सत्ता और विपक्ष की लड़ाई में कहीं पीछे तो नहीं छूट गए हरियाणा के असली सवाल?
ऋषिप्रकाश कौशिक
हरियाणा विधानसभा का मानसून सत्र समाप्त हो गया। सरकार इसे सार्थक और उपयोगी सत्र बता सकती है, विपक्ष इसे अपनी आवाज दबाने और लोकतांत्रिक अधिकारों पर चोट की कहानी के रूप में प्रस्तुत कर सकता है। दोनों पक्षों के पास अपने-अपने तर्क हैं। लेकिन विधानसभा न तो सरकार की है और न विपक्ष की। विधानसभा हरियाणा की पौने तीन करोड़ जनता की है। इसलिए सत्र समाप्त होने के बाद सबसे पहला और सबसे बड़ा सवाल यही पूछा जाना चाहिए—हरियाणा की जनता को इस सत्र से आखिर मिला क्या?
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि विधानसभा की प्रत्येक बैठक जनता के पैसे से चलती है। भवन से लेकर कर्मचारियों, सुरक्षा, अधिकारियों की मौजूदगी, विधायकों के वेतन-भत्तों और पूरी प्रशासनिक व्यवस्था तक का खर्च अंततः प्रदेश का करदाता उठाता है। जनता यह खर्च इसलिए नहीं करती कि उसके निर्वाचित प्रतिनिधि केवल एक-दूसरे पर राजनीतिक बढ़त बनाने में समय बिताएं। वह यह खर्च इसलिए करती है कि उसके जीवन से जुड़े सवाल सदन में उठें, सरकार जवाब दे और समाधान की दिशा निकले।
इस मानसून सत्र में विधायी काम अवश्य हुआ। कई महत्वपूर्ण विधेयक सदन से पारित हुए। अल्पसंख्यक आयोग, महिला आयोग, पंचायती राज, स्थानीय लेखा-परीक्षा, निजी विश्वविद्यालय, जीएसटी, व्यापार के अधिकार और स्थानीय निकायों से जुड़े विषय सदन के सामने आए। इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि सत्र में कोई काम ही नहीं हुआ।
लेकिन लोकतंत्र में केवल विधेयकों की संख्या ही किसी विधानसभा सत्र की सफलता का पैमाना नहीं होती। असली पैमाना यह है कि प्रदेश की तत्काल समस्याओं पर कितनी गंभीर चर्चा हुई, सरकार से कितनी जवाबदेही तय हुई और आम नागरिक को कितनी राहत का रास्ता मिला।
मुद्दे बहुत थे, समय कितना मिला?
सत्र शुरू हुआ तो हरियाणा के सामने मुद्दों की कमी नहीं थी। बेरोजगारी और सरकारी भर्तियों से लेकर हरियाणा कौशल रोजगार निगम तक सवाल थे। शहरों में सफाई कर्मचारियों की लंबी हड़ताल और कूड़े के ढेर चिंता बने हुए थे। कानून-व्यवस्था, नशा, सरकारी स्कूलों में शिक्षकों के पद, स्थानीय निकायों की बदहाली, जलभराव, कर्मचारियों की मांगें और गिरता भूजल—ये सभी सीधे जनता के जीवन से जुड़े प्रश्न थे।
इन मुद्दों पर सवाल उठे भी। सफाई कर्मचारियों के मामले में मुख्यमंत्री ने सदन में कहा कि उनकी 12 मांगें स्वीकार की जा चुकी हैं और कुछ मामलों में न्यायालय के निर्णय के अनुसार आगे बढ़ा जाएगा। लेकिन प्रश्न यह है कि सदन की ऊर्जा का कितना हिस्सा ऐसे जनहित के विषयों पर केंद्रित रह सका और कितना हिस्सा राजनीतिक टकराव में चला गया?
यही इस सत्र के मूल्यांकन की सबसे महत्वपूर्ण कसौटी होनी चाहिए।
पहले दिन से ही टकराव
मानसून सत्र की शुरुआत जिस राजनीतिक तनाव के बीच हुई, उसने आगे की दिशा काफी हद तक तय कर दी। विधानसभा परिसर से लेकर सदन के भीतर तक सत्ता और विपक्ष आमने-सामने दिखाई दिए। कांग्रेस विधायकों के निलंबन, मार्शलों की कार्रवाई, विधानसभा अध्यक्ष को लेकर आरोप-प्रत्यारोप और बाद में विशेषाधिकार के मामलों ने राजनीतिक तापमान बढ़ाए रखा।
सरकार का पक्ष है कि सदन की मर्यादा और नियमों का पालन हर सदस्य की जिम्मेदारी है। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने सत्र के बाद भी कहा कि विपक्ष लोकतंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन विरोध के साथ मर्यादा और जिम्मेदारी भी आवश्यक है।
विपक्ष की शिकायत इसके ठीक विपरीत रही। उसका आरोप है कि उसे अपनी बात प्रभावी ढंग से रखने नहीं दी गई और विरोध की आवाज को अनुशासन के नाम पर सीमित किया गया।
इन दोनों दावों के बीच अंतिम निर्णय जनता को करना है। परंतु एक बात निर्विवाद होनी चाहिए—जब सदन का समय यह तय करने में अधिक लगने लगे कि किसने किससे क्या कहा, किसे बाहर निकाला जाए और किसके विरुद्ध विशेषाधिकार की कार्रवाई हो, तब बेरोजगार युवक, परेशान किसान, हड़ताली कर्मचारी और नागरिक सुविधाओं से जूझ रहा आम आदमी स्वाभाविक रूप से पीछे छूटने लगता है।
सत्ता को भी विपक्ष चाहिए
जीवंत लोकतंत्र केवल मजबूत सरकार से नहीं बनता। उसके लिए मजबूत, मुखर और जिम्मेदार विपक्ष भी उतना ही आवश्यक है।
विपक्ष का काम सरकार को अस्थिर करना भर नहीं है; उसका काम सरकार से जनता के सवालों का जवाब मांगना है। उसी तरह सत्ता पक्ष का काम अपने संख्याबल के आधार पर विपक्ष की आवाज को महत्वहीन मानना नहीं, बल्कि उसके सवालों का उत्तर देना है।
सदन में असहमति होगी। तीखी बहस भी होगी। आरोप लगेंगे और सरकार अपना बचाव भी करेगी। यही लोकतंत्र है। लेकिन जिस क्षण बहस संवाद से हटकर प्रतिष्ठा की लड़ाई बन जाती है, नुकसान दोनों राजनीतिक पक्षों का कम और जनता का अधिक होता है।
विधानसभा अखाड़ा नहीं है जिसमें शाम को तय किया जाए कि सत्ता पक्ष जीता या विपक्ष। यह प्रदेश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक पंचायत है, जहां अंत में जीत हरियाणा की होनी चाहिए।
विधेयक पास होना ही पर्याप्त नहीं
सरकार ने सत्र के अंत में कहा कि सदन में रखे गए 15 विधेयकों पर चर्चा हुई और वे पारित हुए। यह निश्चित रूप से विधायी उपलब्धि है। लेकिन जनता का सवाल इससे एक कदम आगे जाता है।
किस विधेयक से उसके जीवन में क्या बदलाव आएगा?
नगरपालिका कानून में बदलाव से शहर कितने बेहतर होंगे? पंचायती राज संशोधन से गांवों को क्या लाभ मिलेगा? स्थानीय लेखा-परीक्षा की व्यवस्था सरकारी धन की जवाबदेही कितनी बढ़ाएगी? व्यापार का अधिकार देने वाला कानून छोटे व्यापारी और उद्यमी के लिए वास्तव में कितनी आसानी पैदा करेगा?
विधानसभा की उपलब्धि तभी पूरी मानी जाएगी जब पारित कानून सरकारी प्रेस विज्ञप्तियों से निकलकर नागरिक के जीवन तक पहुंचें।
खर्च जनता का, जवाबदेही भी जनता के प्रति
हम अक्सर संसद या विधानसभा में हुए हंगामे को राजनीतिक समाचार की तरह देखते हैं। तस्वीरें आती हैं, बयान चलते हैं और अगले दिन नई राजनीतिक लड़ाई शुरू हो जाती है। लेकिन इसके आर्थिक और लोकतांत्रिक पक्ष को भूल जाते हैं।
विधानसभा का एक-एक मिनट सार्वजनिक धन से चलता है।
इसलिए सदन का समय केवल राजनीतिक दलों की संपत्ति नहीं है। उस समय पर प्रदेश के किसान का अधिकार है, बेरोजगार युवक का अधिकार है, व्यापारी का अधिकार है, कर्मचारी का अधिकार है और टैक्स देने वाले प्रत्येक नागरिक का अधिकार है।
यदि बहस के बाद कोई नीति बेहतर बनती है तो सदन पर हुआ खर्च लोकतंत्र में निवेश है। यदि सरकार को जवाब देना पड़ता है तो यह खर्च सार्थक है। यदि विपक्ष किसी गलत निर्णय को बदलवा देता है तो यह भी जनता की जीत है।
लेकिन यदि बहुमूल्य समय केवल नारे, निलंबन, व्यक्तिगत टिप्पणियों और राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई में निकल जाए तो जनता को पूछने का पूरा अधिकार है—हमारे पैसे और हमारे समय के बदले हमें मिला क्या?
प्रश्न सरकार से भी, विपक्ष से भी
इस सवाल का जवाब केवल सरकार से मांगना भी उचित नहीं होगा।
सरकार से पूछा जाना चाहिए कि क्या उसने विपक्ष को जनहित के प्रत्येक महत्वपूर्ण विषय पर पर्याप्त चर्चा का अवसर दिया? क्या गंभीर सवालों के स्पष्ट और आंकड़ों सहित उत्तर आए? क्या सदन से ऐसी ठोस घोषणाएं निकलीं जिनसे आम आदमी को राहत मिलने वाली है?
लेकिन विपक्ष से भी पूछा जाना चाहिए कि क्या उसने उपलब्ध संसदीय समय का अधिकतम उपयोग जनता के प्रश्नों के लिए किया? क्या रणनीति ऐसी नहीं हो सकती थी कि विरोध भी दर्ज हो और बेरोजगारी, अपराध, शिक्षा, सफाई, कर्मचारियों तथा किसानों के सवाल भी पूरी ताकत से सरकारी रिकॉर्ड पर दर्ज कराए जाएं?
लोकतंत्र में केवल सत्ता जवाबदेह नहीं होती। विपक्ष भी जनता के प्रति जवाबदेह है।
लोकतंत्र में शोर नहीं, सवाल याद रहने चाहिए
एक अच्छे विधानसभा सत्र की पहचान यह नहीं होनी चाहिए कि उसमें कितना हंगामा हुआ। उसकी पहचान यह होनी चाहिए कि कितने कठिन सवाल पूछे गए और कितने संतोषजनक उत्तर मिले।
जनता को यह पता होना चाहिए कि उसके विधायक ने उसके क्षेत्र का कौन-सा प्रश्न उठाया। सरकार ने उस पर क्या जवाब दिया। कितना पैसा मंजूर हुआ। काम कब तक पूरा होगा। अगली बार सदन बैठे तो पुराने आश्वासनों का हिसाब भी मांगा जाए।
यही लोकतंत्र को जीवंत बनाता है।
सत्ता पक्ष को याद रखना चाहिए कि बहुमत उसे सरकार चलाने का अधिकार देता है, विपक्ष को निरर्थक बनाने का नहीं। विपक्ष को याद रखना चाहिए कि विरोध उसका अधिकार है, लेकिन जनता के सवालों को राजनीतिक प्रदर्शन के पीछे छोड़ देना उसका अधिकार नहीं।
अगला सत्र शुरू हो तो पहले यह हिसाब रखा जाए
हर विधानसभा सत्र के बाद जनता के सामने एक सरल रिपोर्ट कार्ड आना चाहिए—कितने घंटे सदन चला, कितने प्रश्नों के उत्तर मिले, कितने जनहित विषयों पर चर्चा हुई, कितने विधेयक पारित हुए, उन पर कितनी चर्चा हुई और सरकार ने कौन-कौन से समयबद्ध आश्वासन दिए।
तब नागरिक स्वयं फैसला कर सकेगा कि उसका पैसा सार्थक लोकतांत्रिक काम में लगा या राजनीतिक संघर्ष में।
हरियाणा के मानसून सत्र ने कानून बनाए, प्रश्न उठाए और राजनीतिक मतभेदों को भी सामने रखा। लेकिन उसने एक और बड़ा प्रश्न हमारे सामने छोड़ दिया है—
क्या हमारी विधानसभाएं जनता की समस्याओं के समाधान का मंच बनी रहेंगी या धीरे-धीरे सत्ता और विपक्ष के राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई का मैदान बनती जाएंगी?
लोकतंत्र में मतभेद जरूरी हैं। विपक्ष की आवाज भी जरूरी है। सरकार की स्थिरता भी जरूरी है। सदन की मर्यादा भी जरूरी है।
लेकिन इन सबसे ऊपर एक चीज है—जनता।
सत्र समाप्त होने पर यदि आम हरियाणवी को यह खोजना पड़े कि इतनी राजनीतिक हलचल के बीच उसके हिस्से में आखिर क्या आया, तो सत्ता और विपक्ष दोनों को आत्ममंथन करना चाहिए।
क्योंकि विधानसभा में अंतिम जीत भाजपा या कांग्रेस की नहीं होनी चाहिए।
अंतिम जीत हरियाणा की जनता की होनी चाहिए।







