गजेंद्र सिंह

कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन के दौरान जंतर-मंतर से जो दृश्य सामने आए, उन्होंने केवल राजनीति को नहीं, समाज को भी आईना दिखाया। सबसे बड़ा झटका शायद उन माताओं-पिताओं को लगा जिन्होंने पहली बार अपने बच्चों के उस भाषा-ज्ञान का सार्वजनिक प्रदर्शन देखा जिसका शब्दकोश उन्होंने कभी खरीदा ही नहीं था।
एमसी-बीसी तो अब पुरानी बात हो गई। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे उन वीडियो ने, जिनमें प्रधानमंत्री मोदी को बेहद अश्लील और कल्पनातीत गालियां पूरे आत्मविश्वास और धज के साथ दी जा रही हैं, वहीं #$¢€£&# जैसी एक्सट्रीम गालियों ने अनेक अभिभावकों को पहली बार यह एहसास कराया कि नई पीढ़ी की शब्दावली उनसे कई पीढ़ियां आगे निकल चुकी है। सवाल उठना स्वाभाविक है क्या यह भाषा स्कूलों में सिखाई जाती है, या फिर यह हमारी नई डिजिटल संस्कृति, सोशल मीडिया और आभासी संसार की उपज है? कुछ शहरों को हमेशा गर्व रहा कि उनकी गालियों की बराबरी कोई नहीं कर सकता लेकिन इन दिनों राजधानी से जो शब्द-संस्कृति प्रसारित हुई, उसने महसूस करा दिया कि दिल्ली के आगे हम सचमुच गांव के सीधे-साधे लोग ही हैं।
सबसे ज्यादा बेचैनी उन परिवारों में है जिनके बच्चे बड़े शहरों में पढ़ रहे हैं। कई अभिभावकों ने तो सोशल मीडिया रील्स देखना ही कम कर दिया है। कहीं अचानक स्क्रीन पर “पापा की परी” या “मम्मी का राजदुलारा” हाथ में तख्ती लिए ऐसे शब्द बोलता दिखाई न दे जाए जिन्हें घर में कभी सुना तक नहीं गया। डर लाजमी है। आज जो लोग प्रधानमंत्री मोदी को सार्वजनिक मंचों पर गालियां दे रहे हैं, क्या कल वही पैदा करने के “अपराध” में अपने माता-पिता को भी नहीं लताड़ेंगे? लड़के-लड़कियों के हाथों में पकड़े कार्टबोर्ड पर लिखी भाषा ने मम्मियों और पापाओं को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि कल कहीं यही शब्द उनके हिस्से भी न आ जाएं। डर अब कल्पना नहीं, संभावना बन चुका है। डर के आगे जीत है… जीतो! “काढ़ो बाप रो नाम!”
लेकिन यह सब आज का नहीं है। यह बरसों से जमा होता आ रहा आक्रोश है, विसंगतियों से उपजी कुंठा है, जिसे किसी न किसी रूप में बाहर आना ही था। इसलिए इसे केवल राजनीतिक घटना मानकर टाल देना पर्याप्त नहीं होगा। असल डर इस बात का नहीं है कि गालियां किसे दी जा रही हैं। असली चिंता यह है कि यह भाषा आई कहां से? आज जो नेता को खुलेआम अपशब्द कह सकता है, क्या कल उसी सहजता से अपने माता-पिता, शिक्षक, पड़ोसी या समाज से भी उसी भाषा में बात नहीं करेगा? यह मान लेना आसान होगा कि यह सब अचानक हुआ है। सच यह है कि यह वर्षों से जमा होते आ रहे आक्रोश, सामाजिक असंतोष, डिजिटल संस्कृति, तात्कालिक प्रसिद्धि की भूख और संवाद के गिरते स्तर का मिश्रण है। आंदोलन तो केवल उसका मंच बन गया।
सवाल किसी एक दल या एक नेता का नहीं, उस सामाजिक मानस का है जो असहमति व्यक्त करने के लिए अब भाषा की सारी मर्यादाएं तोड़ने लगा है। यही कारण है कि घर-घर में चर्चा केवल आंदोलन की नहीं, जेन-जी की हो रही है। राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन यदि अगली पीढ़ी संवाद की जगह गाली को अभिव्यक्ति का सबसे प्रभावी माध्यम मानने लगे तो चिंता केवल सत्ता की नहीं, पूरे समाज की होनी चाहिए।
घर-घर में एक ही चर्चा है क्या सचमुच यही जेन-जी है? विडंबना यह भी है कि जो लोग स्वयं रोजमर्रा की बातचीत में गालियों का भरपूर प्रयोग करते हैं, वे भी इस नई शब्दावली से हैरान हैं। उन्हें लग रहा है कि गालियों का भी अब नया संस्करण आ गया है, जिसकी प्रस्तुति, आत्मविश्वास और सार्वजनिकता सब कुछ अलग है। भेजा तो बच्चों को पढ़ने था, लेकिन वे भाषा का कौन-सा पाठ पढ़कर लौटे? अब हाल यह है कि कई अभिभावक सुबह-सुबह बच्चों को संस्कार, सुभाषित और प्रेरक रील्स भेज रहे हैं। मानो वर्षों की उपेक्षा की भरपाई कुछ व्हाट्सऐप संदेशों से हो जाएगी। लेकिन सच यह है कि कुएं में भांग पड़ने के बाद खुमारी तो चढ़ेगी ही। इस पूरे प्रसंग का सबसे गंभीर प्रश्न राजनीतिक नहीं, सामाजिक है। कल सरकार बदल जाएगी। सत्ता किसी और के हाथ में होगी। आंदोलन समाप्त हो जाएगा। लेकिन बच्चे हमारे ही रहेंगे, परिवार हमारे ही रहेंगे और समाज भी हमारा ही रहेगा।
जब व्यवहार बिगड़ेगा तो उंगली अंततः माता-पिता पर ही उठेगी “संस्कार क्यों नहीं दिए?” मगर संस्कार भाषणों से नहीं, घर के वातावरण, संवाद और अनुकरण से बनते हैं। यदि समाज स्वयं असहमति की भाषा को गाली में बदल देगा, तो अगली पीढ़ी उसे ही सामान्य मानेगी। मनोविज्ञान भी कहता है कि आक्रामक भाषा अक्सर भीतर की कुंठा, असुरक्षा और असंतोष की अभिव्यक्ति होती है। यदि ऐसा है, तो यह केवल राजनीति का संकट नहीं, समाज का भी संकट है।सुना है आंदोलन में शामिल युवाओं की पहचान और डिजिटल गतिविधियों का विश्लेषण भी किया जा रहा है। यदि ऐसा है तो उसके सामाजिक और पारिवारिक परिणाम भी सामने आएंगे। राजनीतिक दल अपने-अपने लाभ-हानि का हिसाब लगा लेंगे, लेकिन परिवारों के सामने खड़े प्रश्न चुनावी नतीजों से हल नहीं होंगे। आखिरकार, हर समाज को यह तय करना पड़ता है कि वह अपनी अगली पीढ़ी को केवल विरोध करना सिखाना चाहता है, या विरोध की भाषा भी।







