ब्रह्मांड की सरकार और धरती की राजनीति

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“जब ग्रह बदलते हैं सिंहासन, तो मनुष्य क्यों नहीं?”

“परिवर्तन का शाश्वत नियम और सत्ता का अस्थायी सत्य”

“नवसंवत्सर का संदेश: कुर्सी नहीं, कर्तव्य स्थायी है”

अमरपाल सिंह वर्मा

आने वाली 19 मार्च से विक्रम संवत 2083 का शुभारंभ हो रहा है। परंपरागत ज्योतिषीय गणना के अनुसार इस वर्ष के राजा देवगुरु बृहस्पति ग्रह माने गए हैं। हर नवसंवत्सर पर ग्रहों को प्रतीकात्मक रूप से राजा, मंत्री, सेनापति और वर्षा अधिपति जैसी भूमिकाएं दी जाती हैं। यह व्यवस्था चाहे आस्था का विषय हो, सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा हो या प्रतीकात्मक भाषा—पर इसके पीछे छिपा विचार गहरा और विचारोत्तेजक है।

इस कल्पना में एक सुंदर संदेश निहित है—सत्ता स्थायी नहीं होती। हर वर्ष भूमिकाएं बदलती हैं, दायित्व बदलते हैं, केंद्र बदलता है। कोई एक सदा के लिए सिंहासन पर नहीं बैठा रहता। यह सोच हमारी धरती की राजनीति से बिल्कुल भिन्न है, जहां कुर्सी को थामे रखना ही स्थिरता का पर्याय मान लिया जाता है।

ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार यदि बृहस्पति वर्ष के राजा हों तो ज्ञान, संतुलन और नैतिकता के संकेत माने जाते हैं। यदि शनि हों तो अनुशासन और श्रम की प्रधानता समझी जाती है, और मंगल हों तो ऊर्जा व संघर्ष का प्रभाव माना जाता है। इन मान्यताओं की सत्यता पर बहस हो सकती है, लेकिन इनके प्रतीकात्मक अर्थ से इनकार नहीं किया जा सकता। वे यह स्मरण कराते हैं कि हर समय का स्वभाव अलग होता है—और परिवर्तन प्रकृति का नियम है।

धरती पर सत्ता का आकर्षण इतना प्रबल है कि हम अक्सर मान बैठते हैं कि जो व्यवस्था आज है, वही अंतिम है। पर कैलेंडर हर वर्ष बदलकर हमें याद दिलाता है कि समय स्थिर नहीं है। यदि ब्रह्मांड की कल्पित सत्ता बदल सकती है, तो मनुष्य की सत्ता क्यों नहीं? यदि ऊपर की व्यवस्था हर वर्ष नई दिशा ग्रहण कर सकती है, तो समाज में नई सोच क्यों नहीं आ सकती?

हम परंपराओं की व्याख्या में उलझ जाते हैं, पर उनके मूल संदेश को नजरअंदाज कर देते हैं। हमारी सांस्कृतिक परंपराएं भूमिकाओं को अस्थायी बताती हैं। आज जो राजा है, वह कल सामान्य नागरिक होगा। आज जो मंच से उद्बोधन दे रहा है, वह कल श्रोताओं की पंक्ति में खड़ा होगा। जीवन स्वयं इसी परिवर्तन का नाम है—कभी पिता प्रश्न पूछता है, कभी पुत्र। कभी शिक्षक मंचासीन होता है, तो कभी शिष्य।

नवसंवत्सर सकारात्मकता का भाव लेकर आता है। चाहे बीता वर्ष कितना ही कठिन क्यों न रहा हो, नई शुरुआत की संभावना बनी रहती है। प्रकृति हर चक्र के बाद नया चक्र रचती है। सूर्य प्रतिदिन उदित होता है—बिना घोषणा, बिना बहस। ग्रह अपनी कक्षाओं में गतिमान रहते हैं—बिना स्वयं को अपरिहार्य सिद्ध किए।

धरती पर हम ही हैं जो स्वयं को अनिवार्य सिद्ध करने में लगे रहते हैं। मान बैठते हैं कि हमारे बिना व्यवस्था ठहर जाएगी। पर इतिहास साक्षी है—न कोई व्यक्ति शाश्वत हुआ, न कोई पद, न कोई शासन।

नवसंवत्सर की यह “ब्रह्मांडीय सरकार” चाहे कल्पना मानी जाए या आस्था, वह हमें एक महत्वपूर्ण शिक्षा देती है—परिवर्तन को स्वीकार करो। कुर्सी से चिपके रहने की प्रवृत्ति त्यागो। ग्रहों की चाल समझने से अधिक आवश्यक है उनके प्रतीकों को समझना।

शायद यही संदेश है—सत्ता साधन है, साध्य नहीं। समय सर्वोच्च है, और परिवर्तन ही उसका नियम।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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