अमेरिकी संसद से निकली 100 प्रतिशत टैरिफ की चेतावनी, महंगे तेल ने बढ़ाई भारत की चिंता

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मूडीज़ ने भारत का वृद्धि अनुमान बढ़ाकर 7 प्रतिशत किया, लेकिन ऊर्जा कीमतें, महंगाई और अमेरिकी दबाव बन सकते हैं बड़ी चुनौती

ऊर्जा सुरक्षा, रणनीतिक स्वायत्तता और वैश्विक कूटनीतिक संतुलन की एक साथ अग्निपरीक्षा

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

वैश्विक अर्थव्यवस्था इस समय मध्य-पूर्व के संघर्ष, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर संभावित अमेरिकी कार्रवाई जैसी चुनौतियों से घिरी हुई है। भारत के लिए यह स्थिति विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश अपनी अधिकांश कच्चे तेल की जरूरत आयात से पूरी करता है।

अमेरिकी कांग्रेस ने ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट-2026’ को मंजूरी दे दी है। प्रतिनिधि सभा में यह विधेयक 262 के मुकाबले 159 मतों से पारित हुआ और अब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की स्वीकृति के लिए भेजा गया है। इसमें रूस से बड़ी मात्रा में ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार देने का प्रावधान है। भारत और चीन जैसे बड़े रूसी तेल खरीदार इसके संभावित प्रभाव क्षेत्र में आ सकते हैं। रॉयटर्स की रिपोर्ट

यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि भारत पर अभी 100 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लागू नहीं हुआ है। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद विधेयक कानून बनेगा और उसके बाद भी टैरिफ अपने आप लागू नहीं होगा। कार्रवाई राष्ट्रपति के निर्णय, निर्धारित परिस्थितियों तथा उपलब्ध छूट और अपवादों पर निर्भर करेगी। इसलिए इसे तत्काल लागू टैरिफ बताने के बजाय एक गंभीर संभावित खतरा कहना अधिक तथ्यपरक होगा।

रूसी तेल छोड़ना आसान नहीं

रूस से कच्चा तेल खरीदने का भारत का प्रमुख आधार आर्थिक और रणनीतिक रहा है। प्रतिस्पर्धी कीमत, पर्याप्त उपलब्धता और आपूर्ति स्रोतों का विविधीकरण भारतीय रिफाइनरियों के लिए महत्वपूर्ण है। यदि अमेरिकी दबाव के चलते रूसी तेल की खरीद घटानी पड़ती है तो इराक, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका, ब्राजील, नाइजीरिया और अंगोला जैसे देशों से आयात बढ़ाया जा सकता है।

लेकिन एक बड़े आपूर्तिकर्ता को अचानक बदलना आसान नहीं होता। तेल की कीमत और उपलब्धता के साथ उसकी गुणवत्ता, भारतीय रिफाइनरियों की तकनीकी जरूरत, समुद्री मालभाड़ा, बीमा तथा भुगतान व्यवस्था भी महत्वपूर्ण होती है। रूसी आपूर्ति घटने पर अन्य देशों के तेल की मांग और कीमत दोनों बढ़ सकती हैं।

भारत ने स्पष्ट किया है कि अपनी विशाल आबादी की ऊर्जा सुरक्षा उसकी प्राथमिकता है और वह बाजार की परिस्थितियों के अनुसार विभिन्न स्रोतों से तेल खरीदने की नीति जारी रखेगा। साथ ही अमेरिका के समक्ष भी भारत ने अपने आर्थिक और ऊर्जा हितों से जुड़ी चिंताएं रखी हैं। भारत के रुख पर रॉयटर्स की रिपोर्ट

महंगा तेल पूरी अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती

भारत की समस्या केवल यह तय करने तक सीमित नहीं है कि रूस से कितना तेल खरीदा जाए। यदि मध्य-पूर्व में संघर्ष लंबा चलता है और वैश्विक आपूर्ति बाधित होती है तो रूसी तथा गैर-रूसी—दोनों प्रकार का कच्चा तेल महंगा हो सकता है।

कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से भारत का आयात बिल बढ़ता है और रुपये पर दबाव पड़ सकता है। इसका प्रभाव पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस, परिवहन, विमानन, उर्वरक, रसायन और प्लास्टिक उद्योग तक पहुंचता है। माल ढुलाई महंगी होने पर खाद्य एवं उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें भी बढ़ सकती हैं। इस प्रकार तेल संकट केवल पेट्रोलियम क्षेत्र का विषय नहीं, बल्कि महंगाई, राजकोषीय संतुलन और आम नागरिक की क्रय शक्ति से जुड़ा प्रश्न है।

मूडीज़ का अनुमान राहत, चेतावनी भी साथ

चुनौतियों के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए राहत की खबर यह है कि मूडीज़ ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि का अनुमान 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 7 प्रतिशत कर दिया है। मजबूत घरेलू मांग, निवेश और अब तक दिखाई गई आर्थिक मजबूती को इसका आधार माना गया है।

मूडीज़ ने साथ ही चेताया है कि लंबे समय तक ऊंची ऊर्जा कीमतें और अल नीनो से जुड़ी खाद्य महंगाई विकास की गति को प्रभावित कर सकती हैं। महंगा तेल सरकारी सब्सिडी, चालू खाते के घाटे और निजी उपभोग पर भी दबाव बढ़ा सकता है। यानी 7 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान भारत की आंतरिक मजबूती का संकेत है, लेकिन यह बाहरी जोखिमों से पूरी तरह सुरक्षित होने की गारंटी नहीं है। मूडीज़ के अनुमान पर रॉयटर्स की रिपोर्ट

आरबीआई के कदम का क्या अर्थ?

बैंकिंग प्रणाली में मौजूद अतिरिक्त नकदी को नियंत्रित करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने सितंबर में एक लाख करोड़ रुपये की सरकारी प्रतिभूतियां तीन चरणों में बेचने की घोषणा की। इसे खुले बाजार की बिक्री अर्थात ओपन मार्केट ऑपरेशन कहा जाता है।

जब आरबीआई सरकारी प्रतिभूतियां बेचता है तो बैंकिंग व्यवस्था से अतिरिक्त नकदी बाहर आती है। इसका अर्थ यह नहीं है कि आम ग्राहकों के बैंक खातों से पैसा निकाला जा रहा है या उनकी जमा राशि पर कोई सीधा खतरा है। इसका प्रभाव मुख्यतः बाजार की नकदी, सरकारी बॉन्ड की प्रतिफल दर और आगे चलकर ऋण तथा जमा दरों पर पड़ सकता है। केवल इस कार्रवाई से किसी मौजूदा ऋण की ईएमआई तत्काल बढ़ना आवश्यक नहीं है।

भारत के सामने संतुलन की चुनौती

भारत के सामने एक ओर अमेरिका के साथ महत्वपूर्ण व्यापारिक संबंध हैं तो दूसरी ओर रूस से प्रतिस्पर्धी दरों पर मिलने वाली ऊर्जा आपूर्ति है। इसके साथ मध्य-पूर्व का संकट और घरेलू आर्थिक वृद्धि बनाए रखने की आवश्यकता भी जुड़ी हुई है।

इसका व्यावहारिक समाधान किसी एक देश पर निर्भरता बढ़ाने में नहीं, बल्कि तेल स्रोतों, व्यापारिक साझेदारों और भुगतान व्यवस्थाओं के निरंतर विविधीकरण में है। रूस के साथ पश्चिम एशिया, अमेरिका, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के आपूर्तिकर्ताओं के बीच संतुलन बनाना होगा।

दीर्घकाल में घरेलू तेल एवं गैस उत्पादन, नवीकरणीय ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहनों, ऊर्जा दक्षता और रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का विस्तार आयात संबंधी जोखिम घटा सकता है।

निष्कर्ष

यह संकट केवल अमेरिका बनाम रूस अथवा तेल बनाम टैरिफ का मामला नहीं है। यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा, रणनीतिक स्वायत्तता, महंगाई नियंत्रण, आर्थिक विकास और वैश्विक कूटनीतिक संतुलन—सभी की एक साथ परीक्षा है।

फिलहाल भारत पर 100 प्रतिशत अमेरिकी टैरिफ लागू नहीं हुआ है, लेकिन अमेरिकी विधेयक ने ऐसी कार्रवाई की संभावना अवश्य पैदा कर दी है। आगे की तस्वीर राष्ट्रपति ट्रंप के निर्णय, भारत-अमेरिका वार्ता, रूस से भारतीय तेल खरीद और अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों पर निर्भर करेगी।

मूडीज़ का 7 प्रतिशत वृद्धि अनुमान भारत की आर्थिक ताकत का संकेत है, लेकिन महंगा तेल उस मजबूती की कठिन परीक्षा ले सकता है। भारत इस संकट को कितनी कुशलता से संभालता है, वही तय करेगा कि यह विकास यात्रा में बाधा बनता है या ऊर्जा रणनीति को अधिक विविध और आत्मनिर्भर बनाने का अवसर।

-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र

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Author: Bharat Sarathi

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