गुरुग्राम, 18 दिसंबर 2025। जब देश में आज़ादी के मूल्यों को कमजोर करने और इतिहास को सुविधानुसार तोड़-मरोड़ने की कोशिशें तेज़ हैं, ऐसे दौर में लक्ष्मण विहार फेस-2 स्थित कीर्ति मोंटेसरी स्कूल में ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक यूथ ऑर्गेनाइजेशन (AIDYO) द्वारा काकोरी कांड के अमर शहीदों के शहादत दिवस पर आयोजित स्मृति सभा एक सशक्त वैचारिक हस्तक्षेप के रूप में सामने आई। कार्यक्रम की शुरुआत शहीदों के चित्रों पर पुष्प अर्पित कर उस क्रांतिकारी विरासत को याद करने से हुई, जिसे आज के सत्ता विमर्श से जानबूझकर हाशिये पर धकेला जा रहा है।
सभा में सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से यह स्पष्ट संदेश दिया गया कि शहीद केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान संघर्षों की प्रेरक शक्ति हैं। नानकी देवी द्वारा प्रस्तुत ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ गीत ने उपस्थित जनसमूह को भावुक करते हुए यह सवाल भी खड़ा किया कि क्या आज का भारत वास्तव में शहीदों के सपनों का भारत है। अमृता के जोशीले गीत ने युवाओं को निष्क्रिय दर्शक नहीं, बल्कि सक्रिय संघर्षकर्ता बनने का आह्वान किया।
मुख्य वक्ता एवं ऑल इंडिया यूनाइटेड ट्रेड यूनियन सेंटर (AIUTUC) के जिला सचिव श्रवण कुमार गुप्ता ने कहा कि काकोरी के शहीदों का संघर्ष केवल ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ नहीं था, बल्कि हर प्रकार के शोषण, अन्याय और असमानता के विरुद्ध था। उन्होंने मौजूदा आर्थिक नीतियों, बढ़ती बेरोज़गारी और श्रमिक विरोधी फैसलों को शहीदों के सपनों के साथ खुला विश्वासघात बताया।
ए.आई.डी.वाई.ओ. के संयोजक बलवान सिंह ने कहा कि आज युवाओं को उपभोक्तावाद, झूठे राष्ट्रवाद और नफ़रत की राजनीति में उलझाकर असली सवालों से दूर किया जा रहा है। उन्होंने आह्वान किया कि युवा वर्ग संगठित होकर लोकतंत्र, संविधान और सामाजिक न्याय की रक्षा के लिए सड़कों पर उतरे, यही शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
शिक्षक कमल कांत ने कहा कि शिक्षा को बाज़ार की वस्तु बना देने की सोच ने युवाओं की वैचारिक चेतना को कमजोर किया है। उन्होंने क्रांतिकारियों के चरित्र, त्याग और नैतिक साहस को आज की शिक्षा व्यवस्था के लिए अनिवार्य बताया और कहा कि बिना वैचारिक स्पष्टता के कोई भी समाज प्रगतिशील नहीं बन सकता।
सामाजिक कार्यकर्ता निरंजन लाल ने स्थानीय समस्याओं को राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य से जोड़ते हुए कहा कि जब तक आम नागरिक अन्याय के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाएगा, तब तक शहीदों के बलिदान का सम्मान केवल औपचारिकता बनकर रह जाएगा।
सभा का संचालन वजीर सिंह ने किया, जिन्होंने क्रांतिकारियों के अंतिम संदेशों को उद्धृत करते हुए वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों पर तीखे सवाल खड़े किए।
स्मृति सभा में कपिल कोशिश, फूल सिंह, रामनिवास शर्मा, सुरेंद्र कौशिक, कृष्ण कुमार, रमेश शर्मा, राजेंद्र प्रसाद गुप्ता, रणधीर, अमित शर्मा, बाबूलाल, मदन डुडेजा, सुमन, प्रियंका, बनिता, सुखदेवी, आशा देवी, बिमला, संगीता, अंशिका सहित बड़ी संख्या में युवाओं और महिलाओं की उपस्थिति ने यह स्पष्ट कर दिया कि वैचारिक संघर्ष की ज़मीन अभी जीवित है।
कार्यक्रम के अंत में उपस्थितजनों ने संकल्प लिया कि वे क्रांतिकारी शहीदों के विचारों को केवल स्मृति सभाओं तक सीमित नहीं रखेंगे, बल्कि उन्हें सामाजिक, राजनीतिक और लोकतांत्रिक संघर्षों में व्यवहारिक रूप से लागू करेंगे।









