37 विधायक होने के बावजूद भाजपा की दोनों सीटों पर दावेदारी की चर्चा; संगठन सर्जन अभियान के बाद भी एकता क्यों नहीं?
चंडीगढ़/गुरुग्राम: हरियाणा में आगामी राज्यसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक वातावरण गर्म होता जा रहा है। 90 सदस्यीय विधानसभा में 37 विधायकों के साथ कांग्रेस की स्थिति मजबूत मानी जा रही है, फिर भी यह चर्चा तेज है कि भारतीय जनता पार्टी दोनों सीटों पर उम्मीदवार उतारने की तैयारी में है। इस परिस्थिति ने प्रदेश की राजनीति में कई प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि वर्तमान संख्याबल के आधार पर भाजपा की स्थिति एक सीट पर स्पष्ट दिखाई देती है, लेकिन दूसरी सीट पर दावेदारी की चर्चा यह संकेत देती है कि कहीं न कहीं विपक्ष की आंतरिक स्थिति को लेकर सत्तापक्ष आश्वस्त है।
कांग्रेस में गुटबाजी बनी चिंता का कारण
हरियाणा में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थिति को लेकर समय-समय पर गुटबाजी के आरोप सामने आते रहे हैं। सार्वजनिक मंचों पर एकता की बात होती है, परंतु अंदरूनी मतभेदों की चर्चा भी समानांतर चलती रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि विपक्ष पूर्ण रूप से संगठित और अनुशासित हो, तो अतिरिक्त सीट पर दावा करना सत्तारूढ़ दल के लिए सहज नहीं होता। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या कांग्रेस नेतृत्व ने प्रदेश इकाई में समन्वय और अनुशासन को लेकर पर्याप्त कठोरता दिखाई है?
संगठन सर्जन अभियान पर उठे प्रश्न
पार्टी के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी द्वारा प्रारंभ किए गए संगठन सुदृढ़ीकरण अभियान को लगभग नौ माह बीत चुके हैं, परंतु हरियाणा में अपेक्षित परिणाम दिखाई नहीं दे रहे। कार्यकर्ताओं के बीच यह चर्चा है कि यदि संगठनात्मक ढांचा मजबूत होता, तो राजनीतिक संदेश अधिक प्रभावी ढंग से जाता।
कई नेताओं का कहना है कि केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि ठोस संगठनात्मक निर्णयों और स्पष्ट अनुशासन से ही स्थिति में सुधार संभव है।
भाजपा की रणनीति पर भी नजर
भारतीय जनता पार्टी की ओर से दोनों सीटों पर उम्मीदवार उतारने की संभावना को राजनीतिक पर्यवेक्षक आत्मविश्वास की रणनीति के रूप में देख रहे हैं। उनका मानना है कि यह कदम विपक्ष की कमजोरी का आकलन कर उठाया गया हो सकता है।
नेतृत्व से ठोस पहल की अपेक्षा
प्रदेश की राजनीतिक चर्चा अब इस प्रश्न पर केंद्रित है कि क्या कांग्रेस नेतृत्व समय रहते स्थिति की गंभीरता को समझकर आवश्यक कदम उठाएगा। यदि संगठनात्मक एकजुटता प्रदर्शित नहीं हुई, तो “संगठन सर्जन अभियान” की सार्थकता पर भी प्रश्न उठते रहेंगे।
राज्यसभा चुनाव का परिणाम चाहे जो हो, परंतु इस पूरी प्रक्रिया ने हरियाणा कांग्रेस की आंतरिक स्थिति को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला दिया है। आने वाले दिनों में स्थिति और स्पष्ट होने की संभावना है।






