मनुस्मृति से संविधान तक : एक समावेशी न्यायिक यात्रा का समग्र विश्लेषण
भारतीय पारिवारिक कानून की आत्मा केवल विधिक प्रावधानों तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें सामाजिक नैतिकता और मानवीय मूल्यों की गहरी छाप है।
भारतीय न्याय व्यवस्था की यही विशिष्टता है कि वह परंपरा और आधुनिकता को विरोधी नहीं, बल्कि संवादशील मानती है। मनुस्मृति जैसे प्राचीन ग्रंथ जहाँ नैतिक संदर्भ प्रदान करते हैं, वहीं भारतीय संविधान उन नैतिक मूल्यों को विधिक अधिकारों का स्वरूप देता है।
— एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

भारत : एक जीवित सभ्यता और नैतिक न्याय की परंपरा
वैश्विक परिदृश्य में भारत केवल एक भौगोलिक राष्ट्र नहीं, बल्कि एक जीवित सभ्यता है। यहाँ धर्म, नैतिकता, आस्था, परंपरा और न्याय एक-दूसरे से गहराई से जुड़े रहे हैं। शास्त्रों में निहित जीवन-मूल्य, लोक-स्मृति में बसे संस्कार और बुजुर्गों की सीख ने केवल सामाजिक आचरण को ही नहीं, बल्कि सदियों तक विधिक सोच को भी दिशा दी है।
यही कारण है कि भारत में न्यायालय—यहाँ तक कि सर्वोच्च अदालत—भी कभी-कभी शास्त्रों, स्मृतियों और सांस्कृतिक ग्रंथों का संदर्भ देती है। यह संदर्भ किसी धार्मिक वर्चस्व का प्रतीक नहीं, बल्कि न्याय को मानवीय और संवेदनशील बनाने का माध्यम होता है। यही भारतीय न्याय प्रणाली की वह विशिष्ट पहचान है, जो उसे वैश्विक मंच पर अलग स्थान देती है।
13 जनवरी का ऐतिहासिक सुप्रीम कोर्ट निर्णय : केवल कानून नहीं, दर्शन भी
13 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गया एक महत्वपूर्ण निर्णय इसी भारतीय न्यायिक परंपरा का सशक्त उदाहरण है। यह मामला सतही तौर पर विधवा बहू के भरण-पोषण के अधिकार से जुड़ा प्रतीत होता है, किंतु इसके निहितार्थ कानून, नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व के गहरे दर्शन को उजागर करते हैं।
इस निर्णय में सुप्रीम कोर्ट की तीन माननीय न्यायमूर्तियों की पीठ ने मनुस्मृति के उस श्लोक का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया है कि— माता, पिता, पत्नी और पुत्र को कभी त्यागना नहीं चाहिए, और जो ऐसा करता है, वह दंड का भागी होता है।
यह श्लोक केवल धार्मिक उपदेश नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व का मूल सिद्धांत है। न्यायालय ने इसे सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि नैतिक आधार के रूप में उद्धृत किया, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि भरण-पोषण का दायित्व भारतीय समाज में केवल कानूनी नहीं, बल्कि मानवीय और नैतिक भी है।
संपत्ति नहीं, उत्तरदायित्व : भारतीय पारिवारिक दृष्टिकोण
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि किसी मृत व्यक्ति की संपत्ति केवल उत्तराधिकारियों की निजी संपत्ति नहीं होती। उस पर उन सभी आश्रितों का नैतिक और कानूनी अधिकार होता है, जिनकी देखभाल मृतक के जीवनकाल में उसकी जिम्मेदारी थी।
यह दृष्टिकोण भारतीय पारिवारिक संरचना की उस अवधारणा को सुदृढ़ करता है, जिसमें परिवार को केवल रक्त-संबंधों का समूह नहीं, बल्कि परस्पर दायित्वों की जीवंत इकाई माना गया है।
विवाद का मूल प्रश्न और न्यायालय का निर्णायक उत्तर

इस मामले का केंद्रीय प्रश्न यह था— यदि किसी विवाहित महिला के पति की मृत्यु उसके ससुर के जीवनकाल में होती है, तो उसे भरण-पोषण का अधिकार मिलता है; लेकिन यदि पति की मृत्यु ससुर की मृत्यु के बाद होती है, तो क्या वह इस अधिकार से वंचित हो जाएगी?
याचिकाकर्ता की ओर से यह तर्क दिया गया कि ससुर की मृत्यु के बाद विधवा बहू का पारिवारिक संपत्ति पर कोई अधिकार शेष नहीं रहता। यह तर्क भारतीय समाज की उस संकीर्ण सोच को दर्शाता है, जिसमें रिश्तों को केवल घटनाओं की समय-सीमा से आँका जाता है, न कि नैतिक उत्तरदायित्वों से।
सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि— पति की मृत्यु के समय के आधार पर विधवा बहुओं के बीच भेदभाव करना न केवल तर्कहीन है, बल्कि यह संविधान के अनुच्छेद 14 में निहित समानता के अधिकार के भी विरुद्ध है।
यह टिप्पणी संवैधानिक समानता के सिद्धांत की सशक्त पुनर्पुष्टि है।
हिंदू दत्तक ग्रहण एवं भरण-पोषण अधिनियम, 1956 : धारा 22 की व्यापक व्याख्या
अदालत ने अपने निर्णय में हिंदू दत्तक ग्रहण एवं भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 22 का विशेष उल्लेख किया। यह धारा स्पष्ट रूप से कहती है कि— मृतक हिंदू की संपत्ति से उसके उत्तराधिकारियों पर यह दायित्व बनता है कि वे उसके निर्भर व्यक्तियों का भरण-पोषण करें।
सुप्रीम कोर्ट ने व्याख्या करते हुए कहा कि विधवा बहू भी निर्भर व्यक्ति की श्रेणी में आती है, यदि वह स्वयं या अपने मृत पति की संपत्ति से जीवन निर्वाह करने में असमर्थ हो।
कानून और नैतिकता : कृत्रिम विभाजन का अंत
यह निर्णय इसलिए भी ऐतिहासिक है क्योंकि इसमें न्यायालय ने कानूनी दायित्व और नैतिक दायित्व के बीच बनाए गए कृत्रिम विभाजन को अस्वीकार किया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि— जब कानून नैतिकता से कट जाता है, तो वह केवल नियमों का संकलन रह जाता है;
और जब वह नैतिक मूल्यों से जुड़ता है, तो वही सच्चा न्याय बनता है।
मनुस्मृति जैसे प्राचीन ग्रंथ का संदर्भ देते हुए न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि धर्मनिरपेक्ष राज्य में ऐसे ग्रंथों का उल्लेख तब तक अनुचित नहीं है, जब तक उनका उपयोग सार्वभौमिक मानवीय नैतिक सिद्धांतों को स्पष्ट करने के लिए किया जा रहा हो।
निष्कर्ष : भारतीय न्याय की वैश्विक पहचान
यह निर्णय केवल विधवा बहू के अधिकारों की रक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय न्याय प्रणाली की उस विशिष्ट पहचान को रेखांकित करता है, जहाँ संविधान, परंपरा, नैतिकता और मानवीय संवेदना एक-दूसरे के पूरक बनकर सामने आते हैं।
आज जब वैश्विक न्यायिक विमर्श में सांस्कृतिक विविधता और स्थानीय नैतिकता की भूमिका पर चर्चा हो रही है, तब भारत का यह दृष्टिकोण एक प्रेरक मॉडल के रूप में उभरता है।
— संकलनकर्ता व लेखक : कानूनी विशेषज्ञ, स्तंभकार, साहित्यकार, अंतरराष्ट्रीय लेखक, चिंतक, कवि एवं सीए (एटीसी)
एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी, गोंदिया, महाराष्ट्र।







