राजनीति से न्यायपालिका और संस्कृति तक—जब भय, प्रभाव और दबाव व्यवस्था का हिस्सा बनने लगें, तो लोकतंत्र केवल चुनावों का उत्सव रह जाता है।
कमलेश पांडेय

लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत संविधान नहीं, बल्कि संविधान के अनुरूप आचरण करने वाली संस्थाएँ होती हैं। संसद, सरकार, न्यायपालिका, प्रशासन, मीडिया, विश्वविद्यालय और नागरिक समाज—ये सभी मिलकर लोकतंत्र की रीढ़ बनाते हैं। लेकिन जब इन्हीं संस्थाओं के भीतर या उनके आसपास भय, दबाव, प्रभाव, धनबल, बाहुबल और संगठित दुरुपयोग की संस्कृति पनपने लगे, तब सवाल केवल कानून-व्यवस्था का नहीं रह जाता; तब यह लोकतंत्र के अस्तित्व का प्रश्न बन जाता है।
आज देश के सामने यही सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न खड़ा दिखाई देता है—क्या राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, प्रशासनिक, सांस्कृतिक और न्यायिक ‘गुंडागर्दी’ धीरे-धीरे लोकतांत्रिक व्यवस्था को भीतर से खोखला कर रही है?
यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव जीत लेना नहीं होता। लोकतंत्र का अर्थ है—कानून का समान शासन, नागरिक स्वतंत्रता, संस्थागत निष्पक्षता और जवाबदेही। यदि शक्ति का स्रोत संविधान के बजाय प्रभावशाली व्यक्ति या समूह बनने लगें, तो लोकतंत्र का स्वरूप बदलने लगता है।
आज राजनीतिक क्षेत्र में चुनावी प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ धनबल, दलबदल, सत्ता के दुरुपयोग और राजनीतिक ध्रुवीकरण पर लगातार बहस होती है। विपक्ष अक्सर सत्ता पर संस्थाओं के दुरुपयोग का आरोप लगाता है, जबकि सत्ता पक्ष विपक्ष पर अराजकता फैलाने का आरोप लगाता है। इन आरोपों के बीच सबसे अधिक नुकसान जनता के विश्वास का होता है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी पूंजी जनता का भरोसा है, और जब वही कमजोर पड़ने लगे तो संस्थाएँ भी प्रश्नों के घेरे में आ जाती हैं।
प्रशासनिक व्यवस्था भी इस चुनौती से अछूती नहीं है। यदि अधिकारियों की नियुक्ति, स्थानांतरण या निर्णय क्षमता पर राजनीतिक अथवा अन्य प्रकार के प्रभाव की धारणा बनती है, तो प्रशासन की निष्पक्षता पर संदेह स्वाभाविक है। नागरिक तब व्यवस्था को सेवा का माध्यम नहीं, बल्कि शक्ति का उपकरण मानने लगता है। यही लोकतंत्र के लिए सबसे खतरनाक स्थिति है।
आर्थिक क्षेत्र में भी तस्वीर उत्साहजनक नहीं कही जा सकती। भ्रष्टाचार, मिलीभगत, ठेकेदारी, आर्थिक अपराध, वित्तीय धोखाधड़ी और संसाधनों पर सीमित समूहों का बढ़ता प्रभाव बराबरी के अवसरों को प्रभावित करता है। यदि ईमानदार प्रतिस्पर्धा की जगह संपर्क और प्रभाव सफलता का आधार बनने लगें, तो लोकतांत्रिक अर्थव्यवस्था भी अपने उद्देश्य से भटक जाती है।
सबसे गंभीर चिंता तब उत्पन्न होती है जब न्यायिक व्यवस्था को लेकर भी आम नागरिक के मन में संदेह जन्म लेने लगे। न्याय में विलंब, मुकदमों का बढ़ता बोझ, वर्षों तक लंबित फैसले और प्रभावशाली मामलों पर उठते सवाल न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता को चुनौती देते हैं। न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए। यदि यह विश्वास कमजोर पड़ता है तो संविधान की आत्मा भी आहत होती है।
लेकिन इन सबके बीच एक और खतरा तेजी से उभर रहा है—सांस्कृतिक ‘गुंडागर्दी’। यह वह स्थिति है जब संस्कृति, धर्म, भाषा, साहित्य, कला, खान-पान, पहनावे या विचारों को लेकर भय और दबाव का वातावरण बनाया जाता है। किसी पुस्तक, फिल्म, नाटक, कलाकार, लेखक या विचार से असहमति लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन यदि असहमति का स्थान धमकी, हिंसा, सामाजिक बहिष्कार या भीड़ के दबाव ने ले लिया, तो यह सांस्कृतिक संवाद नहीं बल्कि लोकतांत्रिक पतन का संकेत है।
भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी सांस्कृतिक विविधता रही है। यहाँ अनेक भाषाएँ, परंपराएँ, आस्थाएँ और जीवन पद्धतियाँ सदियों से साथ-साथ विकसित हुई हैं। यदि विविधता की जगह एकरूपता थोपने की प्रवृत्ति बढ़ती है, तो सबसे पहले संविधान की वह भावना प्रभावित होती है जो प्रत्येक नागरिक को गरिमा और स्वतंत्रता के साथ जीने का अधिकार देती है।
विडंबना यह है कि इन विषयों पर देश के विश्वविद्यालयों, विधि संस्थानों, प्रशासनिक अकादमियों, मीडिया मंचों और बौद्धिक जगत में जितनी व्यापक और निरंतर बहस होनी चाहिए, उतनी दिखाई नहीं देती। लोकतंत्र में सबसे खतरनाक स्थिति तब होती है जब कठिन प्रश्न पूछने का साहस कम होने लगे और उत्तरों की जगह केवल राजनीतिक शोर बच जाए।
यह भी उतना ही सत्य है कि हर समस्या का समाधान कानून बनाकर नहीं किया जा सकता। कानून तभी प्रभावी होता है जब उसके पीछे राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक निष्पक्षता, न्यायिक सक्रियता और सामाजिक नैतिकता साथ खड़ी हों। यदि अपराधी का मूल्यांकन उसके राजनीतिक, आर्थिक या सामाजिक प्रभाव के आधार पर होने लगे, तो कानून का शासन धीरे-धीरे व्यक्ति के शासन में बदल जाता है।
समाधान स्पष्ट हैं, लेकिन कठिन भी। कानून सभी पर समान रूप से लागू हो। राजनीतिक दल अपराध और भ्रष्टाचार के प्रश्न पर समान मानदंड अपनाएँ। प्रशासन को अनावश्यक दबाव से मुक्त रखा जाए। न्यायपालिका की स्वतंत्रता और दक्षता को मजबूत किया जाए। शिक्षा में संवैधानिक मूल्यों और नागरिक उत्तरदायित्व को अधिक स्थान मिले। मीडिया तथ्य, विवेक और सार्वजनिक उत्तरदायित्व के साथ लोकतांत्रिक विमर्श को दिशा दे। और सबसे बढ़कर नागरिक स्वयं भय या भीड़ के दबाव से मुक्त होकर प्रश्न पूछने का साहस बनाए रखें।
लोकतंत्र का भविष्य संसद भवन की दीवारों से कम और नागरिकों के मन में बसे विश्वास से अधिक तय होता है। यदि नागरिक को यह भरोसा रहे कि कानून सबके लिए समान है, संस्थाएँ निष्पक्ष हैं और असहमति व्यक्त करना अपराध नहीं है, तभी लोकतंत्र जीवंत रहेगा।
आज आवश्यकता किसी एक व्यक्ति, दल या विचारधारा को कठघरे में खड़ा करने की नहीं, बल्कि उन प्रवृत्तियों को पहचानने की है जो लोकतंत्र को भीतर से कमजोर करती हैं। राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, प्रशासनिक, सांस्कृतिक और न्यायिक—किसी भी रूप में ‘गुंडागर्दी’ यदि व्यवस्था पर हावी होती है, तो उसका पहला शिकार संविधान नहीं, बल्कि आम नागरिक का विश्वास बनता है।
और जिस दिन लोकतंत्र से नागरिक का विश्वास उठ जाता है, उस दिन चुनाव तो बच जाते हैं, लेकिन लोकतंत्र की आत्मा संकट में पड़ जाती है। यही हमारे समय का सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न है।









