कांग्रेस स्थापना दिवस पर गुरुग्राम जिला कांग्रेस में गुटबाजी की खुली तस्वीर

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कार्यक्रम से वरिष्ठ नेताओं की दूरी, संगठनात्मक एकजुटता पर उठे गंभीर सवाल

वरिष्ठ नेताओं की गैरहाज़िरी और गुटीय तकरार ने संगठन की कमजोरी उजागर की

कम उपस्थिति और नेतृत्व संकट ने फीका किया स्थापना दिवस

गुरुग्राम। कांग्रेस स्थापना दिवस के अवसर पर जहां जिला कांग्रेस सेवादल द्वारा औपचारिक कार्यक्रम आयोजित किया गया, वहीं यह आयोजन पार्टी की मजबूती से ज्यादा अंदरूनी गुटबाजी, असहमति और नेतृत्व संकट को उजागर करता नजर आया। कांग्रेस के गौरवशाली इतिहास और संघर्षों को याद करने के बजाय कार्यक्रम में पार्टी की आंतरिक कमजोरियां अधिक चर्चा का विषय बनी रहीं।

कार्यक्रम से जिला ग्रामीण अध्यक्ष वर्धन यादव, गुरुग्राम से विधायक पद के दावेदार मोहित ग्रोवर, पूर्व मंत्री सुखबीर कटारिया और जिला लीगल सेल प्रमुख नवीन शर्मा जैसे प्रमुख नेताओं की अनुपस्थिति ने संगठन के भीतर चल रही खींचतान पर सवाल खड़े कर दिए। नेताओं की यह दूरी केवल औपचारिक अनुपस्थिति नहीं, बल्कि असंतोष और गुटीय राजनीति का संकेत मानी जा रही है।

सबसे बड़ा सवाल यह उठा कि कुछ दिन पहले सांसद दीपेंद्र हुड्डा द्वारा अरावली संरक्षण को लेकर जिस जिला ग्रामीण कांग्रेस कार्यालय में प्रेस कॉन्फ्रेंस की गई, उसी कार्यालय से कांग्रेस स्थापना दिवस का कार्यक्रम क्यों नहीं हुआ? यह विरोधाभास संगठनात्मक असहमति और आंतरिक वर्चस्व की राजनीति को और स्पष्ट करता है।

कार्यक्रम के दौरान शैलजा गुट और हुड्डा गुट के बीच तकरार भी सामने आई। वरिष्ठ नेता पी.एल. कटारिया ने शारदा जी के जन्मदिन के अवसर पर शैलजा जी की तस्वीर हटाए जाने पर आपत्ति जताते हुए उसे दोबारा लगाने की मांग की। इस तरह की खुली गुटीय बहसों ने कार्यकर्ताओं में नाराजगी और असहजता पैदा की।

स्थिति यह रही कि पूरे कार्यक्रम में महज 40–50 कार्यकर्ता ही मौजूद रहे, जिनमें कुछ महिला कार्यकर्ता शामिल थीं। किसान कांग्रेस और कामगार कांग्रेस जैसे महत्वपूर्ण संगठनों की पूर्ण अनुपस्थिति ने आयोजन की गंभीरता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह हालात केवल संगठन तक सीमित नहीं हैं। भाजपा की नीतियों से असंतुष्ट जनता जब कांग्रेस की ओर उम्मीद से देखती है, तो पार्टी के भीतर की यह गुटबाजी और अस्थिरता विश्वास को कमजोर करती है।

अब सवाल यह है कि— क्या कांग्रेस अपने आंतरिक टकराव, गुटीय राजनीति और व्यक्तिगत वर्चस्व से ऊपर उठकर संगठन को मजबूत कर पाएगी?
यदि पार्टी को भविष्य में जनता का भरोसा जीतना है, तो उसे सबसे पहले अपनी अंदरूनी एकजुटता और नेतृत्व की स्पष्टता को बहाल करना होगा।

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Author: Bharat Sarathi

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