वोट देने की स्वतंत्रता के साथ अपना भविष्य चुनने की आज़ादी भी चाहता है युवा
डॉ. घनश्याम बादल

15 अगस्त 1947 को भारत ने विदेशी शासन की बेड़ियां तोड़कर स्वतंत्रता प्राप्त की थी। इस आज़ादी की कीमत किसी एक पीढ़ी ने नहीं, बल्कि कई पीढ़ियों ने चुकाई। किसी ने जेल काटी, किसी ने लाठियां खाईं, किसी ने फांसी का फंदा चूमा तो किसी ने अपना घर-परिवार तक छोड़ दिया। उस दौर में आज़ादी का अर्थ था—अपनी संप्रभुता, अपने निर्णय, अपने अधिकार और स्वाभिमान के साथ दुनिया के सामने खड़े होने की शक्ति।
लेकिन 15 अगस्त 2026 को जब भारत अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है, तब हजारों सवाल हमारे सामने खड़े हैं। क्या आज़ादी का अर्थ केवल सत्ता का हस्तांतरण था या इसके पीछे एक व्यापक सपना भी था? यदि सपना था तो वह कितना पूरा हुआ और उसके पूर्ण होने की कितनी आशा शेष है?
आज की युवा पीढ़ी ने अंग्रेजी शासन के भेदभाव, दमन और शोषण को प्रत्यक्ष रूप से नहीं देखा। इसलिए वे दृश्य उसके अनुभव का हिस्सा नहीं हैं। उसके सामने वर्तमान की चुनौतियां हैं—बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं की अनिश्चितता, पेपर लीक, भर्ती में भ्रष्टाचार, महंगी शिक्षा, डिजिटल दुनिया का दबाव, सामाजिक असमानता और अवसरों की ऐसी दौड़, जिसमें प्रतिभा से अधिक पहचान, पहुंच और पैसे की भूमिका दिखाई देती है।
युवा पूछ रहा है—क्या मुझे केवल वोट देने की आज़ादी चाहिए या अपना भविष्य चुनने की भी?
आज़ादी का अर्थ बदल गया
आज़ादी की पहली लड़ाई विदेशी शासन से मुक्ति की थी। आज की लड़ाई उन अदृश्य दीवारों से मुक्ति की है, जो युवाओं के सपनों को पूरा होने से रोकती हैं।
आज का युवा बोलने, सवाल पूछने, असहमति व्यक्त करने और अपनी प्रतिभा के अनुसार जीवन चुनने की स्वतंत्रता चाहता है। वह चाहता है कि उसकी पहचान उसकी योग्यता बने—जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र अथवा राजनीतिक संपर्क नहीं।
क्या चाहता है युवा?
आज का युवा सरकार से एहसान नहीं, न्यायपूर्ण अवसर मांगता है। उसे ऐसी शिक्षा चाहिए जो केवल डिग्री नहीं, दक्षता भी दे। ऐसी भर्ती व्यवस्था चाहिए, जिसमें परीक्षा से नियुक्ति तक पूरी पारदर्शिता हो। उसे ऐसा रोजगार चाहिए, जिसमें सम्मान, सुरक्षा और आगे बढ़ने की संभावना हो।
आज के युवा के लिए आज़ादी का अर्थ यह भी है कि वह अपने माता-पिता की पीढ़ी की तरह केवल यह सोचते हुए जीवन न गुजारे कि ‘नौकरी लग जाए तो जीवन कट जाएगा।’ वह जीवन जीना चाहता है, केवल जीवन काटना नहीं।
सरकार से युवा की अपेक्षाएं
सरकार किसी भी दल की हो, लोकतंत्र में उसकी पहली जिम्मेदारी यह भरोसा देना है कि व्यवस्था युवा के विरुद्ध नहीं, उसके साथ खड़ी है। युवा सरकार से पूछता है—यदि मैं मेहनत करूं तो क्या व्यवस्था मेरे रास्ते की बाधाएं हटाएगी?
उसे ऐसी परीक्षा व्यवस्था चाहिए, जिसमें प्रश्नपत्र सुरक्षित हों। ऐसी भर्ती चाहिए, जिसमें परिणाम और नियुक्ति के लिए वर्षों इंतजार न करना पड़े। ऐसा प्रशासन चाहिए, जिसमें शिकायत का अर्थ फाइलों के नीचे दब जाना न हो।
युवा यह भी चाहता है कि उसकी आवाज को केवल चुनावी मौसम की आवाज न समझा जाए। आंदोलित युवाओं को राजनीतिक चश्मे से देखना आसान है, लेकिन उनकी पीड़ा समझना कठिन। लोकतंत्र की असली परीक्षा इसी कठिन काम में है। युवाओं के प्रत्येक आंदोलन को देशविरोधी कहना उतना ही खतरनाक है, जितना हर आंदोलन को राजनीतिक क्रांति मान लेना।
युवा को सुना जाना चाहिए, इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।
समाज से भी हैं सवाल
आज़ादी केवल सरकार से मांगने की वस्तु नहीं है। समाज को भी अपने भीतर की गुलामियों से मुक्त होना होगा। जातिगत श्रेष्ठता, धार्मिक कट्टरता, लैंगिक भेदभाव, छुआछूत, दहेज, अंधविश्वास और संकीर्ण मानसिकता ऐसी बेड़ियां हैं, जिन्हें किसी विदेशी शासक ने नहीं पहनाया। इन्हें हमने स्वयं बनाया है।
यदि किसी लड़की को अपनी पसंद का करियर चुनने के लिए परिवार से संघर्ष करना पड़े, किसी युवक की प्रतिभा उसकी जाति के आधार पर आंकी जाए अथवा किसी व्यक्ति को उसकी भाषा या धर्म के कारण संदेह की दृष्टि से देखा जाए तो हमें स्वयं से पूछना होगा—हम किस आज़ादी का उत्सव मना रहे हैं?
तिरंगा तभी सार्थक है, जब उसके रंगों का संदेश हमारे व्यवहार में साहस, शांति, विश्वास और समृद्धि के रूप में दिखाई दे।
युवा पीढ़ी की आज़ादी कैसी हो?
युवा के लिए आज़ादी का अर्थ मनमानी नहीं हो सकता। स्वतंत्रता अधिकार देती है तो जिम्मेदारी भी मांगती है। सोशल मीडिया पर किसी को अपमानित करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है। फर्जी खबर फैलाना आज़ादी नहीं है। सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना आंदोलन नहीं है। नशे को आधुनिकता मानना स्वतंत्रता नहीं है और कानून तोड़कर अपनी सुविधा को अधिकार बताना भी आज़ादी नहीं है।
युवा के लिए स्वतंत्रता का आदर्श होना चाहिए—स्वतंत्र विचार, अनुशासित आचरण और जिम्मेदार नागरिकता।
उसे सवाल पूछने का अधिकार है तो जवाब खोजने की जिम्मेदारी भी स्वीकार करनी होगी। उसे अधिकार मांगने चाहिए, लेकिन कर्तव्यों से भागना नहीं चाहिए। उसे व्यवस्था बदलने की बात करनी चाहिए, साथ ही स्वयं भी व्यवस्था की ईमानदारी का हिस्सा बनना चाहिए।
विश्वगुरु बनने का रास्ता
विश्वगुरु बनने का दावा नारों से नहीं, नागरिकों के चरित्र और राष्ट्र की संस्थाओं से प्रमाणित होगा। जिस देश में विश्वविद्यालय ज्ञान के केंद्र हों, न्याय व्यवस्था पर भरोसा हो, चुनाव लोकतांत्रिक मर्यादा के साथ संपन्न हों, प्रशासन पारदर्शी हो, वैज्ञानिक सोच का सम्मान हो, महिलाएं निर्भय हों, युवाओं को अवसर मिलें और गरीब भी अपने बच्चे के भविष्य को लेकर आश्वस्त हो—वही देश दुनिया को रास्ता दिखा सकता है।
भारत की प्राचीन परंपरा ने दुनिया को ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का संदेश दिया था। इस विचार की प्रतिष्ठा तभी होगी, जब हम अपने समाज में एक-दूसरे को शत्रु की तरह देखना बंद करेंगे।
भारत को विश्वगुरु बनने से पहले अपने नागरिकों और दुनिया के लिए विश्वसनीय राष्ट्र बनना होगा।
सबसे बड़ा संकल्प
आज़ादी के इस पड़ाव पर हमें केवल यह नहीं गिनना चाहिए कि हमने कितनी सड़कें, पुल, इमारतें और तकनीकी उपलब्धियां हासिल कीं। यह भी देखना होगा कि हमने अपने नागरिकों के भीतर कितना आत्मविश्वास पैदा किया।
क्या गरीब को न्याय मिलता है?
क्या युवा को अवसर मिलता है?
क्या लड़की को बराबरी मिलती है?
क्या असहमति को सम्मान मिलता है?
क्या मेहनत का उचित मूल्य मिलता है?
क्या ईमानदार व्यक्ति व्यवस्था में टिक सकता है?
यदि इन सवालों के जवाब ‘हां’ की ओर बढ़ रहे हैं तो समझिए कि हमारी आज़ादी मजबूत हो रही है। यदि जवाब ‘नहीं’ है तो उत्सव के साथ गंभीर आत्ममंथन भी आवश्यक है।
15 अगस्त 2026 को तिरंगा जब आसमान में लहराए तो वह केवल अतीत की विजय का प्रतीक न रहे, बल्कि आने वाले भारत का संकल्प बने—एक ऐसा भारत, जहां युवा अपनी प्रतिभा के साथ उड़ान भर सकें, सवाल पूछ सकें, असफल हो सकें, फिर उठ खड़े हों और अपनी मेहनत से अपनी मंजिल चुन सकें।
आज़ादी की असली परीक्षा केवल यह नहीं है कि हमने 1947 में क्या पाया था। सबसे बड़ा सवाल यह है कि 2047 तक हम अपने बच्चों को कैसी आज़ादी देकर जाना चाहते हैं। यही 80वें स्वतंत्रता दिवस का सबसे बड़ा संकल्प होना चाहिए।
होगा कि हमने नागरिक के भीतर कितना आत्मविश्वास पैदा किया।क्या गरीब को न्याय मिलता है?क्या युवा को अवसर मिलता है?क्या लड़की को बराबरी मिलती है?क्या असहमति को सम्मान मिलता है?क्या मेहनत का मूल्य मिलता है?क्या ईमानदार व्यक्ति व्यवस्था में टिक सकता है?
अगर इन सवालों के जवाब ‘हाँ’ की ओर बढ़ रहे हैं तो समझिए कि आज़ादी मज़बूत हो रही है। यदि जवाब ‘नहीं’ है तो उत्सव के साथ आत्ममंथन भी जरूरी है।
15 अगस्त 2026 को तिरंगा जब आसमान में लहराए तो वह केवल अतीत की विजय का प्रतीक न हो। वह आने वाले भारत का संकल्प बने एक ऐसा भारत जहाँ युवा अपनी प्रतिभा के साथ उड़ सकें, सवाल पूछ सके, असफल हो सकें, फिर उठ सके और अपनी मेहनत से अपनी मंज़िल चुन सके। आज़ादी की असली परीक्षा यह नहीं कि हमने 1947 में क्या पाया था। असली सवाल यह है कि 2047 तक हम अपने बच्चों को कैसी आजादी देकर जाना चाहते हैं और यही 80वें स्वतंत्रता दिवस का सबसे बड़ा संकल्प भी होना चाहिए।








