डॉ घनश्याम बादल

जैसे-जैसे भारत और अमेरिका के बीच हुई ट्रेड डील की डिटेल्स सामने आ रही हैं, व्यापार और संप्रभुता के सवाल भी नहीं जोर शोर से हवा में उछलते दिखाई देने लगे हैं। जहां सरकारी पक्ष इसे ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कहे जाने वाली फ्री ट्रेड डील के बाद ‘फादर ऑफ ऑल डील्स’ कहकर अपनी पीठ थपथपा रहा है और भारत की बढ़ती हुई हैसियत का हवाला दे रहा है वहीं विपक्ष व्यापार के नाम पर अपनी संप्रभुता से समझौता तथा अमेरिका के आगे घुटने टेकने का उपक्रम बता रहा है।
बेशक यह रणनीतिक साझेदारी का स्वाभाविक विस्तार कहा जा सकता है । सरकार भी इसे वैश्विक शक्ति संतुलन, निवेश वृद्धि और आर्थिक विकास का इंजन कहती है लेकिन हर बड़ी व्यापारिक संधि की तरह यह समझौता भी सिर्फ अवसरों का दस्तावेज़ नहीं है बल्कि यह शक्ति-संतुलन, निर्भरता और नीतिगत नियंत्रण का राजनीतिक मिश्रण भी है। सवाल यह ही नहीं है कि ट्रेड डील किसके लिए कितनी फ़ायदेमंद होगी, सवाल यह भी है कि यह डील भारत को साझेदार बनाएगी या एक सिर्फ बाज़ार।
रणनीतिक गठजोड़ या नीतिगत दबाव:
सरकार और उसके समर्थकों के अनुसार भारत-अमेरिका ट्रेड डील से भारत की वैश्विक कूटनीतिक स्थिति मजबूत होने जा रही है। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सामरिक संतुलन, चीन के प्रभाव का प्रतिकार और लोकतांत्रिक शक्तियों के गठबंधन के लिए यह समझौता एक राजनीतिक आधार बनेगा तथा भारत को वैश्विक मंच पर ‘विश्वसनीय साझेदार’ की पहचान मिलेगी।
लेकिन कटु यथार्थ यह भी है कि अमेरिकी ट्रेड डील कभी बराबरी की शर्तों पर नहीं होती। वह हमेशा नीति-संशोधन के दबाव के साथ आती है. इस समझौते में भी बौद्धिक संपदा कानूनों में कठोरता,कृषि, डेयरी और फार्मा बाज़ार खोलने की मांग, डिजिटल टैक्स और डेटा नीति में हस्तक्षेप नज़र आ रहा है । आशंका यह भी है कि यह धीरे-धीरे भारत की नीतिगत संप्रभुता को सीमित कर सकता है। ध्यान में रखना होगा कि राजनीतिक स्वतंत्रता केवल सीमाओं से नहीं आती, वह नीतियों से आती है और जब नीतियाँ बाहरी दबाव से तय हों, तो संप्रभुता प्रतीक मात्र रह जाती है।
विकास या संरचनात्मक निर्भरता?
यदि इस समझौते के सकारात्मक आर्थिक प्रभावों को देखें तो अमेरिकी निवेश से पूंजी प्रवाह बढ़ेगा, आईटी, फार्मा, टेक्सटाइल और इंजीनियरिंग निर्यात को अमेरिकी बाज़ार मिलेगा, इंफ्रास्ट्रक्चर और स्टार्टअप सेक्टर को गति मिलेगी लेकिन इस रास्ते पर चलने के जोखिम भी कम नहीं हैं क्योंकि भारतीय लघु एवं मध्यम उद्योग सेक्टर पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का दबाव बढ़ेगा, अमेरिकी सब्सिडी आधारित कृषि उत्पादों से भारतीय किसान संकट में आ सकते हैं, डिजिटल सेक्टर में अमेरिकी कंपनियों के एकाधिकार की आशंका भी डराने वाली है। जानकारों का मानना है कि यह मॉडल ‘आत्मनिर्भर विकास’ नहीं, बल्कि निर्भरता आधारित विकास को जन्म देगा जहाँ ग्रोथ तो दिखाई देती है लेकिन नियंत्रण बाहर का होता है।
अवसरों का विस्तार या असमानता का विस्फोट?
यदि सामाजिक दृष्टि से देखे तो इस डील के सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों प्रभाव दृष्टिगोचर हो रहे हैं सकारात्मक प्रभाव में शहरी युवाओं के लिए रोजगार अवसर, वैश्विक स्किल एक्सपोज़र, शिक्षा, रिसर्च और टेक्नोलॉजी सहयोग शामिल हैं तो नकारात्मक पक्ष के रूप में ग्रामीण-शहरी खाई का विस्तार, पारंपरिक रोजगार क्षेत्रों का क्षरण, गिग इकॉनोमी का विस्तार, न सामाजिक सुरक्षा का अभाव भी आता दिखाई दे रहा है ।
आशंका यह भी है कि यह समझौता एक ऐसा समाज गढ़ सकता है जहाँ एक छोटा ‘ग्लोबल एलीट वर्ग’ तो समृद्ध होगा, लेकिन बड़ा सर्वहारा एवं मध्यम वर्ग आर्थिक असुरक्षा में जीएगा। इस तरह कह सकते हैं कि यह विकास नहीं, विकास का ध्रुवीकरण है।
वैश्वीकरण या शक्ति-संतुलन
इस समझौते के सकारात्मक संकेतों में, सप्लाई चेन डायवर्सिफिकेशन में भारत की भूमिका,चीन-केंद्रित व्यापार संरचना का विकल्प, वैश्विक वैल्यू चेन में भारत की भागीदारी के विस्तार को रेखांकित किया जा सकता है जबकि वास्तविकता यह है कि वैश्विक व्यापार नियमों पर महाशक्तियों का वर्चस्व होता चला जाएगा, छोटे देशों के लिए प्रतिस्पर्धा असमान हो जाएगी ,नियम-आधारित व्यवस्था के नाम पर शक्ति-आधारित व्यवस्था वर्चस्व में आ जाएगी । यह व्यवस्था समान वैश्वीकरण नहीं, बल्कि असमान वैश्वीकरण को जन्म देती दिखाई देती है।
साझेदारी बनाम बाज़ार
भारत–अमेरिका ट्रेड डील अपने स्वरूप में न अच्छी है, न बुरी। वह शर्तों से परिभाषित होगी। यदि यह डील स्थानीय उद्योगों की रक्षा करे, किसानों के हित सुरक्षित रखे, डिजिटल व डेटा संप्रभुता को मजबूत करे, नीति-निर्माण की स्वतंत्रता बनाए रखे तो यह रणनीतिक साझेदारी होगी। लेकिन यदि यह एकतरफा बाज़ार खोलने पर आधारित हो, अमेरिकी कॉर्पोरेट हितों को प्राथमिकता दे, भारत को उपभोक्ता बाज़ार तक सीमित कर दे नीति-निर्माण को बाहरी दबाव में ले जाए तो यह आर्थिक उपनिवेशवाद का आधुनिक रूप भी बन जाएगी।
साझेदारी या बाजार ?
आज भारत के सामने मूल प्रश्न यही है क्या हम साझेदार बनेंगे या सिर्फ बाज़ार? क्या हम नीति-निर्माता रहेंगे या नीति-ग्राहक बनेंगे? क्या हम स्वतंत्र शक्ति बनेंगे या रणनीतिक अनुयायी? ट्रेड डील विकास का साधन बन सकती है लेकिन चेतना न हो तो वही समझौता भविष्य की सबसे बड़ी निर्भरता का दस्तावेज़ बन जाएगा। हमारी नीति निर्धारकों को यह जान लेना चाहिए कि इतिहास इस बात का गवाह है कि जो राष्ट्र सिर्फ बाज़ार बनते हैं, वे अंततः निर्णय लेने की शक्ति भी खो देते हैं। इसलिए इस ट्रेड डील पर न खुश होकर नाचने की ज़रूरत है और न ही आंसू बहाने और मायूस होने की लेकिन इसकी शर्तों और उपबंधों पर यदि अभी से लगाम नहीं कसी गई तो फिर आने वाले समय में यह बहुत भारी भी पड़ सकती है।
इस ट्रेड डील के रास्ते पर चलते हुए हर समय दिमाग और आंखें खुली रखनी होगी और यह निश्चित करना होगा कि बाहर से कोई हम पर कोई निगाह रखने जैसी हैसियत न रखने पाए और यदि वह रखता भी है तो हम में इतनी ताक़त होनी चाहिए कि हम उस निगाह रखने वाले की आंख में आंख डालकर जवाब दे सकें और अपना अस्तित्व एवं वर्चस्व बचा सकें।






