युवा पीढ़ी पर कोकीन का साया

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हिसार का मामला समाज, परिवार और शिक्षण संस्थानों के लिए गंभीर चेतावनी

—सुरेश गोयल ‘धूप वाला’
पूर्व जिला महामंत्री, भाजपा, हिसार

हिसार में सामने आया कोकीन तस्करी का ताजा मामला केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि समाज, परिवार और शिक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी है। समाचारों के अनुसार, एक पीजी में रहने वाली युवती पर लगभग 11 महीने से विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों को निशाना बनाकर कोकीन की आपूर्ति करने का आरोप है। यह मामला संकेत देता है कि नशे का कारोबार अब सुनियोजित तरीके से उन युवाओं तक पहुंचने का प्रयास कर रहा है, जिनके हाथों में देश का भविष्य माना जाता है।

कुछ वर्ष पहले तक ‘चिट्टा’ जैसे घातक नशे ने अनेक परिवारों की खुशियां छीन ली थीं। अब उससे भी अधिक महंगे और खतरनाक माने जाने वाले कोकीन जैसे मादक पदार्थ का विद्यार्थियों तक पहुंचना अत्यंत चिंताजनक है। यदि विश्वविद्यालय और महाविद्यालय—जो ज्ञान, संस्कार और व्यक्तित्व निर्माण के केंद्र हैं—नशा तस्करों के निशाने पर आने लगें तो यह केवल कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चिंता का विषय है।

माता-पिता के सपनों पर आघात

हर माता-पिता अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाने के लिए अनेक त्याग करते हैं। वे अपनी जरूरतों में कटौती करके उनकी पढ़ाई का खर्च उठाते हैं। उनकी आशा होती है कि बेटा या बेटी पढ़-लिखकर जीवन में आगे बढ़ेगा, परिवार का नाम रोशन करेगा और राष्ट्र निर्माण में योगदान देगा।

ऐसे में यदि कोई विद्यार्थी नशे की गिरफ्त में चला जाए तो यह केवल उस परिवार का नहीं, बल्कि पूरे समाज का दुःख है। माता-पिता के वर्षों के परिश्रम, सपने और विश्वास एक ही झटके में टूट सकते हैं।

शरीर ही नहीं, भविष्य भी नष्ट करता है नशा

नशा केवल शरीर को नुकसान नहीं पहुंचाता, बल्कि व्यक्ति की सोच, चरित्र, शिक्षा, स्वास्थ्य और भविष्य को भी नष्ट कर देता है। इसकी गिरफ्त में आया युवा धीरे-धीरे परिवार से दूर होने लगता है। वह अपराध की ओर बढ़ सकता है और आर्थिक रूप से भी बर्बाद हो सकता है।

नशे के कारण अनेक प्रतिभाशाली विद्यार्थी पढ़ाई अधूरी छोड़ देते हैं। कुछ मानसिक तनाव, अवसाद और दूसरी गंभीर समस्याओं का सामना करने लगते हैं। इस प्रकार नशा एक व्यक्ति के साथ पूरे परिवार और सामाजिक परिवेश को प्रभावित करता है।

तस्करों का लक्ष्य—युवाओं को स्थायी ग्राहक बनाना

यह समझना आवश्यक है कि नशा तस्कर किसी के मित्र नहीं होते। उनका उद्देश्य केवल अधिक से अधिक धन कमाना होता है। वे पहले युवाओं को आकर्षित करते हैं और फिर उन्हें नशे की लत लगाकर अपना स्थायी ग्राहक बना लेते हैं।

आज सोशल मीडिया, निजी आवास, पीजी और किराये के फ्लैट जैसे माध्यमों का दुरुपयोग कर तस्कर युवाओं तक पहुंचने का प्रयास कर रहे हैं। इसलिए केवल पुलिस कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। समाज की जागरूकता और सतर्कता भी उतनी ही आवश्यक है।

शिक्षण संस्थानों में बने गोपनीय शिकायत तंत्र

इस चुनौती से निपटने के लिए बहुआयामी प्रयास करने होंगे। पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों को नशा तस्करी के नेटवर्क के विरुद्ध कठोर एवं निरंतर अभियान चलाना चाहिए। विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में समय-समय पर नशा विरोधी जागरूकता कार्यक्रम तथा परामर्श सत्र आयोजित किए जाने चाहिए।

विद्यार्थियों के लिए सुरक्षित और गोपनीय शिकायत व्यवस्था भी विकसित होनी चाहिए। छात्रावास एवं पीजी संचालकों को कानूनी दायरे में सतर्कता बरतते हुए किसी भी संदिग्ध गतिविधि की सूचना तत्काल प्रशासन को देनी चाहिए।

बच्चों से नियमित संवाद रखें अभिभावक

परिवारों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। माता-पिता को अपनी जिम्मेदारी केवल बच्चों की आर्थिक आवश्यकताएं पूरी करने तक सीमित नहीं रखनी चाहिए। उन्हें बच्चों से नियमित संवाद बनाए रखने के साथ उनकी दिनचर्या, व्यवहार, मित्रों और मानसिक स्थिति के प्रति भी संवेदनशील रहना चाहिए।

विश्वास और संवाद से भरपूर पारिवारिक वातावरण युवाओं को गलत रास्ते पर जाने से रोक सकता है। व्यवहार में अचानक बदलाव दिखाई देने पर डांटने या आरोप लगाने के बजाय संवेदनशीलता से कारण जानने का प्रयास करना चाहिए।

नशे से युवाओं को बचाना साझा दायित्व

युवा शक्ति किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी होती है। यदि यही शक्ति नशे के दलदल में फंसने लगे तो देश के विकास की गति प्रभावित होना स्वाभाविक है। इसलिए आवश्यकता केवल अपराधियों को पकड़ने की नहीं, बल्कि ऐसा सामाजिक वातावरण बनाने की भी है, जिसमें युवा नशे से दूर रहकर शिक्षा, संस्कार, खेल, नवाचार और राष्ट्र निर्माण की दिशा में आगे बढ़ें।

हिसार की घटना हम सभी के लिए चेतावनी है। सरकार, प्रशासन, शिक्षण संस्थान, अभिभावक और समाज समय रहते मिलकर ठोस कदम उठाएं तो आने वाली पीढ़ी को इस विनाशकारी जाल से बचाया जा सकता है। युवा पीढ़ी को नशे से बचाना केवल कानून का विषय नहीं, बल्कि पूरे समाज का साझा दायित्व है।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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