एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

होली केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि विश्वभर में बसे भारतीय समुदायों और विदेशी पर्यटकों को भी आकर्षित करती है। यह रंगों का उत्सव भारतीय सभ्यता की जीवंतता, आध्यात्मिकता और सामाजिक समरसता का प्रतीक है। वर्ष 2026 में होली विशेष चर्चा में है, क्योंकि 24 फरवरी से होलाष्टक प्रारंभ हो रहा है, 2 मार्च को होलिका दहन तथा 3 मार्च को रंगोत्सव मनाया जाएगा। इसी दिन चंद्रग्रहण की चर्चा के कारण धूलिवंदन की तिथि को लेकर लोगों में भ्रम की स्थिति भी बनी हुई है।
इस संदर्भ में एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी (गोंदिया, महाराष्ट्र) का मत है कि धार्मिक मान्यताओं, ज्योतिषीय दृष्टिकोण और व्यवहारिक तथ्यों के संतुलन से ही इस विषय को समझा जाना चाहिए।
पौराणिक आधार और आध्यात्मिक संदेश
होली का संबंध भक्त प्रह्लाद, होलिका और नरसिंह की कथा से जुड़ा है। यह कथा असत्य पर सत्य की विजय और अहंकार के अंत का संदेश देती है। होलिका दहन उस क्षण का प्रतीक है जब भक्ति और धर्म की रक्षा हुई। इसलिए होली केवल रंगों का खेल नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक पुनर्जागरण का पर्व भी है।
(लेख में उल्लिखित धार्मिक एवं ज्योतिषीय बातें पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित हैं; इन्हें अंतिम या वैज्ञानिक सत्य मानना आवश्यक नहीं है।)
होलाष्टक 2026: अवधि और मान्यताएँ

वर्ष 2026 में 2 मार्च को होलिका दहन है, अतः 24 फरवरी से होलाष्टक प्रारंभ होकर 3 मार्च तक रहेगा। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इन आठ दिनों में ग्रह उग्र अवस्था में माने जाते हैं। मान्यता है कि इस अवधि में विवाह, सगाई, गृह प्रवेश, वाहन क्रय, भूमि पूजन या नए व्यवसाय जैसे मांगलिक कार्यों से परहेज करना चाहिए।
हालांकि यह स्पष्ट है कि यह कोई विधिक अनिवार्यता नहीं, बल्कि परंपरागत आस्था का विषय है। विभिन्न क्षेत्रों में इन मान्यताओं का पालन अलग-अलग स्तर पर किया जाता है।
चंद्रग्रहण और धूलिवंदन: क्या है स्थिति?
3 मार्च 2026 को चंद्रग्रहण की चर्चा के कारण यह भ्रम उत्पन्न हुआ है कि धूलिवंदन 3 मार्च को होगा या 4 मार्च को। पारंपरिक रूप से रंगोत्सव पूर्णिमा तिथि के अगले दिन, अर्थात होलिका दहन के बाद मनाया जाता है।
यदि 2 मार्च की रात्रि में होलिका दहन और 3 मार्च को पूर्णिमा तिथि विद्यमान है, तो सामान्यतः रंगों की होली 3 मार्च को ही मनाई जाती है। चंद्रग्रहण का प्रभाव तभी विशेष माना जाता है जब वह भारत में दृश्य हो और उसके समय का संयोग प्रमुख पूजा-विधि से हो।
अतः केवल ग्रहण की उपस्थिति से तिथि स्वतः परिवर्तित नहीं होती। अंतिम निर्णय अधिकृत पंचांग और स्थानीय धार्मिक संस्थाओं की घोषणा पर निर्भर करता है।
हिंदू धर्म के 16 संस्कार और होलाष्टक
हिंदू जीवन-पद्धति में 16 संस्कारों का उल्लेख है, जो जीवन को अनुशासित और पवित्र बनाने का मार्ग दर्शाते हैं—
गर्भाधान, पुंसवन, सीमंतोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, कर्णवेध, विद्यारंभ, उपनयन, वेदारंभ, केशांत, समावर्तन, विवाह और अंत्येष्टि।

होलाष्टक के दौरान विवाह जैसे मांगलिक संस्कार सामान्यतः नहीं किए जाते, किंतु अंत्येष्टि जैसे आवश्यक कर्म शांति विधि के साथ संपन्न किए जाते हैं। यह धार्मिक अनुशासन और व्यवहारिक विवेक के संतुलन को दर्शाता है।
होलाष्टक में क्या करें, क्या न करें
परंपरागत सलाह:
- क्रोध, विवाद और अनावश्यक बहस से बचें।
- विवाह, गृह प्रवेश, नए निर्माण और बड़े निवेश टालें।
- पूजा-पाठ, मंत्र-जाप, व्रत और दान करें।
- हनुमान और विष्णु की आराधना शुभ मानी जाती है।
वास्तु, स्वच्छता और आध्यात्मिक मनोविज्ञान
होली से पूर्व घरों में सफाई केवल परंपरा नहीं, बल्कि मानसिक और ऊर्जात्मक शुद्धि का प्रतीक है।
सफाई के दौरान ध्यान रखने योग्य बातें (पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार):
- टूटी-फूटी वस्तुएं हटाएं।
- बंद पड़ी घड़ियों को ठीक कराएं या हटाएं।
- पूजा स्थल की विशेष सफाई करें, खंडित मूर्तियों को सम्मानपूर्वक विसर्जित करें।
- टूटे या धुंधले शीशे बदलें।
- मुख्य द्वार पर वंदनवार लगाएं।
- ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) को स्वच्छ रखें।
- पुराने कबाड़ और अखबार हटाकर घर को व्यवस्थित बनाएं।
जब घर स्वच्छ और व्यवस्थित होता है, तो मन भी शांत और सकारात्मक रहता है।
सामाजिक और अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य
आज होली सांस्कृतिक कूटनीति का माध्यम बन चुकी है। संयुक्त राज्य अमेरिका, यूरोप और एशिया के अनेक देशों में होली उत्सव आयोजित होते हैं। विदेशी पर्यटक मथुरा, वृंदावन और वाराणसी जैसे शहरों में होली का विशेष आनंद लेने आते हैं। यह भारत की सांस्कृतिक शक्ति और वैश्विक प्रभाव का प्रतीक है।
निष्कर्ष
वर्ष 2026 में 24 फरवरी से होलाष्टक प्रारंभ होकर 2 मार्च को होलिका दहन और 3 मार्च को रंगोत्सव मनाया जाना संभावित है। चंद्रग्रहण की उपस्थिति से धूलिवंदन की तिथि स्वतः 4 मार्च नहीं हो जाती, जब तक अधिकृत पंचांग अन्यथा निर्देश न दे।
होलाष्टक की मान्यताएं संयम, अनुशासन और आत्मचिंतन का संदेश देती हैं, जबकि होली का रंगोत्सव प्रेम, क्षमा और नई शुरुआत का अवसर प्रदान करता है।
जब हम घर की सफाई के साथ मन के कोनों को भी स्वच्छ करते हैं, तभी सच्चे अर्थों में होली का स्वागत कर पाते हैं। यही भारतीय संस्कृति की विशेषता है—आस्था और विवेक का संतुलित समन्वय।
संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र








