकतंत्र के संवैधानिक स्तंभ की गरिमा से जोड़ा।
अदालत ने एनसीईआरटी निदेशक और शिक्षा सचिव को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए स्पष्ट किया कि—
- केवल खेद प्रकट करना पर्याप्त नहीं होगा।
- जवाबदेही तय करनी होगी।
- डिजिटल और प्रिंट दोनों स्वरूपों से सामग्री हटाने की समन्वित कार्रवाई सुनिश्चित करनी होगी।
अदालत की यह टिप्पणी कि यह “न्यायपालिका पर पहली गोली” जैसा है, इस बात का संकेत देती है कि न्यायपालिका इसे अपनी संस्थागत साख पर प्रत्यक्ष प्रहार के रूप में देख रही है। अगली सुनवाई 11 मार्च 2026 को निर्धारित है।
निर्णय प्रक्रिया और संस्थागत जवाबदेही

एनसीईआरटी की आंतरिक संरचना के अनुसार:
- पाठ्यपुस्तक समिति प्रारूप पर चर्चा करती है।
- सुझाव और संशोधन दर्ज होते हैं।
- अंतिम स्वीकृति निदेशक स्तर पर होती है।
यहाँ मूल प्रश्न उभरते हैं:
- क्या कानूनी परामर्श लिया गया था?
- क्या संवैधानिक विशेषज्ञों और शिक्षाशास्त्रियों से राय ली गई?
- क्या किशोर मनोविज्ञान को ध्यान में रखकर भाषा निर्धारित की गई?
एनसीईआरटी ने प्रेस विज्ञप्ति में इसे अनजाने में हुई त्रुटि बताते हुए पुनर्लेखन का आश्वासन दिया। किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने संकेत दिया कि उत्तरदायित्व की पहचान आवश्यक है।
किशोर मनोविज्ञान और संस्थागत विश्वास
कक्षा 8 के विद्यार्थी लगभग 13–14 वर्ष के होते हैं—एक ऐसी आयु जहाँ जिज्ञासा तीव्र होती है, परंतु विश्लेषणात्मक संतुलन अभी विकसित हो रहा होता है।
डिजिटल युग में:
- सूचनाओं की बाढ़
- सोशल मीडिया की तीव्र प्रतिक्रियाएँ
- हिंसक एवं उत्तेजक सामग्री की सहज उपलब्धता
इन सबके बीच यदि पाठ्यसामग्री बिना संतुलित संदर्भ के किसी संस्था को संदिग्ध रूप में प्रस्तुत करे, तो यह संस्थागत अविश्वास को जन्म दे सकती है।
न्यायपालिका लोकतंत्र का अंतिम आश्रय मानी जाती है। यदि छात्रों के मन में उसकी निष्पक्षता पर प्रारंभिक संदेह बैठ जाए, तो दीर्घकालिक लोकतांत्रिक आस्था प्रभावित हो सकती है।
पारदर्शिता बनाम संस्थागत गरिमा
क्या छात्रों को संस्थागत कमियों के बारे में पढ़ाना गलत है?
उत्तर—नहीं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नागरिक शिक्षा में न्यायिक त्रुटियों और सुधार आंदोलनों का उल्लेख होता है। किंतु वहाँ प्रस्तुति संतुलित होती है
- समस्या
- सुधार प्रक्रिया
- जवाबदेही तंत्र
- संस्थागत आत्म-सुधार की क्षमता
यदि अध्याय में केवल “भ्रष्टाचार” शीर्षक हो और सुधारात्मक उपायों का पर्याप्त संदर्भ न हो, तो यह एकतरफा चित्र प्रस्तुत कर सकता है। यहीं लोकतांत्रिक संतुलन आवश्यक हो जाता है।
डिजिटल युग की चुनौती
आज सामग्री केवल पुस्तक तक सीमित नहीं रहती।
- पीडीएफ
- सोशल मीडिया
- ब्लॉग
- वीडियो
एक बार प्रसारित सामग्री को पूर्णतः हटाना लगभग असंभव है। अतः समाधान केवल हटाने में नहीं, बल्कि संतुलित पुनर्प्रस्तुति में है।
आगे का मार्ग: तीन प्रमुख सबक
- संतुलित प्रस्तुति – संवैधानिक संस्थाओं पर सामग्री तथ्यपरक और सुधार-उन्मुख हो।
- किशोर संवेदनशीलता – भाषा और उदाहरण आयु-उपयुक्त हों।
- स्पष्ट जवाबदेही – समिति, निदेशक और मंत्रालय स्तर पर पारदर्शी उत्तरदायित्व तंत्र हो।
निष्कर्ष
यह प्रकरण केवल एक अध्याय का विवाद नहीं है। यह उस व्यापक प्रश्न का प्रतीक है कि लोकतंत्र में आलोचना और सम्मान के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए।
शिक्षा का उद्देश्य प्रश्न पूछना सिखाना है—पर साथ ही संस्थागत विश्वास और संवैधानिक मूल्यों को सुदृढ़ करना भी। यदि इस विवाद से अधिक परिपक्व, संतुलित और उत्तरदायी शैक्षणिक नीति विकसित होती है, तो यह भारतीय लोकतंत्र के लिए सकारात्मक संकेत होगा।
-संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र









