जंतर-मंतर आंदोलन से सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंची परीक्षा, रोजगार और भविष्य की आवाज; प्राथमिकी समाप्त, लेकिन व्यवस्था की विश्वसनीयता बहाल करना अभी बाकी
कुमार कृष्णन

भारतीय राजनीति में किसी आंदोलन की ताकत केवल उसमें जुटी भीड़ से नहीं, बल्कि सत्ता और व्यवस्था पर पड़े उसके प्रभाव से तय होती है। कई बार कुछ हजार युवाओं की आवाज उन राजनीतिक दलों के शोर पर भारी पड़ जाती है, जिनके पास विशाल संगठन, संसाधन और वर्षों पुरानी चुनावी मशीनरी होती है।
जंतर-मंतर से उठा छात्र आंदोलन इसी अर्थ में महज विरोध-प्रदर्शन नहीं रहा। उसने परीक्षा व्यवस्था, प्रश्नपत्रों की चोरी, रोजगार और युवाओं के भविष्य से जुड़े सवाल सत्ता के सामने इतनी मजबूती से रखे कि सरकार को आंदोलनकारियों के साथ बातचीत करनी पड़ी और प्राथमिकी का मामला अंततः सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा।
शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को बड़ी राहत
एक सितंबर 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने इस घटनाक्रम में महत्वपूर्ण हस्तक्षेप किया। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत 20 से 25 जुलाई के बीच हुए छात्र प्रदर्शनों से संबंधित प्राथमिकी समाप्त करने का आदेश दिया।
दिल्ली पुलिस के साथ बिहार, असम, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र ने न्यायालय में आवेदन दिए थे। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि अन्य राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में भी इसी अवधि की समान घटनाओं से जुड़ी प्राथमिकी आगे नहीं बढ़ाई जाएंगी। इसके बाद अदालत ने राहत का दायरा पूरे देश तक बढ़ा दिया।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि 20 से 25 जुलाई के प्रदर्शनों की उन्हीं घटनाओं को लेकर देश के किसी हिस्से में नई प्राथमिकी दर्ज नहीं की जाएगी। हालांकि पीठ ने कहा कि यह आदेश मामले की विशेष परिस्थितियों और विद्यार्थियों के भविष्य को ध्यान में रखकर दिया गया है तथा इसे भविष्य के मामलों के लिए न्यायिक नजीर नहीं माना जाएगा।
2,873 लोगों पर अलग जांच की अनुमति
न्यायालय ने दिल्ली पुलिस को उन 2,873 व्यक्तियों के संबंध में एक समेकित प्राथमिकी आगे बढ़ाने की अनुमति दी, जिनके बारे में पुलिस ने गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि होने का दावा किया है। इसका अर्थ यह नहीं कि अदालत ने इन लोगों को दोषी घोषित कर दिया है। उनकी व्यक्तिगत भूमिका और पुलिस के आरोपों की वैधता जांच तथा न्यायिक प्रक्रिया में तय होगी।
यह अंतर महत्वपूर्ण है। लोकतांत्रिक असहमति और हिंसक या गंभीर आपराधिक गतिविधि को एक ही तराजू पर नहीं तौला जा सकता। शांतिपूर्ण ढंग से सड़क पर उतरना अपराध नहीं है, लेकिन हिंसा या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोपों की जांच भी केवल आंदोलन का हिस्सा होने के नाम पर रोकी नहीं जा सकती।
सर्वोच्च न्यायालय का आदेश इसी संवैधानिक संतुलन को रेखांकित करता है—वैध विरोध का संरक्षण भी हो और किसी व्यक्ति की कथित आपराधिक भूमिका की स्वतंत्र जांच का रास्ता भी खुला रहे।
असहमति को अपराध नहीं बनाया जा सकता
लोकतंत्र में राज्य के पास कानून-व्यवस्था बनाए रखने की शक्ति है, लेकिन यही शक्ति उसे नागरिकों की असहमति को मनमाने ढंग से अपराध में बदलने का अधिकार नहीं देती। विरोध लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी जीवनरेखा है। सत्ता से सवाल पूछने वाले नागरिकों को केवल इसलिए अपराधी नहीं बनाया जा सकता कि वे सत्ता की सुविधा के अनुसार चुप रहने को तैयार नहीं हैं।
सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को तीन प्रमुख आश्वासनों की जानकारी दी—संबंधित प्राथमिकी आगे नहीं बढ़ाई जाएंगी, उन्हीं घटनाओं पर नई प्राथमिकी दर्ज नहीं होगी और राष्ट्रीय पात्रता-सह-प्रवेश परीक्षा-स्नातक यानी नीट-यूजी 2026 से जुड़े आत्महत्या के मामलों में प्रभावित परिवारों के लिए देशव्यापी मुआवजा नीति बनाई जाएगी। सरकार को पात्र परिवारों तक मुआवजा पहुंचाने के लिए तीन महीने का समय दिया गया है।
इस घटनाक्रम को केवल कानूनी राहत के रूप में देखना भूल होगी। यह उस लोकतांत्रिक दबाव का परिणाम है, जिसमें सड़क, सरकार और न्यायपालिका—तीनों एक ही सवाल के सामने आए। सवाल था कि व्यवस्था की विफलताओं का बोझ विद्यार्थियों से उनके भविष्य की कीमत पर क्यों उठवाया जाए?
नए युवा मंच की जरूरत क्यों पड़ी?
इसी पृष्ठभूमि में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ यानी सीजेपी का प्रयोग ध्यान खींचता है। नाम राजनीतिक व्यंग्य जैसा लग सकता है, लेकिन उसके पीछे उभरती युवा बेचैनी वास्तविक है। सामाजिक माध्यमों से संगठित हुए इस समूह ने परीक्षा, रोजगार और शिक्षा व्यवस्था जैसे प्रत्यक्ष सवालों को लेकर सड़क पर उतरने का रास्ता चुना।
जून में जंतर-मंतर पर हुए उसके पहले बड़े प्रदर्शन में विद्यार्थियों, अभिभावकों और युवा पेशेवरों ने भाग लिया। आंदोलनकारी नीट, केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, संयुक्त विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षा और कर्मचारी चयन आयोग से जुड़ी कथित अनियमितताओं पर जवाबदेही की मांग कर रहे थे।
आभासी दुनिया से शुरू हुआ यह अभियान जुलाई में व्यापक आंदोलन में बदल गया। इससे पता चलता है कि सामाजिक माध्यमों की लोकप्रियता किसी ठोस जनसमस्या से जुड़ जाए तो वह सड़क की ताकत में परिवर्तित हो सकती है।
लेकिन सीजेपी से भी बड़ा सवाल यह है कि स्थापित राजनीतिक दलों के होते हुए युवाओं को अपनी आवाज उठाने के लिए नए मंच की आवश्यकता क्यों पड़ रही है?
इसका उत्तर शायद राजनीतिक दलों की प्राथमिकताओं में छिपा है। युवाओं की चिंता लंबे वैचारिक भाषणों से पहले अपने जीवन की ठोस अनिश्चितताओं से जुड़ी है—परीक्षा समय पर होगी या नहीं, प्रश्नपत्र सुरक्षित रहेगा या नहीं, परिणाम कब आएगा, भर्ती पूरी होगी या वर्षों तक विवादों और मुकदमों में अटकी रहेगी?
वर्षों की तैयारी के बाद यदि पूरी प्रक्रिया ही संदेह के घेरे में आ जाए तो युवा आखिर किस दरवाजे पर दस्तक दे?
मेहनत और व्यवस्था के बीच अविश्वास
इन सवालों का कोई एक जातीय, धार्मिक या दलगत रंग नहीं है। यही उन्हें राजनीतिक रूप से अधिक प्रभावशाली बनाता है।
राजनीतिक दल अक्सर जनता को चुनावी समीकरणों में देखते हैं, जबकि युवा व्यवस्था को अपने भविष्य के आईने में देखता है। उसके लिए निष्पक्ष परीक्षा कोई राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि जीवन का प्रश्न है। नौकरी केवल चुनावी वादा नहीं, परिवार की आर्थिक सुरक्षा और आत्मसम्मान से जुड़ी जरूरत है।
इसलिए इस आंदोलन को केवल सरकार-विरोधी आंदोलन कह देना उसके मूल चरित्र को सीमित करना होगा। यह व्यवस्था के प्रति बढ़ते उस अविश्वास की अभिव्यक्ति है, जिसमें मेहनत करने वाला युवा सबसे पहले परीक्षा और भर्ती प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने को मजबूर है।
यह संकट किसी एक परीक्षा तक सीमित भी नहीं है। प्रतियोगी परीक्षाओं में गड़बड़ी, प्रश्नपत्रों की चोरी, भर्तियों में देरी, परिणामों पर विवाद और अदालतों में लंबित मामलों ने युवाओं के मन में खतरनाक प्रश्न पैदा किया है—क्या मेहनत का परिणाम उनकी योग्यता तय करेगी या व्यवस्था की खामी?
दबाव से संवाद तक
जुलाई के आंदोलन के दौरान सरकार और सीजेपी प्रतिनिधियों के बीच कई दौर की बातचीत हुई। सरकारी प्रतिनिधियों और आंदोलनकारियों के बीच पहली औपचारिक वार्ता 20 जुलाई को हुई। इसके बाद 24 और 25 जुलाई को बातचीत आगे बढ़ी तथा आंदोलन समाप्त करने पर सहमति बनी।
मगर आश्वासनों के क्रियान्वयन, प्राथमिकी वापस लेने और मुआवजे जैसे विषय लंबित रहने पर आंदोलनकारियों ने पांच सितंबर को फिर प्रदर्शन की घोषणा की। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश और सरकार के आश्वासनों के बाद यह प्रस्तावित मार्च वापस ले लिया गया।
यह लोकतांत्रिक दबाव की दिलचस्प मिसाल है—पहले सड़क पर आंदोलन, फिर सरकार से बातचीत, उसके बाद आश्वासन लागू कराने का दबाव और अंततः न्यायपालिका के जरिए उसे संस्थागत रूप मिलना।
इसे केवल “सरकार झुक गई” कहना सतही होगा। लेकिन इतना जरूर है कि जनदबाव ने संवाद पैदा किया, संवाद से आश्वासन मिला और सर्वोच्च न्यायालय ने उन आश्वासनों को अपने आदेश में दर्ज कर कानूनी आधार प्रदान किया।
यही लोकतांत्रिक राजनीति का सार है। सत्ता सर्वशक्तिमान नहीं होती। उसके ऊपर संविधान और कानून हैं तथा उसके सामने जनता की वैध असहमति है।
राजनीतिक दलों के लिए चेतावनी
अब प्रश्न स्थापित राजनीतिक दलों से है। क्या वे युवाओं के बदलते राजनीतिक मुहावरे को समझेंगे या कुछ समय तक सामाजिक माध्यमों पर उनकी भाषा बोलकर फिर पुराने चुनावी गणित में लौट जाएंगे?
यह युवा ऊर्जा किसी एक पारंपरिक दल के साथ बंधी हुई नहीं है। उसे सत्तारूढ़ दल से शिकायत हो सकती है, लेकिन उसकी बेचैनी केवल एक सरकार तक सीमित नहीं है। वह पूरी राजनीतिक व्यवस्था से पूछ रही है कि उसके भविष्य की जिम्मेदारी कौन लेगा।
बड़ा संगठन राजनीति को स्वतः प्रभावी नहीं बनाता। संसाधन भी विश्वास की गारंटी नहीं होते। चुनाव जीतने की क्षमता और नागरिकों का भरोसा दो अलग बातें हैं। यदि युवाओं को लगने लगे कि उनके सवालों के उत्तर राजनीतिक दलों के बजाय केवल आंदोलन और अदालत से मिल सकते हैं, तो यह प्रतिनिधिक लोकतंत्र के लिए सामान्य संकेत नहीं है।
युवा आंदोलन की भी होगी परीक्षा
युवा आंदोलन के सामने भी आसान रास्ता नहीं है। विरोध को नीति में बदलना कठिन है। भीड़ को टिकाऊ संगठन में बदलना उससे अधिक कठिन और सामाजिक माध्यमों की लोकप्रियता को दीर्घकालीन राजनीतिक विश्वसनीयता में बदलना सबसे कठिन है।
व्यक्तिकेंद्रित नेतृत्व, आंतरिक पारदर्शिता, वित्तीय जवाबदेही और नीतिगत स्पष्टता के प्रश्न हर नए राजनीतिक प्रयोग का पीछा करेंगे।
सीजेपी का वास्तविक परीक्षण इसलिए सड़क के बाद शुरू होगा। क्या वह शिक्षा और रोजगार पर ठोस नीति-विमर्श खड़ा कर पाएगी? क्या वह परीक्षा सुधार का व्यावहारिक मॉडल दे सकेगी? क्या पारंपरिक दलों की आलोचना करते हुए अपने भीतर लोकतंत्र और पारदर्शिता बनाए रखेगी?
आंदोलन यदि केवल विरोध की आदत बन जाए तो अंततः वह भी उसी राजनीति का हिस्सा बन सकता है, जिसके विरुद्ध वह पैदा हुआ था।
अब सरकार की असली परीक्षा
पांच सितंबर का मार्च वापस लेना आंदोलन की कमजोरी नहीं माना जाना चाहिए। लोकतांत्रिक आंदोलन का अर्थ अनंतकाल तक सड़क पर बने रहना नहीं है। जब संस्थागत रास्ता खुलता है तो आंदोलन को विराम देना परिपक्व रणनीति हो सकती है। मगर विराम और समर्पण में अंतर होता है। सरकारी आश्वासनों के लागू होने तक लोकतांत्रिक निगरानी आवश्यक रहेगी।
प्राथमिकी का तत्काल प्रश्न सर्वोच्च न्यायालय ने सुलझा दिया है और नई प्राथमिकी दर्ज करने पर भी स्थिति स्पष्ट कर दी गई है। लेकिन मुआवजा नीति अभी बननी है, परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता बहाल करनी है और प्रश्नपत्रों की चोरी तथा भर्ती संबंधी गड़बड़ियों को रोकने के लिए भरोसेमंद प्रणाली खड़ी करनी है।
यानी आंदोलन का तत्काल विवाद भले शांत हो गया हो, उसका मूल कारण समाप्त नहीं हुआ है।
सरकार यदि केवल प्राथमिकी खत्म होने को समस्या का अंत मान लेती है तो वह आंदोलन की असली वजह नहीं समझ पाएगी। युवाओं को पुलिस मामलों से राहत के साथ ऐसी व्यवस्था चाहिए, जिसमें अगली परीक्षा से पहले प्रश्नपत्र चोरी, परिणाम अटकने अथवा भर्ती विवादों में फंसने का भय न हो।
लोकतंत्र केवल पांच वर्ष में एक बार मतदान करने का नाम नहीं है। लोकतंत्र उस बेचैनी को सुनने की प्रक्रिया है, जो दो चुनावों के बीच जन्म लेती है। लोकतंत्र असहमति को सहने की क्षमता और सत्ता से हिसाब मांगने का नागरिक अधिकार भी है।
जंतर-मंतर की यह कहानी अभी समाप्त नहीं हुई। प्राथमिकी का एक अध्याय बंद हुआ है, लेकिन परीक्षा की विश्वसनीयता, शिक्षा व्यवस्था, रोजगार और युवाओं के भविष्य का प्रश्न अब भी खुला है।
इस आंदोलन ने इतना अवश्य स्पष्ट कर दिया है कि युवा अब केवल चुनावी मौसम में दिखाई देने वाला वोट बैंक नहीं रहना चाहता। वह अपने वर्तमान का नागरिक, अपने भविष्य का दावेदार और सत्ता से जवाब मांगने का अधिकार रखने वाला लोकतांत्रिक भागीदार है।
संख्या जब सवाल में बदल जाती है तो सत्ता को जवाब देना ही पड़ता है।







