रामलीला मैदान से लोकतंत्र की हुंकार

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मतदाता अधिकार और चुनावी पारदर्शिता पर विपक्ष का साझा स्वर; रैली के संदेश को जनसंवाद और ठोस कार्यक्रम में बदलने की चुनौती

कुमार कृष्णन

दिल्ली का रामलीला मैदान 1 नवंबर 2026 को एक बार फिर राजनीतिक सरगर्मी का केंद्र बना। ‘इंडिया’ गठबंधन की महारैली विपक्षी दलों के शक्ति प्रदर्शन के साथ मतदाता सूची, चुनावी पारदर्शिता, निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता और नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़े सवालों का मंच भी बनी। ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ के नारे के साथ आयोजित इस रैली का संदेश स्पष्ट था—विपक्ष चुनावी प्रक्रिया से जुड़े विवादों को संसद और राजनीतिक बयानबाजी से आगे ले जाकर जनांदोलन का रूप देना चाहता है।

राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे, प्रियंका गांधी और विभिन्न राज्यों के विपक्षी नेताओं की भागीदारी ने आयोजन को व्यापक राजनीतिक स्वरूप दिया। अलग-अलग विचारधाराओं और क्षेत्रीय हितों वाले दलों का एक मंच पर आना महत्त्वपूर्ण था। हालांकि इस एकजुटता की सार्थकता इस बात से तय होगी कि साझा मंच से उठे सवाल आगे किस ठोस कार्यक्रम में बदलते हैं।

रैली में राहुल गांधी की उपस्थिति विशेष आकर्षण का केंद्र रही। भारी भीड़ के बीच पदयात्रा के बजाय वे खुले वाहन से रामलीला मैदान पहुंचे। उनके साथ प्रियंका गांधी और अन्य विपक्षी नेता भी थे। सड़कों पर जुटे कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच नेताओं का इस तरह आगे बढ़ना जनसंपर्क और राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन की तस्वीर बना।

राहुल गांधी ने कथित ‘वोट चोरी’ के मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को निशाने पर लिया। उन्होंने आरोप लगाया कि मतदाता सूचियों में गड़बड़ियों के जरिए नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकार कमजोर किए जा रहे हैं। उनके वक्तव्य का केंद्रीय प्रश्न था कि यदि योग्य नागरिकों के नाम मतदाता सूची से हटते हैं तो चुनाव की निष्पक्षता पर भरोसा कैसे बना रहेगा?

कांग्रेस इस मुद्दे को निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली तक सीमित रखने के बजाय संविधान, नागरिक अधिकार और सत्ता की जवाबदेही से जोड़ रही है। लेकिन राजनीतिक आरोप और प्रमाणित तथ्य के बीच अंतर बनाए रखना आवश्यक है। आरोपों की गंभीरता का आकलन दस्तावेजों, स्वतंत्र जांच और आयोग के उत्तर के आधार पर ही होना चाहिए।

इस महारैली का एक उल्लेखनीय दृश्य पूर्णिया के निर्दलीय सांसद पप्पू यादव, अर्थात राजेश रंजन, का तिरंगा मार्च रहा। साधु-संतों और समर्थकों के साथ रामलीला मैदान पहुंचे पप्पू यादव ने आंदोलन को लोकतंत्र, संविधान और आम नागरिकों के अधिकारों की रक्षा से जोड़ा। मार्च में शामिल लोगों के हाथों में राष्ट्रीय ध्वज था।

पप्पू यादव ने केंद्र सरकार और भाजपा की आलोचना करते हुए कहा कि यह संघर्ष किसी एक दल या व्यक्ति के लिए नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था और जनाधिकारों के लिए है। उनकी पहल में साधु-संतों की भागीदारी राजनीतिक विरोध को व्यापक सामाजिक आधार देने का प्रयास दिखाई दी। भारतीय राजनीति में धार्मिक और सामाजिक समूहों की सार्वजनिक भूमिका का लंबा इतिहास है। इस अवसर पर मताधिकार और संविधान से जुड़े प्रश्नों के साथ उनकी उपस्थिति ने रैली में सामाजिक भागीदारी का एक और आयाम जोड़ा।

बिहार कांग्रेस और उसके अन्य पिछड़ा वर्ग विभाग की भागीदारी भी इसी संदर्भ में देखी जानी चाहिए। बिहार की राजनीति में सामाजिक न्याय, पिछड़े वर्गों का प्रतिनिधित्व और सत्ता में हिस्सेदारी लंबे समय से केंद्रीय मुद्दे रहे हैं। इसलिए राष्ट्रीय मंच पर उठाए गए मतदाता अधिकारों के सवालों को स्थानीय सामाजिक परिस्थितियों से जोड़ना प्रदेश संगठन की महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

बिहार प्रदेश कांग्रेस के अन्य पिछड़ा वर्ग विभाग की उपाध्यक्ष सोनी कुमारी, विभाग के अध्यक्ष अनुराग चंदन और मुंगेर जिला कांग्रेस कमेटी के अन्य पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ के अध्यक्ष राकेश कुमार मंडल जैसे पदाधिकारियों के सामने चुनौती है कि लोकतांत्रिक अधिकारों और सामाजिक न्याय से जुड़े प्रश्नों को गांवों, कस्बों और जिला मुख्यालयों तक पहुंचाएं। किसी राष्ट्रीय आयोजन में भागीदारी की उपयोगिता तभी बढ़ती है जब उसके बाद स्थानीय स्तर पर निरंतर काम हो।

सोनी कुमारी की भूमिका महिला प्रतिनिधित्व के प्रश्न से भी जुड़ती है। पिछड़े वर्गों की महिलाओं के सामने शिक्षा, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और राजनीतिक भागीदारी की अनेक चुनौतियां हैं। संगठन में महिलाओं की उपस्थिति तभी सार्थक होगी जब उन्हें निर्णय लेने, अभियान चलाने और नेतृत्व विकसित करने के वास्तविक अवसर मिलें। महिला प्रतिनिधित्व का अर्थ पदों की संख्या बढ़ाना भर नहीं, बल्कि अधिकार और निर्णय प्रक्रिया में हिस्सेदारी सुनिश्चित करना है।

अनुराग चंदन के नेतृत्व में विभाग के सामने सामाजिक न्याय के विषयों को व्यापक राजनीतिक कार्यक्रम से जोड़ने की जिम्मेदारी है। जातीय जनगणना, आरक्षण, शिक्षा, रोजगार और आर्थिक अवसरों की समानता पर लगातार संवाद जरूरी है। मतदाता सूची से किसी पात्र नागरिक का नाम छूटना भी राजनीतिक भागीदारी का प्रश्न है, क्योंकि मताधिकार लोकतंत्र में नागरिक की आवाज का बुनियादी माध्यम है।

इसी तरह राकेश कुमार मंडल और जिला स्तर के अन्य पदाधिकारियों की भूमिका राष्ट्रीय मुद्दों को स्थानीय जनसहायता से जोड़ने में महत्त्वपूर्ण हो सकती है। मतदाता सूची में नामों की जांच, नए मतदाताओं के पंजीकरण में सहयोग और नाम हटाए जाने संबंधी शिकायतों में सहायता जैसे काम इस अभियान को व्यावहारिक आधार दे सकते हैं।

बिहार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राजेश राम और बिहार प्रभारी कृष्णा अल्लावरू के नेतृत्व में प्रदेश संगठन के सामने संगठनात्मक विस्तार के साथ पिछड़े, अति पिछड़े, दलित, महिला और युवा वर्गों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करने की चुनौती है। गठबंधन की राजनीति के बीच कांग्रेस को अपनी संगठनात्मक पहचान और जमीनी सक्रियता भी मजबूत करनी होगी।

रामलीला मैदान की रैली में विभिन्न प्रदेशों की भागीदारी ने विपक्षी एकता का संदेश दिया। उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, जम्मू-कश्मीर और दक्षिण भारत से आए नेताओं तथा कार्यकर्ताओं की मौजूदगी ने आयोजन को राष्ट्रीय स्वरूप दिया। वामपंथी दलों की भागीदारी ने इस साझा मंच का राजनीतिक दायरा बढ़ाया।

अलग-अलग राज्यों की अपनी परिस्थितियां और चिंताएं हैं। कहीं मतदाता सूची के पुनरीक्षण पर आशंकाएं व्यक्त की जा रही हैं तो कहीं पात्र मतदाताओं के नाम हटाए जाने के आरोप हैं। विपक्ष इन चिंताओं को चुनावी पारदर्शिता और लोकतांत्रिक अधिकारों के साझा प्रश्न के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहा है।

फिर भी विपक्षी एकता की वास्तविक परीक्षा मंच साझा करने के बाद शुरू होती है। राज्यों में इन दलों के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा है। सीटों का बंटवारा, नेतृत्व और चुनावी रणनीति जैसे प्रश्न भी मौजूद हैं। इस एकजुटता को टिकाऊ बनाने के लिए केंद्र सरकार के विरोध के साथ रोजगार, महंगाई, सामाजिक न्याय और संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही पर साझा कार्यक्रम जरूरी होगा।

विपक्ष ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त के इस्तीफे की मांग उठाते हुए आयोग की कार्यप्रणाली पर प्रश्न किए। दूसरी ओर आयोग का पक्ष है कि मतदाता सूची की शुद्धता के लिए मृत, दोहरे और अपात्र मतदाताओं के नाम हटाना आवश्यक है। विवाद का मूल प्रश्न यही है कि इस प्रक्रिया में किसी पात्र नागरिक का अधिकार प्रभावित न हो।

दावों और शिकायतों का निष्पक्ष परीक्षण जरूरी है। किसी योग्य नागरिक का नाम गलती से हटने पर उसे नाम वापस जुड़वाने की सरल और सुलभ प्रक्रिया मिलनी चाहिए। राज्यवार आंकड़ों, नाम हटाने के कारणों और शिकायतों के निपटारे की जानकारी सार्वजनिक करने से विश्वास मजबूत हो सकता है। संवैधानिक संस्था की प्रतिष्ठा उसके कामकाज की पारदर्शिता और निष्पक्षता से कायम रहती है।

रैली से पहले मुख्य निर्वाचन आयुक्त के विरुद्ध आयोजित प्रतीकात्मक सार्वजनिक ‘महाभियोग’ को भी राजनीतिक विरोध की अभिव्यक्ति के रूप में देखा जाना चाहिए। उसे वास्तविक संवैधानिक कार्यवाही मानना उचित नहीं होगा। ऐसे आयोजनों का लोकतांत्रिक महत्त्व तभी बढ़ता है जब उनके साथ प्रमाण, स्पष्ट प्रश्न और समाधान की मांग भी सामने आए।

भाजपा ने विपक्ष के आरोपों को राजनीतिक दुष्प्रचार बताते हुए खारिज किया है। उसका तर्क है कि राजनीतिक असफलताओं के बाद विपक्ष संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल उठाता है। लेकिन इस टकराव का समाधान आरोप-प्रत्यारोप से आगे जाकर तथ्यों के सार्वजनिक परीक्षण और पारदर्शी निर्वाचन प्रक्रिया से ही निकलेगा।

लोकतंत्र में सरकारें बदलती हैं और राजनीतिक दलों की भूमिकाएं बदलती रहती हैं, लेकिन नागरिक के मताधिकार की रक्षा हर परिस्थिति में आवश्यक है। पात्र नागरिक का नाम मतदाता सूची में होना, निर्भय होकर मतदान का अवसर मिलना और निर्वाचन प्रक्रिया का निष्पक्ष बने रहना लोकतांत्रिक विश्वास की बुनियादी शर्तें हैं।

रामलीला मैदान से उठी आवाज का वास्तविक प्रभाव तब दिखाई देगा जब वह गांवों, कस्बों और शहरों में निरंतर जनसंवाद और नागरिक सहायता के प्रयासों में बदलेगी। रैली राजनीतिक संदेश दे सकती है, लेकिन लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए संगठनों की सक्रियता, संस्थागत पारदर्शिता और नागरिक जागरूकता का सतत प्रयास जरूरी है। मतदाता का अधिकार और सत्ता तथा संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही इस प्रयास के केंद्र में रहने चाहिए।

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Author: Bharat Sarathi

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