सोशल मीडिया : वरदान भी, अभिशाप भी

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सुरेश गोयल ‘धूप वाला’

आधुनिक युग में सोशल मीडिया मानव जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है। आज यू-ट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप और एक्स (पूर्व ट्विटर) जैसे मंचों ने सूचनाओं के आदान-प्रदान को अत्यंत सरल और त्वरित बना दिया है। ज्ञान, संवाद, रोजगार और जन-जागरूकता के क्षेत्र में सोशल मीडिया ने नई संभावनाएँ खोली हैं, किंतु इसके दुष्परिणाम भी उतने ही गंभीर और चिंताजनक होते जा रहे हैं। यही कारण है कि सोशल मीडिया आज वरदान कम और अभिशाप अधिक प्रतीत होने लगा है।

वृद्ध, युवा और बच्चे—समाज का कोई भी वर्ग इससे अछूता नहीं रहा। लोगों का अधिकांश समय मोबाइल स्क्रीन पर सिमट गया है। पारिवारिक संवाद, सामाजिक मेल-जोल और वास्तविक संवेदनाएँ आभासी दुनिया में खोती जा रही हैं। बच्चों के हाथों में खिलौनों की जगह मोबाइल आ गया है और युवा वर्ग रील्स, लाइक्स और फॉलोअर्स की दौड़ में स्वयं को भुलाता जा रहा है। यह स्थिति मानसिक, सामाजिक और नैतिक दृष्टि से अत्यंत चिंताजनक है।

सोशल मीडिया वास्तव में महासागर के समान है—विवेक और संयम के साथ इसका उपयोग किया जाए तो यह अमृत प्रदान करता है, किंतु विवेकहीनता इसे विष में बदल देती है। दुर्भाग्यवश आज इस महासागर से अमृत की अपेक्षा विष अधिक निकल रहा है। अश्लीलता की सीमाएँ लगातार टूट रही हैं। आपत्तिजनक सामग्री खुलेआम परोसी जा रही है, जिसका सबसे अधिक दुष्प्रभाव किशोरों और युवाओं के मन-मस्तिष्क पर पड़ रहा है। नैतिक मूल्यों का क्षरण और मानसिक विकृतियाँ इसी का परिणाम हैं।

इसके साथ ही सोशल मीडिया फेक न्यूज और भ्रामक सूचनाओं का सबसे बड़ा माध्यम बन चुका है। बिना किसी सत्यापन के झूठी खबरें फैलाना सामान्य हो गया है, जिससे समाज में भ्रम, अविश्वास और तनाव का वातावरण बन रहा है। कई बार यह झूठी सूचनाएँ साम्प्रदायिक सौहार्द को नुकसान पहुँचाकर सामाजिक ताने-बाने को कमजोर कर देती हैं।

और भी गंभीर चिंता का विषय यह है कि देश-विरोधी गतिविधियाँ और राष्ट्र की एकता-अखंडता को चुनौती देने वाली सामग्री योजनाबद्ध तरीके से सोशल मीडिया के माध्यम से प्रसारित की जा रही है। विकृत इतिहास, मनगढ़ंत तथ्य और भ्रामक विचारधाराएँ युवाओं के मन में देश व संस्कृति के प्रति नकारात्मकता भरने का कार्य कर रही हैं। यह एक प्रकार का बौद्धिक आतंकवाद है, जो समाज की जड़ों को चुपचाप खोखला कर रहा है।

यदि समय रहते सोशल मीडिया पर प्रभावी नियंत्रण और सख्त निगरानी नहीं की गई, तो भविष्य अत्यंत भयावह हो सकता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर अराजकता को स्वीकार नहीं किया जा सकता। सरकार को चाहिए कि वह स्पष्ट, सख्त और प्रभावी नियम बनाए तथा फेक न्यूज, अश्लीलता और देश-विरोधी सामग्री पर कठोर कार्रवाई करे। साथ ही अभिभावकों और शिक्षण संस्थानों की भी यह जिम्मेदारी है कि वे बच्चों और युवाओं को सोशल मीडिया के सकारात्मक और सीमित उपयोग के लिए जागरूक करें।

निष्कर्षतः, सोशल मीडिया न तो पूर्णतः अच्छा है और न ही पूर्णतः बुरा—यह हमारे विवेक और नियंत्रण पर निर्भर करता है। यदि समय रहते चेतना और संतुलन नहीं अपनाया गया, तो यह वरदान कब अभिशाप बन जाएगा, पता ही नहीं चलेगा। अब भी समय है—चेतने का और संभलने का।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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