युवाओं में डिजिटल लत: अगर अब भी नहीं चेते, तो बहुत देर हो जाएगी

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राजेश जैन

भारत दुनिया का सबसे युवा देश है। देश की लगभग दो-तिहाई आबादी 35 वर्ष से कम उम्र की है। यही युवा भारत की आर्थिक वृद्धि, सामाजिक बदलाव और वैश्विक प्रतिस्पर्धा की असली ताकत हैं लेकिन यही पीढ़ी आज एक ऐसे संकट की गिरफ्त में है, जो दिखता कम है और असर गहरा करता है-डिजिटल लत।

इकोनॉमिक सर्वे 2025–26 ने पहली बार इस समस्या को सिर्फ़ सामाजिक नहीं, बल्कि आर्थिक खतरे के रूप में रेखांकित किया है। सर्वे बच्चों और युवाओं के 5 से 10 घंटे तक के स्क्रीन टाइम पर गंभीर चिंता जताता है और साफ़ कहता है कि अगर यह प्रवृत्ति यूं ही बढ़ती रही तो आने वाले वर्षों में इसका असर जीडीपी पर भी दिख सकता है। यही वजह है कि रिपोर्ट में छात्रों को साधारण फोन देने, सोशल मीडिया के लिए उम्र-सीमा तय करने और उम्र आधारित डिजिटल एक्सेस पॉलिसी बनाने जैसी बड़ी सिफारिशें की गई हैं।

सर्वे का आकलन साफ़ है—छोटे बच्चे और किशोर इस लत के सबसे आसान शिकार हैं। वे जल्दी फंसते हैं, गलत कंटेंट तक पहुंच जाते हैं और धीरे-धीरे स्क्रीन पर निर्भर हो जाते हैं। इसलिए ज़रूरी है कि ऐप्स और प्लेटफॉर्म्स पर उम्र के हिसाब से पाबंदियां हों, ऑनलाइन कंपनियों को उम्र सत्यापन और बच्चों के लिए सुरक्षित सेटिंग्स की कानूनी ज़िम्मेदारी दी जाए और खासकर सोशल मीडिया, जुए से जुड़े ऐप्स, ऑटो-प्ले वीडियो और आक्रामक विज्ञापनों पर कड़ी निगरानी रखी जाए। यह चेतावनी हल्के में लेने लायक नहीं है।

डिजिटल प्रगति की चमक और उसकी छाया

पिछले एक दशक में भारत ने डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में ऐतिहासिक छलांग लगाई है। इंटरनेट कनेक्शन 25 करोड़ से बढ़कर करीब 97 करोड़ हो चुके हैं। 5जी नेटवर्क, भारतनेट और सस्ते डेटा ने गांव-गांव तक डिजिटल सेवाएं पहुंचा दी हैं। डिजिटल अर्थव्यवस्था का योगदान राष्ट्रीय आय में 13 प्रतिशत से ज्यादा होने का अनुमान है और लगभग 85 प्रतिशत घरों में कम से कम एक स्मार्टफोन मौजूद है। यह उपलब्धि है लेकिन इसके समानांतर स्क्रीन टाइम भी विस्फोटक रफ्तार से बढ़ा है। करोड़ों युवा दिन का बड़ा हिस्सा मोबाइल पर बिताते हैं-ओटीटी, सोशल मीडिया और गेमिंग के बीच झूलते हुए। यहीं से सुविधा आदत बनती है और आदत कब लत बन जाती है, पता ही नहीं चलता।

नशे जैसी आदत

इकोनॉमिक सर्वे डिजिटल लत को स्मार्टफोन, इंटरनेट, गेमिंग और सोशल मीडिया से जुड़ा नशे जैसा व्यवहार बताता है जहां व्यक्ति लगातार, अत्यधिक और जुनूनी ढंग से स्क्रीन से जुड़ा रहता है। इसके नतीजे साफ़ दिख रहे हैं: ध्यान भटकना, नींद की कमी, चिड़चिड़ापन, पढ़ाई और काम में गिरावट, सामाजिक अलगाव और भावनात्मक अस्थिरता। सबसे चिंताजनक असर 15 से 24 वर्ष के युवाओं में देखा जा रहा है। सोशल मीडिया एडिक्शन, गेमिंग डिसऑर्डर, चिंता और अवसाद के मामले तेजी से बढ़े हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन पहले ही गेमिंग डिसऑर्डर को मानसिक बीमारी के रूप में मान्यता दे चुका है। यह साफ़ संकेत है कि मामला अब व्यक्तिगत आदतों तक सीमित नहीं रहा-यह सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बन चुका है।

शिक्षा कमजोर, उत्पादकता खतरे में

डिजिटल लत का पहला शिकार शिक्षा व्यवस्था बन रही है। रील संस्कृति और शॉर्ट वीडियो ने युवाओं की गहन अध्ययन क्षमता को खोखला कर दिया है। लंबे समय तक ध्यान केंद्रित करने की आदत टूट रही है। शिक्षक बताते हैं कि छात्र किताबों से ज़्यादा स्क्रीन पर निर्भर हो गए हैं। असाइनमेंट कॉपी-पेस्ट हो रहे हैं, आलोचनात्मक सोच घट रही है। यह असर केवल परीक्षा परिणामों तक सीमित नहीं रहेगा। अत्यधिक डिजिटल निर्भरता से काम की उत्पादकता घटेगी, स्वास्थ्य खर्च बढ़ेगा और जोखिम भरे ऑनलाइन व्यवहार से आर्थिक नुकसान होगा। सवाल सीधा है-अगर युवा मानसिक रूप से थके और असंतुलित होंगे, तो देश की कार्यक्षमता कैसे बचेगी?

दुनिया का सबक: रोक नहीं, संतुलन

दुनिया के कई देश इस चुनौती को गंभीरता से ले चुके हैं। ऑस्ट्रेलिया  ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया अकाउंट पर रोक लगाई है। चीन  ने बच्चों के गेमिंग समय को सीमित किया है। इग्लैंड स्कूलों के लिए डिजिटल रेजिलिएंस फ्रेमवर्क बना रहा है और सिंगपुर मीडिया साक्षरता व साइबर वेलनेस को राष्ट्रीय प्राथमिकता दे चुका है। इन सभी प्रयासों का सार यही है कि तकनीक को हटाया नहीं जा सकता, लेकिन उसके उपयोग को दिशा दी जा सकती है।

भारत की कोशिशें: सही इरादा, अधूरा ढांचा

भारत में भी पहल शुरू हुई है।  सीबीएसई के सुरक्षित इंटरनेट दिशानिर्देश, प्रज्ञाता फ्रेमवर्क, टेली मानस हेल्पलाइन और कुछ राज्यों की डिजिटल डी-एडिक्शन योजनाएं स्वागतयोग्य हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि ये प्रयास बिखरे हुए हैं। डिजिटल लत पर कोई समग्र राष्ट्रीय डेटा नहीं है। स्कूलों में मानसिक स्वास्थ्य काउंसलर लगभग न के बराबर हैं। शिक्षक और अभिभावक दोनों ही इस नई चुनौती के लिए पर्याप्त रूप से तैयार नहीं हैं। समस्या राष्ट्रीय है, लेकिन जवाब अब भी टुकड़ों में बंटा हुआ है।

अब ज़रूरी है राष्ट्रीय डिजिटल वेलनेस नीति

अब वक्त आ गया है कि भारत डिजिटल सुविधा के साथ-साथ डिजिटल स्वास्थ्य को भी नीति के केंद्र में रखे। एक प्रभावी राष्ट्रीय डिजिटल वेलनेस नीति में स्कूल पाठ्यक्रम में डिजिटल साक्षरता और मानसिक स्वास्थ्य शिक्षा, हर ज़िले में डिजिटल लत काउंसलिंग केंद्र, उम्र के अनुसार स्क्रीन टाइम गाइडलाइन, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के एल्गोरिदम पर जवाबदेही, अभिभावकों के लिए बड़े स्तर पर जागरूकता अभियान और बच्चों-युवाओं को स्क्रीन से बाहर लाने के लिए खेल व सामुदायिक गतिविधियों को बढ़ावा जैसे कदम शामिल होने चाहिए।

आख़िरकार बात इतनी बड़ी है-अगर युवा ध्यान खो देंगे तो देश दिशा खो देगा। डिजिटल तकनीक भारत की सबसे बड़ी ताकतों में से एक है। लेकिन मानवीय संतुलन के बिना यही ताकत अगली पीढ़ी की कमजोरी बन सकती है। इकोनॉमिक सर्वे की चेतावनी हमें अभी सोचने का मौका दे रही है। सवाल सिर्फ़ यह है-क्या हम समय रहते चेतेंगे?

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Author: Bharat Sarathi

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