नीट घोटाले में छोटे आरोपी गिरफ्त में, लेकिन असली मास्टरमाइंड तक पहुंचने पर उठ रहे सवाल
बार-बार पेपर लीक से परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर गहराया संकट
डा. रमेश ठाकुर

‘नीट प्रश्नपत्र लीक’ मामले में धरपकड़ जारी है। जांच का जिम्मा सीबीआई को सौंपा गया है। राजस्थान सहित कई राज्यों से कुछ आरोपी गिरफ्तार हुए हैं, लेकिन जिन लोगों की गिरफ्तारी हुई है, उनके राजनीतिक संबंधों की चर्चा भी सामने आ रही है। पुलिस अभिरक्षा में मीडिया कैमरों के सामने आरोपियों का यह कहना कि वे तो केवल “मोहरे” हैं और असली खिलाड़ी कोई बड़े स्तर के लोग हैं, निष्पक्ष जांच की उम्मीदों पर गंभीर सवाल खड़े करता है। यहीं से यह आशंका जन्म लेने लगती है कि क्या इतनी बड़ी साजिश की तह तक जांच वास्तव में पहुंच पाएगी?
करीब साढ़े 22 लाख विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़ा यह मामला केवल एक परीक्षा घोटाला नहीं, बल्कि देश की शिक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक विश्वसनीयता की परीक्षा भी है। करोड़ों अभिभावक और छात्र इस पूरे घटनाक्रम को चिंता और अविश्वास के साथ देख रहे हैं। लोगों को डर है कि कहीं यह मामला भी अन्य पेपर लीक कांडों की तरह सरकारी फाइलों में सिमटकर न रह जाए। पिछले वर्षों के अनुभव बताते हैं कि अक्सर छोटे स्तर के कर्मचारी या बिचौलिए पकड़े जाते हैं, जबकि असली मास्टरमाइंड कानून की पकड़ से दूर रह जाते हैं।
भारत में प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक अब एक भयावह प्रवृत्ति बन चुकी है। वर्ष 2019 से मई 2026 तक विभिन्न भर्ती और प्रवेश परीक्षाओं में करीब 70 से अधिक पेपर लीक होने के मामले सामने आ चुके हैं। इनमें पुलिस भर्ती, शिक्षक भर्ती और अन्य प्रतियोगी परीक्षाएं प्रमुख रही हैं। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि अधिकांश मामलों में न तो जांच पूरी हो पाई और न ही दोषियों को कठोर दंड मिला। नतीजा यह हुआ कि अपराधियों के हौसले लगातार बढ़ते गए।
सबसे अधिक सवाल अब परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था एनटीए पर उठ रहे हैं। वर्ष 2017 में गठित ‘नेशनल टेस्टिंग एजेंसी’ का उद्देश्य पारदर्शी और विश्वसनीय परीक्षा प्रणाली स्थापित करना था, लेकिन लगातार सामने आ रही गड़बड़ियों ने उसकी कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। वर्ष 2024 में भी नीट परीक्षा विवाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था। तब एनटीए ने भविष्य में ऐसी त्रुटियां न होने का भरोसा दिया था, लेकिन मात्र दो वर्षों बाद उससे भी बड़ा संकट सामने आ गया।
तकनीकी युग में भी भारत की परीक्षा प्रणाली पुराने तौर-तरीकों पर चल रही है। आज जब दुनिया के कई देशों में कंप्यूटर आधारित परीक्षाएं और एन्क्रिप्टेड डिजिटल सिस्टम अपनाए जा चुके हैं, तब भारत में अब भी प्रश्नपत्रों की छपाई और भौतिक वितरण पर निर्भरता बनी हुई है। यदि प्रश्नपत्रों के अलग-अलग सेट बनाए जाएं या डिजिटल सुरक्षा प्रणाली को मजबूत किया जाए, तो बड़े स्तर पर लीक की संभावना कम हो सकती है। यहां तक कि किसी केंद्र विशेष पर गड़बड़ी पाए जाने पर केवल उसी केंद्र की परीक्षा दोबारा आयोजित की जा सकती है, पूरी परीक्षा रद्द करने की नौबत नहीं आएगी।
इस पूरे प्रकरण में सबसे गंभीर प्रश्न कानून और सजा को लेकर भी है। यदि पूर्व के मामलों में कठोर कार्रवाई हुई होती, दोषियों की पहचान सार्वजनिक की गई होती और उन्हें उम्रकैद या भारी आर्थिक दंड जैसी सजा मिली होती, तो शायद ऐसे अपराध करने वालों में भय पैदा होता। लेकिन कमजोर जांच, लंबी न्यायिक प्रक्रिया और मामूली सजा ने पेपर लीक माफिया को लगभग निर्भय बना दिया है।
नीट जैसी परीक्षा, जो मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश के लिए आयोजित होती है, उसमें सेंध लगना देश की शिक्षा व्यवस्था के लिए बेहद चिंताजनक संकेत है। राजस्थान से सामने आए घटनाक्रम में कई छात्रों के पास ऐसे प्रश्न मिले जो मूल प्रश्नपत्र से हूबहू मेल खाते थे। शुरुआती सफाई में एनटीए ने प्रश्नपत्र प्रिंटिंग प्रेस से लीक होने की बात कही, लेकिन जानकार मानते हैं कि जहां प्रश्नपत्रों की छपाई होती है वहां अत्यंत कड़ी सुरक्षा व्यवस्था रहती है। ऐसे में यह मानना कठिन है कि इतनी बड़ी चूक केवल एक स्तर पर हुई होगी। इससे यह आशंका और मजबूत होती है कि इस पूरे खेल में एक संगठित सिंडिकेट सक्रिय है।
समय की मांग है कि केंद्र सरकार इस मामले में गंभीर हस्तक्षेप करे और परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार लागू करे। छात्रों और अभिभावकों का भरोसा बनाए रखना सरकार और संस्थाओं की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। यदि इस बार भी जांच केवल छोटे चेहरों तक सीमित रह गई, तो देश की युवा पीढ़ी का विश्वास व्यवस्था से पूरी तरह उठ सकता है। छात्रों की उम्मीदें टूटनी नहीं चाहिए, क्योंकि उनका भविष्य केवल अंकों का नहीं, बल्कि देश के कल का सवाल है।








