डॉ० मत्स्येन्द्र प्रभाकर

केन्द्र में बैठा सत्ता‑गठबन्धन अब शासन नहीं, संविधान की दिशा तय करने की तैयारी में दिखता है। सवाल केवल इतना नहीं कि उसके पास कितनी सीटें हैं; असली सवाल यह है कि क्या वह संसदीय संख्या‑बल को लोकतांत्रिक सहमति में बदल सकता है, या फिर वह सत्ता के बल पर संवैधानिक सन्तुलन को अपने पक्ष में मोड़ना चाहता है। यही वह बिन्दु है जहाँ भारतीय राजनीति का असली चेहरा सामने आता है।
राज्यसभा इस समय केवल दूसरा सदन नहीं बल्कि सत्ता की सबसे बड़ी परीक्षा‑भूमि है। लोकसभा में बहुमत मिल जाना अलग बात है लेकिन संविधान संशोधन, संघीय सन्तुलन और संवेदनशील विधेयकों के लिए उच्च सदन का विशेष बहुमत अनिवार्य है। इसलिए राज्यसभा का हर नया अंक, हर इस्तीफा, हर दलबदल और हर अनुपस्थिति, सत्ता‑राजनीति में रणनीतिक हथियार बन जाता है। जो दल संसद में अपनी संख्या बढ़ा लेता है, वह केवल विधेयक नहीं, राजनीतिक दिशा भी नियंत्रित करने की कोशिश करता है।
एनडीए की मौजूदा कोशिश इसी दिशा में पढ़ी जानी चाहिए। उसका लक्ष्य अब केवल सरकार चलाना नहीं बल्कि ऐसी संसदीय स्थिति बनाना है जिसमें विवादित या दूरगामी बदलावों को पारित करना आसान हो जाए। यह रणनीति साफ़ है: जहाँ प्रत्यक्ष जनादेश कमजोर हो, वहाँ संस्थागत गणित को साधो; जहाँ नैतिक बहस भारी पड़े, वहाँ संख्याबल का सहारा लो; और जहाँ विपक्ष अडिग दिखे, वहाँ उसके भीतर की दरारों को खोजो। भारतीय सत्ता‑संस्कृति में यह कोई अपवाद नहीं बल्कि पुराना और आज़माया हुआ तरीका है।
यही वजह है कि क्षेत्रीय दलों पर दबाव, उनके भीतर की टूट‑फूट, और सांसदों की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएँ अचानक बहुत महत्वपूर्ण हो जाती हैं। तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, उद्धव गुट, कांग्रेस—इन सबकी कमजोरियाँ अब केवल पार्टी‑संगठन की समस्या नहीं रहीं, बल्कि राज्यसभा की संख्याओं का हिस्सा बन चुकी हैं। एक सांसद का झुकाव, एक नेता का असन्तोष, एक गुट का अलग होना—ये घटनाएँ अब लोकतांत्रिक बहस की छोटी बातें नहीं, सत्ता की बड़ी रणनीति हैं।
पर समस्या संख्या की नहीं, नीयत की है। क्या सत्ता पक्ष सचमुच संवैधानिक सुधारों के लिए जनसमर्थन चाहता है, या वह विपक्षी प्रतिरोध को तोड़कर अपने लिए बाधारहित रास्ता बनाना चाहता है? भारत का संविधान किसी एक दल की सुविधा के लिए नहीं लिखा गया था। उसमें राज्यसभा, राज्यों की भूमिका और विशेष बहुमत जैसी व्यवस्थाएँ इसलिए रखी गयीं ताकि क्षणिक बहुमत देश के दीर्घकालिक ढाँचे को न तोड़ सके लेकिन जब सत्ता इन संस्थागत ब्रेकों को बाधा मानने लगे, तब लोकतंत्र औपचारिक होकर रह जाता है।
सबसे चिन्ताजनक बात यह है कि राजनीति अब विचारधारा से कम और गणित से ज़्यादा चल रही है। किस दल में कितने सांसद हैं, कौन किस ओर झुक सकता है, किस राज्य में कौन‑सी सीट खाली होगी, किस नेता को किस पद या लाभ से रिझाया जा सकता है— यह सब राष्ट्रीय नीति की भाषा बन गया है। संसद में बहस कम, समीकरण ज्यादा हैं। सिद्धान्त पीछे छूट रहे हैं, और सौदे आगे बढ़ रहे हैं। यही वह क्षरण है जो लोकतंत्र को भीतर से खोखला करता है।
वॉकआउट, अनुपस्थिति और प्रक्रियागत चालें भी इसी खेल का हिस्सा हैं। सदन में वास्तविक समर्थन की जगह उपस्थित संख्या को निर्णायक बना देना, संसदीय नैतिकता को कमजोर करता है। जब सत्ता और विपक्ष दोनों संख्या‑प्रबन्धन को राजनीति का मुख्य औज़ार बना लें, तब नीति‑निर्माण गौण हो जाता है। जनता के मुद्दे पीछे रह जाते हैं, और राजनीतिक इंजीनियरिंग आगे निकल जाती है। यह लोकतंत्र का नहीं, अंक‑शास्त्र का शासन है।
संविधान संशोधन जैसे विषय पर यह और भी खतरनाक हो जाता है। ऐसे संशोधन केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं होते, वे राष्ट्र की आत्मा से जुड़ते हैं। यदि उन्हें व्यापक बहस, जनमत और संघीय सहमति के बिना पारित किया जाए, तो वे वैध तो दिख सकते हैं, पर वैधता खो देते हैं। किसी भी सत्ता के लिए यह आसान होता है कि वह संख्या जुटा ले; कठिन यह होता है कि वह उस संख्या को नैतिक अधिकार में बदल सके और आज की राजनीति इसी कठिनाई से बचना चाहती दिखती है।
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों की कमजोरी इस प्रक्रिया को और आसान बनाती है। भीतरू तनाव, नेतृत्व संकट, गुटबाज़ी और स्थानीय महत्वाकांक्षाएँ विपक्ष को एकजुट प्रतिरोध से दूर करती हैं। सत्ता पक्ष को विपक्ष को हराने के लिए हमेशा बाहर से वार नहीं करना पड़ता; कई बार विपक्ष अपने भीतर से ही टूट जाता है। भारतीय राजनीति का सबसे कड़वा सच यही है कि दलों की कमजोरी अक्सर सत्ता की ताकत बन जाती है।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि सत्ता पक्ष की हर कोशिश स्वाभाविक या वैध है। यदि राजनीतिक दल संसद को केवल अपने एजेंडे की मशीन बना दें, तो वह लोकतंत्र नहीं, संसदीय प्रभुत्ववाद कहलाएगा। राज्यसभा का उद्देश्य ही यही था कि वह क्षणिक बहुमत के ऊपर एक संवैधानिक रोक की तरह काम करे। यदि उसी सदन को भी राजनीतिक सौदेबाज़ी का मैदान बना दिया जाए तो फिर सन्तुलन कहाँ बचेगा?
इसलिए यह समय केवल राजनीतिक विश्लेषण का नहीं, चेतावनी का भी है। सत्ता के पास यदि बहुमत है, तो उसे अपनी मर्यादा भी दिखानी होगी। विपक्ष कमजोर है, तो भी संविधान की रक्षा का दायित्व खत्म नहीं होता। और जनता को यह समझना होगा कि संसद में होने वाले समीकरण केवल दलों का खेल नहीं, आने वाले वर्षों की शासन‑संरचना तय करते हैं। आज जो संख्या साधी जा रही है, वही कल अधिकारों और सीमाओं की भाषा तय करेगी।
अन्ततः, यह संघर्ष संसद की कुर्सियों का नहीं, संवैधानिक आत्मा का है। सत्ता यदि अपने लक्ष्य के लिए हर सम्भव रास्ता अपनाना चाहती है, तो उसे यह भी बताना होगा कि उसकी सीमा कहाँ है। लोकतंत्र में जीत केवल सीटों से नहीं मापी जाती; वह इस बात से मापी जाती है कि आपने अपनी शक्ति का उपयोग किस मर्यादा में किया। यदि मर्यादा टूटे, तो जीत भी सन्देह में आ जाती है और यही आज की भारतीय राजनीति का सबसे तीखा सच है।









