तीन राज्यों का जनादेश, भाजपा आलाकमान को सीधा संदेश

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प्रदीप कुमार वर्मा

देश के तीन राज्यों की तीन विधानसभा सीटों पर हुए उप चुनाव के परिणाम से भाजपा की साख एवं विपक्ष की उम्मीद के साथ देश की भावी राजनीति पर एक बार फिर से विमर्श शुरू हो गया है। उप चुनाव में बिहार के बांकीपुर और मध्य प्रदेश के दतिया में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा है। वहीं, गुजरात के मांजलपुर में भाजपा अपनी सीट बरकरार रखने में कामयाब रही है। बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट पर हुए उप चुनाव में जन सुराज पार्टी के प्रशांत कुमार ने शानदार जीत दर्ज करके बिहार की राजनीति में अपनी पार्टी का “उदय” किया है। राजनीति के पंडितों की माने तो विधानसभा उप चुनावों के परिणाम में एक बार फिर से बिहार और मध्यप्रदेश की सत्ता पर काबिज भाजपा सरकारों के कामकाज पर “सवालिया” निशान खड़ा किया है।

तीन राज्यों के उप चुनाव के नतीजे खासे चौंकाने वाले रहे हैं। इन नतीजे में सबसे बड़ा नुकसान इन राज्यों में सत्ता पर काबिज भाजपा की साख को हुआ है। भाजपा अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की परंपरागत सीट रही बांकीपुर में चुनाव हार गई। वहीं,दतिया में कांग्रेस को एक बार फिर बड़ी जीत के रूप में “संजीवनी” मिली है। बिहार में भाजपा की हार को लेकर राजनीतिक पंडितों का मानना है कि नीट पेपर लीक पर सीजेपी का आंदोलन, यूजीसी गाइडलाइन्स और भरत तिवारी एनकाउंटर से बीजेपी का कोर वोटर नाराज हुया। यह नाराजगी मतदान के कम प्रतिशत में भी दिखी और वोटरों की “उदासीनता” का खामियाजा भी बीजेपी को भुगतना पड़ा। बिहार के अलग-अलग हिस्सों में छात्रों का आंदोलन और पुलिस की कार्रवाई से भी भाजपा को उप चुनाव में नुकसान उठाना पड़ा।

मध्य प्रदेश की दतिया विधानसभा सीट पर हुए उप चुनाव में कांग्रेस ने महत्वपूर्ण जीत दर्ज की है। कांग्रेस उम्मीदवार कुंवर घनश्याम सिंह ने भाजपा के आशुतोष तिवारी को पराजित कर कांग्रेस की सीट बरकरार रखी। दतिया सीट कांग्रेस के पूर्व विधायक राजेंद्र भारती की सदस्यता समाप्त होने के बाद खाली हुई थी। दिल्ली की एक अदालत से धोखाधड़ी के मामले में तीन साल की सजा मिलने के बाद उनकी विधानसभा सदस्यता चली गई थी, जिसके कारण उप चुनाव कराना पड़ा। दतिया विधानसभा उप चुनाव के परिणाम केवल एक सीट के हार-जीत भर का फेर नहीं हैं, बल्कि यह राज्य की आगामी राजनीति की दशा और दिशा तय करने वाला एक बड़ा टर्निंग पॉइंट बन चुकी है। पिछले विधानसभा चुनाव में राज्य में बीजेपी की प्रचंड आंधी के बावजूद पार्टी यह सीट हार गई थी।

तीन राज्यों की तीन विधानसभा सीटों के लिए उप चुनाव में गुजरात की मांजलपुर सीट पर ही भाजपा अपनी साख और सीट बरकरार रखने में कामयाब रही है। उप चुनाव के परिणाम के मुताबिक मध्यप्रदेश के दतिया में कांग्रेस ने अपनी सीट ही बचाई है। वहीं,बिहार की बांकीपुर सीट पर भी भाजपा को अपनी परंपरागत सीट गंवाकर हर का सामना करना पड़ा है। उप चुनाव परिणाम के बाद उठे सवाल एवं समीक्षा में राजनीति के पंडित इस बात से इनकार नहीं करते कि बांकीपुर हो या फिर दतिया, दोनों सीटों पर उम्मीदवार के चयन में गड़बड़ी भी हार का एक प्रमुख कारण है। बांकीपुर में एन वक्त पर प्रत्याशी का बदलना तथा चुनाव में नीतीश कुमार का प्रचार नहीं करना तथा बिहार भाजपा इकाई के नेताओं में समन्वय की कमी भी एक कारण माना जा रहा है।

दतिया सीट पर कांग्रेस ने जहां अभूतपूर्व एकता दिखाई, वहीं, इसके उलट भाजपा चुनाव के दौरान कई खेमों में बंटी नजर आई। नतीजा यह हुआ कि दतिया में पार्टी को हर का मुंह देखना पड़ा। इससे पहले भाजपा मध्यप्रदेश के श्योपुर का उप चुनाव भी हार चुकी है। ऐसे में लगातार दूसरे उप चुनाव में मिली हार ने पार्टी के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। विपक्ष अब इन नतीजों को सरकार के खिलाफ माहौल के तौर पर पेश करने की कोशिश कर रहा है। कांग्रेस इस जीत को जनता के भरोसे का संकेत बता रही है, जबकि बीजेपी के सामने अब हार की वजहों की समीक्षा करने की चुनौती है। दतिया का नतीजा भले ही मध्यप्रदेश विधानसभा में सत्ता के समीकरण नहीं बदलेगा लेकिन इस चुनाव ने भाजपा आलाकमान को एक राजनीतिक संदेश जरूर दिया है।

वर्ष 2025 में राजस्थान की अंता विधानसभा सीट पर उप चुनाव हुआ,जिसमें भाजपा को हार का सामना करना पड़ा था। इस सीट पर भाजपा और कांग्रेस के बीच कड़ी टक्कर मानी जा रही थी लेकिन कांग्रेस के प्रमोद जैन भाया यह उप चुनाव जीत गए। वहीं,इस उप चुनाव में भाजपा के मोरपाल सुमन हार गए। राजस्थान, मध्य प्रदेश एवं बिहार में भाजपा के सत्ता पर काबिज होने के बाद भी उप चुनाव में पार्टी के प्रत्याशियों की हारने से कई सवाल खड़े किए हैं। इन चुनाव परिणामों ने एक बार फिर यह विमर्श शुरू कर दिया है कि किसी भी सीट पर सिर्फ पुराने रिकॉर्ड के भरोसे जीत तय नहीं होती। चुनाव में उम्मीदवार का चयन, स्थानीय समीकरण,क्षेत्रीय नेताओं की सहभागिता और कार्यकर्ताओं की सक्रियता चुनावी नतीजों में बड़ी भूमिका निभाते हैं।

इस मंथन में यह बताना भी जरूरी है कि मध्य प्रदेश और राजस्थान में करीब दो साल बाद वर्ष 2028 में राज्य विधानसभा के चुनाव होने हैं। इन दोनों ही राज्यों में वर्तमान में भाजपा की सरकार है। मध्य प्रदेश और राजस्थान में अगर इन दो-दो उप चुनावों को ही सरकार के कामकाज की कसौटी माने तो, यह भाजपा सरकार के कामकाज पर एक बार फिर से विमर्श करने की आवश्यकता है। इसके साथ ही भाजपा आलाकमान के लिए भी यह एक सीधा संदेश है कि आलाकमान इन राज्यों में सत्ता और संगठन के बीच समन्वय, सरकार के कामकाज, कार्यकर्ताओं की नाराजगी तथा विकास योजनाओं के क्रियान्वयन पर पूरी नजर रखें जिससे उप चुनाव में पार्टी के प्रति दिखी जनता की कथित बेरुखी एवं मोहभंग को समय रहते प्यार में बदला जा सके।

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Author: Bharat Sarathi

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