ब्रिक्स सम्मेलन ने भारत की कूटनीतिक क्षमता दिखाई, लेकिन घोषणाओं को ठोस उपलब्धियों में बदलना अभी बाकी
डॉ घनश्याम बादल

नई दिल्ली में दो दिनों तक दुनिया की निगाहें टिकी रहीं। 21 देशों के ब्रिक्स परिवार के नेताओं की मौजूदगी में 18वां शिखर सम्मेलन संपन्न हुआ। मंच पर मुस्कुराते चेहरे, हाथ मिलाते नेता और बहुपक्षीय सहयोग के बड़े संकल्प दिखाई दिए। लेकिन किसी शिखर सम्मेलन की सफलता का वास्तविक पैमाना तस्वीरें नहीं, उसके बाद बदलने वाले वैश्विक समीकरण होते हैं।
अब असली सवाल यह है कि भारत ने ब्रिक्स की अध्यक्षता से क्या हासिल किया, संगठन अपने उद्देश्यों की ओर कितना आगे बढ़ा और नई दिल्ली से निकली कूटनीतिक ऊर्जा बीजिंग, मास्को, पश्चिम एशिया तथा अमेरिका तक कितना प्रभाव डालेगी?
संतुलित कूटनीति की सफलता
भारत के लिए इस सम्मेलन को सफल मानने के पर्याप्त कारण हैं। दुनिया इस समय युद्धों, व्यापारिक प्रतिबंधों, बढ़ते संरक्षणवाद, ऊर्जा संकट और महाशक्तियों के टकराव से गुजर रही है। ऐसे वातावरण में रूस, चीन और भारत जैसे अलग-अलग हितों वाले देशों के साथ ईरान तथा संयुक्त अरब अमीरात जैसे भिन्न क्षेत्रीय समीकरण रखने वाले राष्ट्रों को साझा दस्तावेज पर सहमत करना भारत की कूटनीतिक क्षमता का प्रमाण है।
भारत ने ब्रिक्स को खुले तौर पर पश्चिम-विरोधी गठबंधन बनने से भी रोका। नई दिल्ली घोषणा में एकध्रुवीयता के स्थान पर बहुध्रुवीयता, वैश्विक संस्थाओं में सुधार और विकासशील देशों की अधिक भागीदारी की बात कही गई, लेकिन ब्रिक्स को नाटो जैसे राजनीतिक अथवा सैन्य गुट में बदलने की दिशा नहीं अपनाई गई। यह भारत की बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि मानी जा सकती है।
सुरक्षा परिषद की दावेदारी को बल
भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सहित वैश्विक संस्थाओं में सुधार का मुद्दा भी मजबूती से उठाया। घोषणा में चीन और रूस ने भारत तथा ब्राजील की संयुक्त राष्ट्र में अधिक बड़ी भूमिका के प्रति समर्थन दोहराया, जिसमें सुरक्षा परिषद भी शामिल है।
सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता भारत की विदेश नीति का पुराना लक्ष्य है। ब्रिक्स जैसे प्रभावशाली मंच पर चीन और रूस का सार्वजनिक समर्थन भारत की कूटनीतिक पूंजी बढ़ाता है। हालांकि समर्थन के शब्दों को वास्तविक सदस्यता में बदलने का रास्ता अभी लंबा और जटिल है।
इरादे बड़े, औजार सीमित
ब्रिक्स ने वैश्विक व्यवस्था बदलने की इच्छा तो जताई है, लेकिन उसे बदलने के औजार अभी सीमित हैं। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था और डॉलर पर निर्भरता घटाने की चर्चा वर्षों से चल रही है। इस सम्मेलन में भी आर्थिक और वित्तीय सहयोग पर जोर दिया गया, परंतु कोई ऐसी क्रांतिकारी व्यवस्था सामने नहीं आई जो वैश्विक वित्तीय ढांचे को तुरंत बदल सके।
भारत के लिए अतिरंजित ‘डॉलर-मुक्त व्यवस्था’ से दूरी बनाए रखना ही व्यावहारिक है। अमेरिका आज भी उसका महत्वपूर्ण व्यापारिक, तकनीकी और रणनीतिक साझेदार है। इसलिए आर्थिक विकल्पों की तलाश और पश्चिमी देशों से सहयोग के बीच संतुलन जरूरी है।
अंतर्विरोध ब्रिक्स की बड़ी चुनौती
ब्रिक्स की सबसे बड़ी चुनौती उसके आंतरिक अंतर्विरोध हैं। भारत और चीन का सीमा विवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। रूस पश्चिमी देशों से टकराव की स्थिति में है, जबकि ईरान और अमेरिका के बीच तनाव बना हुआ है। पश्चिम एशिया में सदस्य देशों के हित भी हमेशा एक जैसे नहीं रहते।
इन परिस्थितियों में सर्वसम्मति से साझा बयान जारी करना निश्चित रूप से उपलब्धि है, लेकिन साझा और प्रभावी नीति बनाना उससे कहीं अधिक कठिन होगा।
भारत-चीन रिश्तों में खुली खिड़की
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात ने भारत-चीन संबंधों में संभावित नरमी की खिड़की खोली है। दोनों पक्षों ने सीमा पर शांति, व्यापार, बाजार तक पहुंच और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने की आवश्यकता पर चर्चा की।
सात वर्ष बाद हुआ यह उच्चस्तरीय संपर्क महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे संबंधों का पूर्ण ‘पुनर्निर्धारण’ कहना जल्दबाजी होगी। सीमा विवाद, व्यापार असंतुलन और रणनीतिक अविश्वास अब भी कायम हैं। चीन वर्ष 2027 में ब्रिक्स की अध्यक्षता करेगा। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि वह भारत द्वारा तय की गई दिशा को किस रूप में आगे बढ़ाता है।
रूस और पश्चिम एशिया में बढ़ी गुंजाइश
रूस के संदर्भ में भी भारत को इस सम्मेलन से लाभ मिला है। यूक्रेन युद्ध और पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद भारत ने मास्को के साथ अपने संबंध बनाए रखे हैं। ब्रिक्स ने रूस को पश्चिमी दबाव के बीच वैकल्पिक वैश्विक साझेदारियां तलाशने का मंच दिया।
भारत के लिए इसका अर्थ है कि वह रूस के साथ ऊर्जा, रक्षा और रणनीतिक संबंध कायम रखते हुए अमेरिका तथा यूरोप के साथ साझेदारी भी जारी रख सकता है।
पश्चिम एशिया में भारत की भूमिका भी मजबूत हुई है। ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, मिस्र और सऊदी अरब जैसे देशों की भागीदारी भारत को ऐसे मंच पर महत्वपूर्ण स्थान देती है, जहां उसके ऊर्जा, व्यापार और प्रवासी भारतीयों से जुड़े हित सीधे प्रभावित होते हैं। ब्रिक्स यदि संवाद का प्रभावी मंच बनता है तो भारत अपनी परंपरागत ‘सबके साथ संबंध’ की नीति को अधिक उपयोगी बना सकता है।
अमेरिका से संतुलन जरूरी
ब्रिक्स ने एकतरफा प्रतिबंधों और संरक्षणवादी व्यापारिक उपायों की आलोचना की है। इससे अमेरिका और पश्चिमी देशों में कुछ असहजता स्वाभाविक है। इसके बावजूद भारत ने संगठन को अमेरिकी-विरोधी मंच नहीं बनने दिया।
यही संतुलन आगे भी भारत के लिए आवश्यक रहेगा। भारत अमेरिका से तकनीक, निवेश और रणनीतिक सहयोग चाहता है। वहीं रूस से रक्षा एवं ऊर्जा संबंधों तथा चीन से आर्थिक संपर्क को पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकता। इसीलिए उसकी विदेश नीति का मूलमंत्र स्पष्ट है—राष्ट्रीय हितों के आधार पर सभी प्रमुख शक्तियों के साथ संतुलित संबंध।
सवाल भी जायज, सफलता भी महत्वपूर्ण
विपक्ष ने सरकार से पूछा है कि इस सम्मेलन से देश को ठोस लाभ क्या मिला। लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह सवाल उचित है। सरकार को बताना चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन को आर्थिक, रणनीतिक और राष्ट्रीय हितों की वास्तविक उपलब्धियों में कैसे बदला जाएगा।
दूसरी ओर, केवल इस आधार पर सम्मेलन को असफल नहीं कहा जा सकता कि तत्काल कोई बहुत बड़ा आर्थिक समझौता सामने नहीं आया। कूटनीति में कई उपलब्धियां समझौतों से पहले वातावरण, सहमति और संभावनाओं के रूप में सामने आती हैं।
भारत ने बहुध्रुवीय विश्व, वैश्विक दक्षिण की आवाज, संस्थागत सुधार, आर्थिक सहयोग और विकासशील देशों के हितों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण राजनीतिक सफलता अर्जित की है। मगर इन उद्देश्यों को स्थायी उपलब्धियों में बदलने की यात्रा अभी शुरू हुई है।







