– एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी,

सृष्टि में मानव को मिला सबसे बड़ा वरदान है – ज्ञान। यह ज्ञान जन्म से ही परिवार और समाज के व्यवहारों से मिलने लगता है। उम्र के साथ-साथ यह अनुभव-आधारित सीख व्यवहारिक शिक्षा में बदलती जाती है। बाद में स्कूल-कॉलेज की परीक्षाएं, डिग्रियाँ और प्रमाणपत्र हमारी किताबी शिक्षा को आकार देते हैं। यानि आदर्श रूप में इंसान के पास दोनों ही तरह का ज्ञान होना चाहिए – किताबी भी, व्यावहारिक भी। यही शिक्षा को सोने पर सुहागा बनाती है।
लेकिन समाज की हकीकत जरा अलग है। यहाँ कई व्यवहारिक ज्ञान वाले ‘बड़े होशियार’ लोग अपनी हर जिम्मेदारी का ठिकाना तय किए बैठे रहते हैं—
“अरे भाई! तुम तो पढ़े-लिखे हो… हमसे क्या उम्मीद! हम तो अनपढ़ ही भले!”
और यहीं से शुरू होती है व्यंग्य की असली कहानी…
जब संकट हो – “हम अनपढ़”… और जब श्रेय आए – “देखो हमने किया!”
अक्सर विवाद या मुश्किल हालात देखकर व्यवहारिक ज्ञान वाले यह डायलॉग मारते नज़र आते हैं—
“तुम पढ़े-लिखे हो, तुम समझाओ… हम ठहरे अनपढ़ लोग!”
यानी जिम्मेदारी ट्रांसफर करके वे अपने हाथ झाड़ लेते हैं।
लेकिन जैसे ही स्थिति उनके पक्ष में होने लगे—
“देखा! हमने कर दिखाया। अब तुम्हारी पढ़ाई-लिखाई किस काम की?”
दोनों ही हालात में जीत उन्हीं की… और पढ़े-लिखे बेचारे सैद्धांतिक ज्ञान के कबूतर बने बैठे!
किताबों के जाल में ‘अनुभवहीन विद्वान’
सिर्फ डिग्री से शिक्षित होना आज शिक्षा का पैमाना बना दिया गया है।
लेकिन सवाल यह है – क्या शिक्षा सिर्फ परीक्षा पास करने का नाम है?
किताबी ज्ञान के धनी लोग कभी-कभी कचरा सड़क पर फेंक आते हैं और सुबह वही कचरा एक तथाकथित किताबी-अनपढ़ सफाईकर्मी उठाता है। अब बताइए, कौन अधिक शिक्षित?
आज शिक्षा का स्तर बढ़ा जरूर है, मूल्य कम हो गया है—
पहले ग्रेजुएशन काफी था… फिर पोस्ट-ग्रेजुएशन… और आज तो पीएचडी भी “कोई बड़ी बात नहीं”!
जहाँ ओवर-रटनेस हो और मानवीय संवेदनाएँ गायब, वहाँ शिक्षा बेअसर होकर रह जाती है।
किताबी बनाम व्यवहारिक — अंतर कहाँ?
| पहलू | किताबी शिक्षित | व्यवहारिक ज्ञान वाले |
|---|---|---|
| गणितीय समझ | कैलकुलेटर के बिना बेबस | उँगलियों पर भी हिसाब तय |
| समस्या-समाधान | सिद्धांत में चैंपियन | ज़मीनी हकीकत में माहिर |
| सूचना खोजना | पता, कागज़ात आसानी से संभालता | दूसरों पर निर्भर |
| विश्वास | तर्क से परखता | अफ़वाह पर दौड़ पड़ता |
परिस्थिति अनुसार व्यवहारिक लोग खुद को अनपढ़ दिखाकर सहानुभूति भी बटोरते हैं और वक्त आने पर चतुराई से मौके भी हथिया लेते हैं।
संस्कार और विचारधारा का समीकरण
व्यवहारिक शिक्षा अक्सर घर-परिवार के संस्कारों से जुड़ी रहती है। वहीं किताबी शिक्षित व्यक्ति कभी-कभी उन्हीं मूल्यों को “पुराना” कहकर किनारे कर देता है।
नतीजा—रिश्तों की अहमियत कम और सिर्फ अपने घर-परिवार तक सीमित जिम्मेदारियाँ!
दूसरी तरफ व्यवहारिक लोगों के पास संस्कृति का सहारा भी… और दोनों हाथों में मलाई रखने की कला भी!
अंत में सवाल वही – शिक्षित कौन?
यदि हम—
- घर साफ रखें पर सड़क पर कचरा फैलाएँ
- दूसरों की निजी ज़िंदगी में दखल दें
- समाज के प्रति ज़िम्मेदारी भूल जाएँ
तो फिर हमारी डिग्री किस काम की? व्यवहारिक ज्ञान बिना किताबी शिक्षा अधूरी
और
किताबी समझ बिना व्यवहारिकता – महज़ कागज़ का बोझ
निष्कर्ष
जवाबदारी से बचने का लाइसेंस बन गई है ‘हम तो ठहरे अनपढ़’ की पंक्ति।
जब तक शिक्षा मानवीय संवेदनाएँ, सहनशीलता, और सामाजिक प्रतिबद्धता पैदा न करे, तब तक न पाठशाला पूरी, न व्यवहार…
सच्ची शिक्षा वही है, जो इंसान को इंसान बनाए।
-संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यम सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र









