100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को जंगल न मानने से अरावली का 90% हिस्सा खनन व निर्माण के लिए खुलने का आरोप, जनआंदोलन की अपील

चंडीगढ़/रेवाडी, 24 दिसंबर 2025 – स्वयंसेवी संस्था ग्रामीण भारत के अध्यक्ष वेदप्रकाश विद्रोही ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा अरावली पहाड़ियों की ऊंचाई तय करने संबंधी फैसले को अरावली पर्वत श्रृंखला के अस्तित्व के लिए गंभीर खतरा करार दिया है। उन्होंने जारी बयान में कहा कि अदालत के फैसले के अनुसार 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को स्वतः जंगल मानने की बाध्यता नहीं रहेगी, जिससे दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान में अरावली की बड़ी भू-आकृतियां संरक्षण से बाहर हो जाएंगी।
विद्रोही के अनुसार इस परिभाषा के चलते अरावली का लगभग 90 प्रतिशत क्षेत्र खनन और निर्माण के लिए खुल सकता है, जिससे उद्योगपतियों को पहाड़ों में खनन व व्यावसायिक गतिविधियां करने में आसानी होगी। इसका सीधा असर पर्यावरण, प्रकृति संतुलन, जनजीवन और वन्यजीवों पर पड़ेगा।
उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र की मोदी–भाजपा सरकार की नीतियों का उद्देश्य अपने पूंजीपति मित्रों को लाभ पहुंचाना है। इसी क्रम में सरकारी परिसंपत्तियों के बाद अब प्राकृतिक संसाधनों और पर्यावरण को भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले की आड़ में बेचने का षड्यंत्र रचा जा रहा है। विद्रोही ने दावा किया कि केंद्र और हरियाणा सरकार की रिपोर्टों के आधार पर ही यह फैसला आया है, इसलिए लोकतंत्र में न्याय की लड़ाई का आखिरी रास्ता जनदबाव ही बचता है।
उन्होंने कहा कि राजस्थान और हरियाणा में ‘सेव द अरावली’ अभियान के तहत जागरूक नागरिक और पर्यावरण प्रेमी आगे आ रहे हैं, लेकिन सरकार को झुकाने के लिए जन-जन की भागीदारी आवश्यक है। अरावली पर्वतमाला दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान के लिए जीवनरेखा है—यह थार मरुस्थल की धूल को रोकती है, भूजल रिचार्ज करती है और जैव विविधता को बनाए रखती है।
विद्रोही ने चेतावनी दी कि यदि संरक्षण कमजोर हुआ तो धूल व प्रदूषण बढ़ेगा, भूजल स्तर गिरेगा, बोरवेल सूखेंगे और गर्मी अधिक तीव्र होगी। इसके परिणामस्वरूप स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ेंगी और लोगों के पलायन की स्थिति भी बन सकती है।
अंत में उन्होंने आमजन से अपील की कि मोदी–भाजपा सरकार और उसके पूंजीपति मित्रों के पर्यावरण-विरोधी मंसूबों को पहचानें, भ्रामक प्रचार से बचें और अरावली को बचाने के लिए लोकतांत्रिक तरीके से सड़कों पर उतरकर विरोध दर्ज करें, ताकि इस फैसले पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सके।









