डॉ. घनश्याम बादल

लोकतंत्र में चुनाव केवल सरकार बनाने की कवायद नहीं, बल्कि जनता के मतादेश को सत्ता में बदलने की संवैधानिक व्यवस्था हैं। इस व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण संस्था निर्वाचन आयोग है। यदि उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगें तो लोकतंत्र में बेचैनी पैदा होना स्वाभाविक है। रामलीला मैदान में एक नवंबर को आयोजित विपक्ष की ‘जन महाभियोग’ रैली इसी बेचैनी की राजनीतिक अभिव्यक्ति के रूप में सामने आई।
सवाल यह है कि विपक्ष को सड़क पर उतरकर ‘जन महाभियोग’ जैसा राजनीतिक हथियार क्यों उठाना पड़ा? क्या संसद में उसकी आवाज नहीं सुनी जा रही थी या फिर उसे लगने लगा है कि चुनावी मैदान में मुकाबला करने से पहले चुनाव कराने वाली संस्था को ही कठघरे में खड़ा करना जरूरी हो गया है?
दरअसल, इस टकराव की जड़ में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण है। विपक्ष का आरोप है कि इस प्रक्रिया की आड़ में बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम काटे जा रहे हैं। उसका दावा है कि इससे खास वर्गों और विपक्ष समर्थक मतदाताओं के मतदान का अधिकार प्रभावित हो रहा है। वह इसे ‘वोट चोरी’ की संज्ञा दे रहा है। निर्वाचन आयोग की कार्यशैली, शिकायतों के निस्तारण और चुनावी पारदर्शिता को लेकर भी विपक्ष लगातार आक्रामक हो रहा है। कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों की नजर में आयोग की निष्पक्षता पर संदेह इतना गहरा गया है कि उन्होंने ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध संयुक्त रूप से ‘जन महाभियोग’ का आह्वान किया।
यहां समझना जरूरी है कि ‘जन महाभियोग’ कोई संवैधानिक प्रक्रिया नहीं है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त को पद से हटाने की निर्धारित संवैधानिक व्यवस्था है। विपक्ष की यह पहल मूलतः राजनीतिक और प्रतीकात्मक है। इसका उद्देश्य आयोग की कार्यशैली पर उठाए जा रहे सवालों और उसके प्रति व्यक्त अविश्वास को सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में लाना है।
रामलीला मैदान की रैली विपक्ष के लिए ‘इंडिया’ गठबंधन की सामूहिक ताकत दिखाने का अवसर भी बनी। विपक्षी नेताओं ने इसे व्यापक जनसमर्थन वाला आंदोलन बताया, जबकि भाजपा ने इसे असफल आयोजन करार दिया। भीड़ की संख्या को लेकर भी परस्पर विरोधी दावे सामने आए। हालांकि, स्वतंत्र और विश्वसनीय आकलन के बिना किसी संख्या को वास्तविक उपस्थिति मान लेना उचित नहीं होगा। राजनीतिक रैलियों में भीड़ का आकार अक्सर आयोजकों के उत्साह और विरोधियों के आकलन के बीच झूलता रहता है।
रैली के भाषणों में मुख्यतः तीन मुद्दे उभरे—मताधिकार की सुरक्षा, निर्वाचन आयोग की जवाबदेही और सत्तारूढ़ दल को कथित चुनावी लाभ पहुंचाने के आरोप। विपक्षी नेताओं ने मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों को लोकतांत्रिक अधिकारों पर चोट बताते हुए इसे व्यापक संघर्ष का विषय बनाने की कोशिश की। इन भाषणों में आक्रोश था, आरोप थे और राजनीतिक चेतावनियां भी।
लेकिन विपक्ष की आक्रामकता के बीच कुछ असहज सवाल भी खड़े होते हैं। क्या मतदाता सूची से हटाया गया हर नाम फर्जीवाड़े का प्रमाण है? क्या हर प्रशासनिक त्रुटि के पीछे राजनीतिक साजिश होती है? यदि किसी मामले में ऐसा आरोप है तो उसके प्रमाण कहां हैं? लोकतंत्र में आरोप लगाना आसान है, लेकिन उन्हें दस्तावेजों और तथ्यों से सिद्ध करना कठिन। विपक्ष को केवल आशंकाओं के सहारे नहीं, ठोस प्रमाणों के साथ सामने आना होगा। जहां किसी पात्र मतदाता का नाम गलत ढंग से हटाया गया हो, वहां उसके अधिकार की बहाली के लिए प्रभावी पहल भी करनी होगी।
दूसरी ओर, भाजपा का रवैया भी सवालों से परे नहीं है। रैली को राजनीतिक नौटंकी या विपक्ष की हताशा बताकर खारिज कर देना मूल प्रश्नों का उत्तर नहीं हो सकता। पुनरीक्षण के पक्ष में तर्क दिया जा रहा है कि मतदाता सूची को शुद्ध करना आवश्यक है, ताकि मृत व्यक्तियों, दोहरी प्रविष्टियों और अपात्र लोगों के नाम हटाए जा सकें। यह उद्देश्य अपनी जगह उचित है, लेकिन इससे यह सवाल समाप्त नहीं हो जाता कि किसी पात्र मतदाता का नाम गलत ढंग से हट जाए तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? किसी लोकतांत्रिक देश में मतदाता सूची की शुद्धता जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी यह सुनिश्चित करना भी है कि कोई पात्र नागरिक मतदान के अधिकार से वंचित न हो।
ऐसे में निर्वाचन आयोग की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। आयोग कोई सरकारी विभाग नहीं, बल्कि स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है। उसकी सबसे बड़ी पूंजी उसकी निष्पक्षता और उस पर जनता का भरोसा है। निष्पक्ष होना पर्याप्त नहीं, अपनी कार्यप्रणाली से निष्पक्षता का विश्वास पैदा करना भी जरूरी है। यदि राजनीतिक दलों के साथ आम मतदाता भी उसके निर्णयों पर संदेह करने लगें तो यह संस्था की साख के लिए गंभीर चेतावनी है। आयोग को आलोचना का उत्तर स्पष्ट आंकड़ों, पारदर्शी प्रक्रियाओं और शिकायतों के समयबद्ध निस्तारण से देना चाहिए।
इस रैली के राजनीतिक निहितार्थ भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। पहला, विपक्ष चुनावी गड़बड़ियों के मुद्दे को केवल संसदीय बहस तक सीमित नहीं रखना चाहता। दूसरा, कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों को एक साझा मुद्दा मिला है, जिस पर वे भाजपा के विरुद्ध एक मंच पर खड़े हो सकते हैं। तीसरा, यह रैली आगामी चुनावों के लिए राजनीतिक जमीन तैयार करने का प्रयास भी है। लेकिन विपक्ष की असली परीक्षा रैली में जुटी भीड़ से अधिक उसके बाद की रणनीति और आचरण से होगी।
यह भी याद रखना होगा कि निर्वाचन आयोग पर सवाल उठाना लोकतंत्र विरोधी नहीं है, लेकिन बिना प्रमाण किसी संस्था को दोषी घोषित करना भी लोकतांत्रिक परंपरा के अनुकूल नहीं है। इसी तरह सत्ता पक्ष विपक्ष की हर आवाज को राजनीतिक हताशा बताकर अपनी जवाबदेही से नहीं बच सकता। सवालों की गंभीरता का निर्धारण उन्हें उठाने वाले दल की पहचान से नहीं, उनके तथ्यात्मक आधार से होना चाहिए।
बेशक, लोकतंत्र सत्ताधारी दल की जागीर नहीं और न ही विपक्ष का राजनीतिक बंधक है। निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी किसी दल की सुविधा या असुविधा के अनुसार काम करना नहीं, बल्कि स्वतंत्र, निष्पक्ष और विश्वसनीय चुनाव सुनिश्चित करना है। चुनाव संबंधी शिकायतों का निष्पक्ष निस्तारण और जनता के मताधिकार की रक्षा इसी जिम्मेदारी के अनिवार्य हिस्से हैं। उसे इस कसौटी पर खरा उतरना होगा।
सत्ता को यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि बहुमत मिलने से हर सवाल का जवाब मिल जाता है। विपक्ष को भी यह मुगालता नहीं होना चाहिए कि हर आरोप अपने आप जनादेश बन जाएगा। लोकतंत्र में अंतिम राजनीतिक फैसला मतदाता करता है। रामलीला मैदान की भीड़, संसद का शोर और सत्ता का अहंकार उसकी स्वतंत्र इच्छा का विकल्प नहीं बन सकते। उसकी उंगली पर लगने वाली स्याही तभी लोकतंत्र का सार्थक प्रमाण बनेगी, जब उसका मताधिकार सुरक्षित हो और चुनावी व्यवस्था अपनी पारदर्शिता तथा निष्पक्षता से उसका भरोसा अर्जित करे।








