जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों ने खूब जलाए ‘आशीर्वाद के दीये’; जनता पूछ रही—इस रोशनी से हमारी समस्याएं कब होंगी दूर?

गुरुग्राम, 18 सितम्बर। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर शुरू किए गए ‘सेवा संकल्प अभियान’ के अंतर्गत गुरुग्राम में ‘आशीर्वाद का दीया’ कार्यक्रम व्यापक सरकारी स्तर पर आयोजित किया गया। जिला प्रशासन ने मातृ वन, लघु सचिवालय, शीतला माता मंदिर, रेलवे स्टेशन, स्टेडियमों, उपमंडल कार्यालयों और अन्य सरकारी भवनों सहित अनेक स्थानों पर लाखों दीये प्रज्ज्वलित किए जाने का दावा किया है।
कार्यक्रम में मंत्री, विधायक, भाजपा नेता, प्रशासनिक अधिकारी और विभिन्न सरकारी संस्थानों के प्रतिनिधि सक्रिय दिखाई दिए। हालांकि आम जनता ने अपनी ओर से कितने दीये जलाए और अभियान में उसकी वास्तविक भागीदारी कितनी रही, इसका कोई अलग आंकड़ा प्रशासन की ओर से जारी नहीं किया गया।
लाखों दीये आए कहां से, खर्च किसने उठाया?

इस विशाल आयोजन के बाद कई महत्वपूर्ण सवाल भी सामने आ रहे हैं। लाखों दीयों की खरीद किस विभाग अथवा संस्था ने की? दीये, तेल, बाती, रंगोली, सजावट और दूसरी व्यवस्थाओं पर कितनी राशि खर्च हुई? इसका भुगतान सरकारी बजट से किया गया या किसी संस्था और सामाजिक संगठन ने खर्च उठाया?
प्रशासन की ओर से जारी जानकारी में कार्यक्रम स्थलों और उपस्थित जनप्रतिनिधियों का विस्तार से उल्लेख है, लेकिन आयोजन की कुल लागत, दीयों की वास्तविक संख्या और भुगतान के स्रोत की जानकारी नहीं दी गई। यह भी स्पष्ट नहीं है कि आयोजन में कितने सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों की ड्यूटी लगाई गई थी।
जनता की परेशानियों पर कब पड़ेगा प्रकाश?

गुरुग्राम की पहचान भले ही मिलेनियम सिटी के रूप में हो, लेकिन यहां के नागरिक आज भी टूटी सड़कों, जलभराव, कूड़े के ढेर, खराब स्ट्रीट लाइटों, सीवर समस्या, यातायात जाम, प्रदूषण और सरकारी कार्यालयों में सुनवाई नहीं होने जैसी परेशानियों से जूझ रहे हैं।
ऐसे में लोगों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि सरकारी भवनों और सार्वजनिक स्थलों पर जलाए गए लाखों ‘आशीर्वाद के दीये’ क्या उनकी रोजमर्रा की समस्याओं को दूर करने के किसी ठोस संकल्प की शुरुआत भी बनेंगे?
जनता से अधिक सरकारी तंत्र की सक्रियता

कार्यक्रम की तस्वीरों में मंत्री, विधायक, अधिकारी और राजनीतिक प्रतिनिधि प्रमुखता से दीये जलाते दिखाई दिए। जनता की स्वैच्छिक भागीदारी कितनी थी, इसका कोई प्रामाणिक विवरण सामने नहीं आया। इससे यह सवाल भी उठता है कि यह वास्तव में जनभागीदारी का अभियान था अथवा सरकारी तंत्र द्वारा संचालित औपचारिक आयोजन।
दीया भारतीय संस्कृति में आशा, विश्वास और सकारात्मकता का प्रतीक है। ऐसे सांस्कृतिक आयोजनों का अपना महत्व है, लेकिन जब इनका आयोजन सरकारी स्तर पर किया जाए तो खर्च और संसाधनों की जानकारी सार्वजनिक करना भी आवश्यक है।
समय बताएगा कितना सार्थक हुआ ‘आशीर्वाद’
जनप्रतिनिधियों और सरकार के प्रतिनिधियों ने पूरे उत्साह के साथ आशीर्वाद के दीये जलाए हैं। अब आने वाला समय ही बताएगा कि इन दीयों की रोशनी से जनता के कष्ट और परेशानियां कितनी दूर होती हैं।
यदि इस अभियान के बाद सड़कों, सफाई, सीवर, स्ट्रीट लाइट, सुरक्षा और नागरिक सुविधाओं में सुधार दिखाई देता है तो इसे सही अर्थों में ‘सेवा संकल्प’ कहा जा सकेगा। अन्यथा लाखों दीयों की रोशनी कुछ घंटों तक सरकारी भवनों को तो जगमगा देगी, लेकिन आम नागरिक के जीवन का अंधेरा जस का तस रह जाएगा।







